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क्या US कमजोर और चीन मजबूत हो रहा है

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रहीस सिंह

अमेरिका के राजनीतिक अर्थशास्त्री लेस्टर थोरो ने अपनी किताब ‘दि फ्यूचर ऑफ कैपिटलिज्म’ में लिखा है कि विश्व व्यापार व्यवस्था के नियम-कायदे हमेशा वर्चस्वशील अर्थव्यवस्थाओं ने तय किए और लागू कराए हैं। 19वीं सदी में ग्रेट ब्रिटेन ने यह भूमिका निभाई। 20वीं सदी में संयुक्त राज्य अमेरिका ने। लेकिन 21वीं सदी में आर्थिक प्रबंधन के नियम-कायदों की रूपरेखा बनाने, संगठित करने और उन्हें लागू कराने वाली कोई भी एक शक्ति नहीं होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका के प्रभाव में चल रही एक-ध्रुवीय व्यवस्था के दिन लद चुके हैं और एक बहुध्रुवीय संसार उभरकर विश्व रंगमंच पर आ चुका है।

बदलते समीकरण

थोरो की यह बात कितनी सही है, इस पर सभी एकमत नहीं होंगे, लेकिन जो बदलाव दिख रहे हैं वे इस ओर इशारा जरूर करते हैं कि अमेरिका अब दुनिया का लीडर नहीं रह गया है। असल में, अमेरिका के अधिकांश मित्र अब चीन की ओर देख रहे हैं। इससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि चीन वैश्विक व्यवस्था में अपनी मजबूत जगह बनाने में काफी हद तक सफल रहा है, लेकिन उसका यह सफर भी काफी दिलचस्प रहा है।

हालांकि चीन की अर्थव्यवस्था में भी ऐसे बुलबुले हैं, जिनके फूटने पर चीनी अर्थव्यवस्था की हालत खराब हो सकती है, लेकिन इस समय अमेरिका की तुलना में चीन को निश्चित रूप से डिप्लोमैटिक सरप्लस हासिल है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को करीब से देखें तो इसमें कुछ विशेषताएं बिल्कुल साफ हैं।

सच यही है कि आज अमेरिका के मित्र देश ही नहीं, स्वयं अमेरिका भी चीन की तरफ देखता हुआ प्रतीत होता है। इसके प्रमाण के तौर पर एंटनी ब्लिंकन की अमेरिका यात्रा को ले सकते हैं। उससे पहले फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों की पेइचिंग यात्रा हुई, यूरोपियन कमिशन के चेयरमैन ने भी शी चिनफिंग के दरबार में हाजिरी लगाई। ईरान और सऊदी अरब निकट आए तो इसमें भी पेइचिंग की भूमिका निर्णायक रही। अब इस्राइल के प्रधानमंत्री भी पेइचिंग विजिट की तैयारी कर रहे हैं।

मध्य-पूर्व में इस चीनी पैठ के बाद अमेरिका के लिए क्या कोई स्पेस बचा है? इस्लामी देशों की जहां तक बात है तो वे शीतयुद्ध के दौर से ही या तो अमेरिकी खेमे में चले गए या उनका अमेरिका की तरफ झुकाव रहा। अब ये चीन की ओर 60 डिग्री झुके दिख रहे हैं जबकि चीन ‘हुई’ और ‘उइगर’ समुदाय के खिलाफ मुहिम चला रहा है। पिछले दिनों ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामी कोऑपरेशन (ओआईसी) की बैठक में न केवल चीन को आमंत्रित किया गया बल्कि उसके प्रति समर्थन व्यक्त किया गया। ऐसा क्यों?

लव-हेट गेम

बहरहाल, अमेरिका-चीन के लव-हेट गेम के निहितार्थ तलाशने की जरूरत है। ध्यान रहे, अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से टकराव चल रहा है। पहले यह करंसी वॉर के रूप में चला और अब ट्रेड वॉर के रूप में चल रहा है। ऐसे में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन की पेइचिंग यात्रा भी अर्थपूर्ण हो जाती है और फिर बाइडेन द्वारा चिनफिंग को तानाशाह कहना भी।

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