Site icon अग्नि आलोक

अग्वाड किले का पुनरुद्धार कहीं गोवा मुक्ति संग्राम की याद को मिटाने की कोशिश तो नहीं

Share

रमाशंकर सिंह
गोवा सरकार एक अच्छा काम करने की ओर अग्रसर है। इरादा अच्छा है पर सरकारी ठेकेदार शैली का अमलीजामा कैसा होता है वह देखना पड़ेगा, अभी तक का काम तो बिगाड़ ही दिखा रहा है ! 
नीचे के दृश्य मांडवी नदी और अरब सागर की खाड़ी से नाव में बैठकर लिये हैं। यह उत्तरी गोवा के अग्वाड क़िले स्थित पुरानी जेल के हैं जिसके पुनरोद्धार के शुभ काम करने का फ़ैसला हुआ है। इसी जेल की अंधेरी कालकोठरी में डा० लोहिया  एवं डा० टी बी कुन्हा 1946में क़ैद किये गये थे जब गोवा को पुर्तगाली साम्राज्य से मुक्त कराने का संघर्ष शुरु हुआ था। वह पूरी कहानी अभी नहीं। 
सूचना मिलने पर मैं वहॉं गया जहॉं भीतर जाकर देखने व फ़ोटो खींचने की फ़िलहाल मनाही थी । पूरा परिसर नया बना दिया गया है और पुर्तगाली जेल का कोई भाव बचा नहीं है। पूरा ग्रेनाइट का फर्श, दीवारों पर बढ़िया प्लास्टर और स्नोव्हाइट सफ़ेद पेंट , नये लोहे के पुते हुये दरवाज़े । कमरे यानी बैरकें हवादार हो चुके हैं। पुरानी तोपों को समुद्र की ओर नये ठिकानों पर लगाना तो ठीक है पर यह किसी भी तरह जेल नहीं दिख रही जैसा  कि तत्कालीन लेखकों पत्रकारों ने बताया है। गोवा मुक्ति के साठ बरस हो रहे हैं और यह उचित ही है कि उन तमाम स्मृतियों को सहेज कर नई पीढ़ी को बताया जाये कि भारत और दुनिया को आनंदित करने वाला पश्चिमी समुद्र तट  गोवा पुर्तगाली राज से कैसे मुक्ति पा सका और उसके पीछे किनका कैसा बलिदान था।  
यह निर्विवाद तथ्य सत्य है कि सबसे पहले डा० लोहिया की पहल व  प्रेरणा से उत्तर व पश्चिम  भारत के बहुत से राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता वहॉं आंदोलन में कूदे और कारावास भुगता। खुद डा० लोहिया वहॉं बारंबार क़ैद किये गये और गोवा की सीमा के बाहर निकाले भी गये । गोवा की जनता डा० लोहिया को अग्वाड का शेर कहती है। अग्वाड यानी वह क़िला जिसमें वे क़ैद किये गये। यह भी स्वीकार करना चाहिये कि सोशलिस्ट आंदोलन के नेताओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई कार्यकर्ताओं का योगदान भी इस हेतु वंदनीय रहा। 
गोवा मुक्ति के बाद की सरकारों ने अपने स्वतंत्रता आंदोलन की कोई जानकारी शिक्षा में सम्मिलित नहीं की नतीजतन कई पीढ़ियॉं उस अमूल्य विरासत धरोहर व विचार से अनभिज्ञ रहीं। सिर्फ़ कोंकणी संस्कृति में लोकगीत रचे बसे रह गये हैं जो आज भी कोंकणी स्त्रियो द्वारा उत्सव के अवसरों पर गाये जाते हैं। 
 शेष भारत की नई पीढ़ी भी वहॉं मौज-मस्ती करने जाती है पर एक के भी दिमाग़ में उन योद्धाओं का ख़याल नहीं आता जिन्होनें अपनी नौजवानी पुर्तगाली यातनाओं को सहते हुये खपा दी। 
मुझे नहीं मालूम कि इस स्मृति स्थल का अंतिम रूप कैसा होगा ? क्या एकांगी विचार से यह निर्मित होगा या इतिहास के साथ न्याय करेगा ? 
अपनी ओर से मैं मुख्यमंत्री मुख्यसचिव आदि को निःशुल्क अपनी सेवाये देकर दुर्लभ चित्रों पुस्तकों और दस्तावेज़ों को वहॉं सहेज कर रखने का प्रस्ताव दे आया हूँ और उम्मीद करता हूँ कि ज़रूरत से ज़्यादा पैसा खर्च कर चमकदमक पैदा कर इस स्थान का नवीनीकरण करने की बजाय एक प्रेरणास्थल की तरह इसका विकास हो तो बेहतर होगा। इतिहास से अनभिज्ञ अफ़सरों ठेकेदारों को केंद्रीय अनुदान को ख़त्म करने का लक्ष्य होता है , लोकतंत्र आज़ादी के विचार को स्थायी स्मृति में बसाने का नहीं। उम्मीद है कि सरकार में उपस्थित वे कुछ महत्वपूर्ण लोग सक्रिय होंगें जो सही परिप्रेक्ष्य में चीजों को देख सकते हैं। शुभ की कामना के साथ उद्देश्य हेतु बधाई ! 
नोट: यह तथ्य नहीं भुलाया जा सकता कि कांग्रेस सरकार ने अग्वाड क़िले के बड़े हिस्से को  ताज ग्रुप के तीन पाँच सितारा होटलो के लिये भूमि लीज़ पर दे दी थी और वहॉं वे होटल चल रहे हैं। यह कैसी विडंबना रही कि स्वतंत्रता आंदोलन से पैदा हुई कांग्रेस स्वयं ऐसे गौरवशाली इतिहास के प्रति आपराधिक शर्मनाक बेरुख़ी अपनाये रही। इसके बाद डूबना ही था सो अरब सागर की इसी खाड़ी में में डूब गई और अब बंगाल की खाड़ी में डूबने की पूरी तैयारी है।

लेखक वरिष्ठ समाजवादी नेता तथा मध्य प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री व आईएमटी यूनिवर्सिटी ग्वालियर के वाइस चांसलर भी रहे हैं )

Exit mobile version