जजों के तबादले, कॉलेजियम और सत्ता के हस्तक्षेप पर उठते सवाल
–तेजपाल सिंह ‘तेज’
भूमिका : संविधान, सत्ता और संदेह
कार्यक्रम की शुरुआत संविधान और लोकतंत्र की रक्षा जैसे मूल प्रश्न से होती है। इसी संदर्भ में कांग्रेस नेता Shashi Tharoor के उस कथन का उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री Narendra Modi संविधान को एक पवित्र ग्रंथ की तरह मानते हैं। यह कथन अपने आप में सम्मान सूचक है, किंतु कार्यक्रम यहीं से एक असहज प्रश्न उठाता है—यदि संविधान इतना ही पवित्र है, तो क्या उसकी आत्मा, यानी न्यायपालिका की स्वतंत्रता, भी उतनी ही सुरक्षित है? इसी संदेह के साथ पूरी चर्चा आगे बढ़ती है।
मूल प्रश्न : क्या सरकार जजों के तबादले करवा रही है?
कार्यक्रम का केंद्रीय सवाल सीधा और गंभीर है। क्या यह संभव है कि सरकार के लिए असुविधाजनक फैसले देने वाले न्यायाधीशों को सजा के तौर पर एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में भेज दिया जाता हो? यह सवाल किसी विपक्षी नेता या सामाजिक कार्यकर्ता ने नहीं उठाया, बल्कि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया ने सार्वजनिक मंच से इसे सामने रखा। यही तथ्य इस बहस को साधारण राजनीतिक आरोप से उठाकर संवैधानिक चिंता के स्तर तक ले जाता है।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया का वक्तव्य : कॉलेजियम की आत्मा पर चोट
पुणे के ILS लॉ कॉलेज में दिए गए अपने व्याख्यान में न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया ने कॉलेजियम प्रणाली की मूल भावना को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली इसलिए अस्तित्व में आई थी ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादलों को कार्यपालिका के प्रभाव से दूर रखा जा सके। जब कॉलेजियम स्वयं अपने कार्यवृत्त में यह दर्ज करता है कि किसी न्यायाधीश का तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया, तो यह केवल एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं रह जाती, बल्कि न्यायपालिका की स्वायत्तता पर सीधा आघात बन जाती है। भुइया के शब्दों में, ऐसा होना कॉलेजियम प्रणाली की अखंडता को भीतर से खोखला कर देता है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन प्रकरण : एक उदाहरण, कई सवाल
अपने वक्तव्य में न्यायमूर्ति भुइया ने अक्टूबर 2024 की एक घटना का उल्लेख किया, जिसने इस बहस को ठोस आधार दिया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का प्रस्ताव किया था। बाद में यह प्रस्ताव बदला गया और उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कॉलेजियम के रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से दर्ज था कि यह बदलाव केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया। इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या तबादले न्यायिक जरूरतों के आधार पर हो रहे हैं या सत्ता की सुविधा के अनुसार।
“तबादला सज़ा नहीं हो सकता” : भुइया की दो-टूक
न्यायमूर्ति भुइया ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायाधीशों का तबादला कभी भी दंड का साधन नहीं हो सकता। उनका उद्देश्य केवल न्याय के बेहतर प्रशासन से जुड़ा होना चाहिए। यदि किसी न्यायाधीश को केवल इसलिए स्थानांतरित किया जाता है क्योंकि उसने सरकार के खिलाफ कोई असहज निर्णय दिया है, तो यह न केवल उस न्यायाधीश के साथ अन्याय है, बल्कि पूरी न्यायिक प्रणाली में भय का वातावरण पैदा करता है। ऐसा भय अंततः न्याय के साहस को समाप्त कर देता है।
टिप्पणीकार बलराज मलिक : “यह संस्थागत भ्रष्टाचार है”
टिप्पणीकार बलराज मलिक : “यह संस्थागत भ्रष्टाचार है”
वरिष्ठ अधिवक्ता बलराज मलिक ने इस मुद्दे पर और भी तीखी भाषा का प्रयोग किया। उनके अनुसार, जब कॉलेजियम सरकार के अनुरोध को स्वीकार करता है, तो यह केवल दबाव में लिया गया निर्णय नहीं रहता, बल्कि संस्थागत भ्रष्टाचार का रूप ले लेता है। उन्होंने कहा कि जैसे रिश्वत देने की कोशिश करना अपराध है, वैसे ही उसे स्वीकार करना भी अपराध है। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने यह राय रखी कि ऐसे मामलों में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होना चाहिए, चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो। उनके लिए यह प्रश्न परिणाम का नहीं, बल्कि प्रतिरोध दर्ज कराने का है।
डर, पद और चुप्पी : क्यों नहीं बोलते अन्य जज?
कार्यक्रम में यह प्रश्न भी उभरा कि जब कुछ न्यायाधीश भीतर ही भीतर इस व्यवस्था से असहज हैं, तो वे खुलकर बोलते क्यों नहीं। इसका उत्तर भी उसी बहस में निहित है। कई न्यायाधीश भविष्य में मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना, पद की अवधि और सरकार की नाराज़गी के डर से सार्वजनिक रूप से बोलने से बचते हैं। ऐसे माहौल में न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया का वक्तव्य एक अपवाद के रूप में सामने आता है, जो यह दिखाता है कि अभी पूरी तरह साहस समाप्त नहीं हुआ है।
न्यायपालिका, राजनीति और बदले की भावना
चर्चा के दौरान यह आरोप भी सामने आया कि कुछ निचली अदालतों के अत्यंत विवादास्पद और साम्प्रदायिक रंग वाले फैसलों को मौन समर्थन या पुरस्कार जैसा व्यवहार मिला, जबकि सवाल उठाने वाले न्यायाधीशों को हाशिए पर डाल दिया गया। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि न्यायपालिका के भीतर भी एक अदृश्य रेखा खिंच रही है, जहां स्वतंत्रता और सत्ता के प्रति अनुकूलता के बीच चुनाव करना पड़ रहा है।
जनता की भूमिका : “अगर अदालतें कमजोर हों तो देश कौन बचाए?”
कार्यक्रम का स्वर अंततः जनता की जिम्मेदारी की ओर मुड़ जाता है। यदि न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं रहती, तो संविधान केवल एक दस्तावेज बनकर रह जाएगा। ऐसी स्थिति में केवल न्यायाधीशों से ही नहीं, बल्कि वकीलों, पत्रकारों, शिक्षकों और आम नागरिकों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे चुप न रहें। सवाल पूछना और जवाब मांगना ही लोकतंत्र को जीवित रखता है।
निष्कर्ष : एक जज का सवाल, पूरे लोकतंत्र की परीक्षा
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया का वक्तव्य किसी एक व्यक्ति या सरकार पर सीधा हमला नहीं है, बल्कि यह उस प्रणाली को आईना दिखाने का प्रयास है, जो धीरे-धीरे अपनी मूल आत्मा से दूर होती दिख रही है। यह अब केवल अदालतों का सवाल नहीं रह गया है। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत में न्यायाधीश निर्भय होकर निर्णय दे सकते हैं, या हर फैसले के साथ उन्हें अपने तबादले की आशंका भी झेलनी पड़ेगी। इसी प्रश्न के उत्तर में भारत के लोकतंत्र और संविधान का भविष्य छिपा हुआ है। (https://youtu.be/E5EaOlwGBe0?si=OWvoIunOK45Ty_kq)
रिपोर्ट : (द न्यूज लॉन्चर कार्यक्रम पर आधारित)
प्रस्तुति : आशीष चित्रांशी
टिप्पणीकार : बलराज मलिक, भाऊ
संदर्भ वक्तव्य : न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइया
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