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क्या सचमुच, चुनावी तानाशाही की ओर हैभारतीय लोकतंत्र ?

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सुसंस्कृति परिहार 

            केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी की सरकार की बहुत सी विशेषताएं हैं जिनको इससे पहले शायद ही इतने वृहत्तर रुप में देखा गया होगा । यूं तो राजनीति में साम ,दाम, दंड,भेद आदि को सामंतशाही में ग़लत नहीं बल्कि ज़रूरी समझा जाता था और इसे सामाजिकता स्वीकार्यता भी थी ।देश में लोकतांत्रिक संविधान लागू होने के बाद ऐसा समझा गया कि अब जनता का ,जनता के लिए,जनता द्वारा शासन व्यवस्था से ये सब ख़त्म हो जाएगा। लोकतांत्रिक शासन में स्वतंत्र चुनाव आयोग और स्वतंत्र न्यायपालिका के कारण कहीं जनमत की उपेक्षा नहीं हो सकेगी पर भाजपा के कार्यकाल में जनमत का जितना अनादर हुआ है वह इतिहास में दर्ज़ तो होगा ही साथ ही साथ भारतीय लोकतंत्र की लोकप्रियता और विश्वसनीयता पर भी विराम लगाएगा। इतिहास में इंदिरा जी सत्ता लोलुपता के दुखद अध्याय का एक काला पन्ना भी है जिसमें आपातकाल लगाने औेर चुनाव की समयावधि को एक साल और बढ़ाने के कारण उनकी महान छवि को गहरा आघात लगा था। इससे भाजपा ने यह सबक सीखा कि दलबदल, खरीद-फरोख्त या झूठे मामले दर्ज कर सत्ता कायम रखी जा सकती है।

                 आप देखिए 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के दो साल बाद कांग्रेस के करीब 170 विधायकों का पार्टी से मोहभंग हो गया। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि साल 2016-2020 के दौरान हुए विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों के समय कांग्रेस के 170 विधायक दूसरे दलों में शामिल बाद हो गए जबकि भाजपा के सिर्फ 18 विधायकों ने दूसरी पार्टियों का दामन थामा। इस दौरान मध्यप्रदेश समेत पांच राज्यों में सरकारें गिर गईं।क्या वजह हो सकती हैं सबके सामने हैं।सत्ता का लोभ,धनसम्पदा की सुरक्षाऔर काले कारनामों पर पर्दा पड़ा रहे यह मूल वजह रही। बंगाल में शारदा चिट फंड घोटाले से भयभीत लोग किस कदर भाजपा में पहुंचे हैं हाथ कंगन को आरसी क्या?इससे पहले इस तरह चुनाव के दौरान ऐसा कभी नहीं हुआ।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2016-2020 के दौरान विभिन्न  दलों के 405 विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़ दी और फिर से चुनावी मैदान में हाथ आजमाया। इनमें से सबसे ज्यादा 182 विधायक भाजपा में शामिल हुए। वहीं, 28 विधायक कांग्रेस और 25 विधायकों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) को अपना नया ठिकाना बनाया।

लोकसभा और राज्यसभा चुनाव पर भी दल-बदलुओं का साया पड़ा  2019लोकसभा चुनाव के दौरान पांच सांसद भाजपा छोड़कर दूसरे दलों में शामिल हुए। 2016 से 2020 के दौरान कांग्रेस के 7 राज्यसभा सदस्य दूसरी पार्टियों में गए। इस दौरान पार्टी बदलकर फिर से राज्यसभा चुनाव लड़ने वाले 16 राज्यसभा सदस्यों में से 10 भाजपा में शामिल हुए।

 इतना ही नहीं मध्यप्रदेश समेत पांच राज्यों में 
 इन पांच सालों कीअवधि में सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश समेत 5 राज्य मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में सरकार का बनना-बिगड़ना विधायकों का पाला बदलने की बुनियाद पर हुआ।एक नई रीत को अमली जामा पहनाने का करिश्मा इस सरकार ने किया राज्यपाल कठपुतली बने रहे । जनता ठगी गई। बिहार में तेजस्वी यादव को कैसे मात दी गई वह सबने देखा है । पांडिचेरी का हाल भी किसी से छुपा नहीं है ।ई वी एम से हो रहे चुनावों पर भरोसा नहीं रहा ।क्या  भारत में अब लोकतंत्र नहीं रहा वह ‘चुनावी तानाशाही’ में तब्दील हो चुका है: स्वीडिश इंस्टिट्यूट रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 में भाजपा और नरेंद्र मोदी की जीत के बाद से देश का लोकतांत्रिक स्वरूप काफी कमज़ोर हुआ है और अब ये ‘तानाशाही’ की स्थिति में आ गया है.अमेरिकी संस्था “फ्रीडम हाउस” की रिपोर्ट के एक हफ्ते बाद ही स्वीडिश संस्था “वी-डेमोक्रेसी” ने भारत को “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र” के दर्जे से हटा कर “चुनावी तानाशाही” वाला देश बताया है ।जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को कलंकित कर रहा है । आवश्यक है सरकार और फजीहत से बचने इन सब बातों पर विचार करे अपनी नीतियों को जनहित में बदले ।जनता की आवाज सुने। किसान आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं।

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