Site icon अग्नि आलोक

*ये लोकतंत्र है या कुछ और : एक दृष्टि*

Share

      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          “लोकतंत्र”, एक ऐसा शब्द जो आज भारत की हर गली, हर मंच, हर सरकारी विज्ञापन और हर राजनीतिक भाषण में गूंजता है। यह शब्द हमारी संविधान की प्रस्तावना में दर्ज है; स्कूल की किताबों से लेकर कोर्ट की दलीलों तक इसका गुणगान होता है। लेकिन एक प्रश्न लगातार ध्वनित होता है—क्या हमारे जीवन में लोकतंत्र सचमुच मौजूद है या यह सिर्फ एक चमकदार आवरण है, जिसके भीतर एक अलक्षित तानाशाही पल रही है?

          डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में चेताया था—“हमने राजनीतिक स्वतंत्रता पा ली है, लेकिन जब तक सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, यह लोकतंत्र एक भ्रम बन जाएगा।” आज जब देश की संसद बहस से खाली हो चुकी है, न्यायालय सत्ता के दबाव में मौन साधे हैं, मीडिया टीआरपी और भय के बीच फंसा हुआ है और जनता को धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के नारों में उलझाकर प्रश्नहीन बना दिया गया है, तब आवाम को यह पूछना आवश्यक हो जाता है– क्या भारत सचमुच लोकतंत्र है, या वह किसी और रूप में ढल चुका है—जिसे पहचानना अब मुश्किल होता जा रहा है?

          यह निबंध इसी जिज्ञासा से उपजा है। यह उस मौन को तोड़ने का प्रयास है, जो लोकतंत्र के भीतर पनपते ‘कुछ और’ की पहचान से हमें रोकता है। यह केवल आलोचना नहीं, एक ऐतिहासिक, संवैधानिक और वैचारिक परीक्षण है, ताकि हम अपने वर्तमान की असल तस्वीर देख सकें और भविष्य के प्रति ईमानदार हो सकें।

लोकतंत्र—सिर्फ एक व्यवस्था या एक मूल्य?

          “लोकतंत्र” का अर्थ केवल चुनाव, संसद और संविधान नहीं है। यह एक जीवंत मूल्य प्रणाली है जो व्यक्ति की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और समान अवसरों की गारंटी देती है। लेकिन आज भारत जैसे देश में सवाल खड़ा होता है कि क्या जो हम देख रहे हैं—वह लोकतंत्र है या किसी और किस्म की सत्ता व्यवस्था, जिसमें जनता केवल पांच साल में एक दिन ‘सत्ता’ को छूती है और बाकी दिन उस सत्ता की निरंकुशता का शिकार होती है?

1. चुनाव: लोकतंत्र की आत्मा या सिर्फ एक अनुष्ठान?

          लोकतंत्र में चुनाव आम जन की भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन आज वे महज़ एक कर्मकांड बनते जा रहे हैं।  तथ्य और उदाहरण–

·        2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 37.4% वोट प्राप्त किए, यानी 62.6% जनता ने उन्हें वोट नहीं दिया, फिर भी बहुमत की सरकार बनी।

·        ईवीएम और वीवीपैट की पारदर्शिता पर लगातार संदेह व्यक्त किए जाते हैं, लेकिन चुनाव आयोग चुप्पी साधे रहता है।

·        चुनावों में धार्मिक ध्रुवीकरण, ‘राम मंदिर’, ‘लव जिहाद’, ‘गौ-हत्या’, ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ जैसे मुद्दे जनता की रोज़मर्रा की समस्याओं को निगल जाते हैं।

·        धनबल और बाहुबल के बिना कोई आम व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। एक सांसद का चुनाव खर्च 2024 में औसतन ₹9 करोड़ आँका गया, जबकि वैधानिक सीमा ₹95 लाख है।

2. संसद और संस्थाएं: जनप्रतिनिधियों की जगह “सुपर पावर सेंटर”

          लोकतंत्र की मज़बूती संसद से आती है, परंतु आज यह एकतरफा संवाद का मंच बन गई है। उदाहरण:

·        2023-24 के बजट सत्र में संसद का 78% समय बिना किसी चर्चा के विधेयकों को पारित करने में बीता

·        मानवाधिकार आयोग, चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी, सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाएं सत्ता के इशारे पर काम कर रही हैं।

·        राष्ट्रपति भवन की तुलना में प्रधानमंत्री कार्यालय ही सारे निर्णयों का केंद्र बन चुका है, यानी “सेंटरलाइज़ेशन ऑफ पावर”।

          “लोकतंत्र तब खतरे में होता है जब संस्थाएं जनता की नहीं, सत्ता की भाषा बोलने लगें।” — डॉ. राममनोहर लोहिया

3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: बोलना अपराध, चुप रहना मजबूरी:

         संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) कहता है कि हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, पर वास्तविकता क्या है? तथ्य और घटनाएँ–

·        पत्रकार गौरी लंकेश, जो दक्षिणपंथी झूठ का पर्दाफाश कर रही थीं, की हत्या कर दी गई।

·        कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को एक ऐसा मज़ाक करने के लिए जेल में डाल दिया गया, जो उसने किया ही नहीं था।

·        यूएपीएसेडिशन एक्ट (देशद्रोह कानून), और आईटी एक्ट का दुरुपयोग कर सरकार आलोचकों की आवाज़ कुचल रही है।

·        NDTV, The Wire, Scroll जैसे मीडिया संस्थानों पर आईटी छापे और मुकदमे आम हो चुके हैं।

4. मीडिया: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ या सत्ता का प्रचार तंत्र?

          भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा आज गोदी मीडिया बन चुका है। जनता की समस्याओं पर बहस करने के बजाय, यह टीआरपी के लिए “हिंदू-मुस्लिम”, “राष्ट्रवाद”, और “देशद्रोहियों को गोली मारो” जैसे शो दिखा रहा है। उदाहरण–

·        TRP घोटालेअर्णब गोस्वामी की बालाकोट स्ट्राइक की लीक चैट, और रिपब्लिक टीवी की पक्षधर रिपोर्टिंग लोकतंत्र की गिरती साख के गवाह हैं।

·        BBC की डॉक्यूमेंट्री (2023) “India: The Modi Question” पर सरकार ने देश में प्रतिबंध लगा दिया, छात्रों पर कार्रवाई की गई।

5. नागरिकों के अधिकार: कागज़ों में जीवित, जमीनी हकीकत में मृत :

          लोकतंत्र नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा करता है, लेकिन जब इन अधिकारों को ही संविधान की बजाय सत्ताधीश तय करने लगें, तो सवाल उठता है—ये लोकतंत्र है या कुछ और?

तथ्य:

·        सीएए-एनआरसी विरोध के दौरान महिलाओं, छात्रों, कार्यकर्ताओं पर निर्दय लाठीचार्ज और गिरफ्तारियाँ

·        बेरोजगारी दर 2024 में 8% से ऊपर बनी रही, लेकिन रोजगार नीति पर कोई सार्थक संवाद नहीं।

·        दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक समाज के साथ भेदभाव और हिंसा में लगातार वृद्धि।

·        हाथरस बलात्कारभीमा कोरेगांव केसझारखंड में मोब लिंचिंग

6. “नेता” नहीं, “भगवान” बनते जा रहे हैं शासक:

          लोकतंत्र में नेता जनता के प्रति जवाबदेह होता है, लेकिन जब वह जनता के प्रति नहीं, ईश्वरतुल्य पूजनीय बन जाए, तब वह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही की ओर बढ़ता है।

उदाहरणार्थ —

·        प्रधानमंत्री की फोटो हर राशन कार्ड, टीका प्रमाणपत्र और सरकारी स्कीम पर

·        “मोदी की गुफा”, “मोदी की थाली”, “मोदी मंदिर”, यह सब सार्वजनिक संसाधनों और संस्थाओं के साथ हो रहा है।

·        लोकतंत्र में नायक गढ़े जाते हैं, पर जब नायक देवता बन जाए, तो जनता भक्त बन जाती है, नागरिक नहीं।

7. संविधान—केवल किताबों में या व्यवहार में भी?

          डॉ. आंबेडकर ने कहा था–“संविधान केवल उतना ही प्रभावशाली होगा, जितना लोकतांत्रिक हम व्यवहार में होंगे।” आज क्या यही हो रहा है?

तथ्य और विचार:

·        संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कमजोर करने के लिए शिक्षा में ‘वेदों की महिमा’, ‘मनुस्मृति की व्याख्या’, और ‘संस्कृति की शुद्धता’ पर ज़ोर।

·        बाबा साहेब के विचारों को “आरक्षित सोच” तक सीमित किया जा रहा है — उन्हें संविधान निर्माता के बजाय दलित नेता तक सीमित कर देना, यह भी लोकतंत्र की संकीर्णता है।

क्या यह लोकतंत्र है?

          आज का भारत एक ऐसा राष्ट्र बनता जा रहा है जहाँ–

·        चुनाव होते हैं, लेकिन विकल्प नहीं।

·        संसद चलती है, पर संवाद नहीं।

·        संविधान है, लेकिन विवेक नहीं।

·        मीडिया है, पर प्रश्न नहीं।

·        जनता है, पर नागरिक नहीं — सिर्फ भक्त, उपभोक्ता, और मतदाता।

तो क्या यह लोकतंत्र है या कुछ और?
          शायद यह “चुनावी राजतंत्र”“धार्मिक राष्ट्रवाद”, या “चुनाव के आड़ में तानाशाही” है।
लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि विचार, विवेक, विरोध, और वैकल्पिकता का भी नाम है। अगर ये नहीं हैं, तो हमारे पास लोकतंत्र नहीं, सिर्फ उसका मुखौटा है।

आखिरी शब्द:

“लोकतंत्र को बचाने के लिए चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी है विवेक, और वोट से ज़्यादा ज़रूरी है सवाल।” यदि हम खामोश रहेंगे, तो लोकतंत्र ‘कुछ और’ में बदल जाएगा—ऐसी व्यवस्था में, जहाँ हम नागरिक नहीं, सिर्फ आँकड़े बन कर रह जाएँगे।

          प्रस्तुत लेख “ये लोकतंत्र है या कुछ और” को और अधिक समृद्ध किया गया है—इतिहास, संविधान के अनुच्छेद, प्रसिद्ध उद्धरण, विचारधारात्मक विमर्श, और समकालीन संदर्भों को जोड़ते हुए।

लोकतंत्र—सिर्फ चुनाव नहीं, एक संस्कृति:

          “लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन है।” – अब्राहम लिंकन

लेकिन भारत जैसे देश में, जहां धर्म और जातिभक्ति और भयशब्द और शस्त्र, सब एक साथ सत्ता के औजार बन गए हैं, वहाँ यह सवाल लगातार खड़ा होता है: क्या हम सचमुच एक लोकतंत्र में रह रहे हैं, या यह एक भव्य धोखे का नाम है? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 कहता है—“भारत, राज्यों का संघ होगा।” और अनुच्छेद 21 कहता है—“प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार होगा।”  परंतु जब विचार, अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता और सत्ता की आलोचना करना ‘देशद्रोह’ घोषित कर दिया जाए, तो संविधान की आत्मा घायल हो जाती है।

1. इतिहास से सीख: क्या लोकतंत्र हमेशा ऐसा ही था? संविधान सभा की चेतावनियाँ:

·        “हमने राजनीतिक समानता तो पा ली, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता अभी भी बनी हुई है। यदि हमने इसे नहीं मिटाया, तो यह लोकतंत्र एक ढकोसला बन जाएगा।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर (26 नवंबर, 1949)।

·        भारत में 1950 में जब लोकतंत्र लागू हुआ, तब इसकी नींव रखी गई नैतिक मूल्योंसंवैधानिक मर्यादा, और संस्थागत निष्पक्षता पर। पर समय के साथ ये संस्थाएं सत्ता की कठपुतली बनती गईं।

आपातकाल (1975–77): लोकतंत्र का पहला विध्वंस:

·        प्रेस पर सेंसरशिप

·        विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी

·        नागरिक अधिकारों का निलंबन

          उस दौर में लोकतंत्र संविधान के कागज़ों में जीवित था, लेकिन व्यवहार में मृत। आज जो परिस्थितियाँ हैं, वे कई मायनों में आपातकाल से भी अधिक खतरनाक हैं—क्योंकि अब यह लोकतंत्र के नाम पर किया जा रहा है।

2. लोकतंत्र और चुनावी धोखा: संख्या की तानाशाही: क्या बहुमत ही लोकतंत्र है?

          भारत में कोई भी दल 50% से अधिक जनता का समर्थन लिए बिना बहुमत प्राप्त कर सकता है। यह प्रथम-पद-प्राप्त प्रणाली (FPTP) की कमजोरी है। संवैधानिक अनुच्छेद:

·        अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार

·        अनुच्छेद 324–329: चुनाव आयोग के दायित्व

          लेकिन जब चुनाव आयोग खुद सत्ता के इशारे पर काम करे, EVM पर संदेह के बाद भी पारदर्शिता न अपनाई जाए और पूरा चुनाव ‘राम’, ‘कब्रिस्तान’, ‘मोदी जी की ताकत’ जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द घूमे तो यह चुनाव नहीं, एक धार्मिक युद्ध बन जाता है। “भक्त और नागरिक में फर्क होता है। नागरिक सवाल करता है, भक्त सिर्फ जयकारा लगाता है।” — खालिद हुसैन

 3. धर्म और लोकतंत्र: एक खतरनाक गठबंधन:

          भारतीय संविधान के प्रस्तावना में स्पष्ट लिखा है–“हम भारत के लोग, भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं…”

पंथनिरपेक्षता (Secularism):

          धर्म का शासन से अलग होना लोकतंत्र की रीढ़ है। परंतु आज–

·        सरकारी कार्यालयों में हवन और गोबर पेंट

·        प्रधानमंत्री द्वारा राम मंदिर का उद्घाटन

·        राज्य की शिक्षा व्यवस्था में वेद, कर्मकांड और संस्कृत थोपना

          यह सब संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। “राज्य का कोई धर्म नहीं होगा।” — सुप्रीम कोर्ट, एस. आर. बोम्मई केस, 1994। यदि सरकार धर्म विशेष का प्रचार करे, तो यह लोकतंत्र नहीं, थियोक्रेसी (धर्मतंत्र) होता है।

4. मीडिया: सूचना का अधिकार या भ्रम का अधिकार?

          संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। लेकिन जब पत्रकार पूछते हैं तो देशद्रोही कहलाते हैं। जब कॉमेडियन मज़ाक करता है, तो जेल में डाल दिया जाता है।

विचारधारा का पतन:

·        मीडिया TRP के लिए सांप्रदायिक उन्माद फैलाता है

·        सोशल मीडिया पर सरकारी ट्रोल आर्मी आलोचकों को गाली देती है

·        सूचना का अधिकार (RTI) कार्यकर्ता मारे जा रहे हैं

          “जिस देश में मीडिया डरता है, वहाँ जनता गुमराह होती है।” — अरुंधति रॉय

5. संस्थाएँ और संविधान की आत्मा:

          संविधान का अनुच्छेद 50 कहता है—“कार्यपालिका और न्यायपालिका में पृथकता होनी चाहिए।”

किंतु आज –

·        सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स—सत्ता विरोधियों पर कार्रवाई के लिए तत्पर रहता है;

·        चुनाव आयोग—सरकार के पक्ष में खड़ा है;

·        सुप्रीम कोर्ट—सत्याग्रहियों पर सख्त, सत्ता पर अक्सर मौन रहता है।

          “संविधान की शक्ति उसकी किताब में नहीं, उसके रक्षक संस्थानों में होती है।” — नोम चोम्स्की

6. न्याय का लोकतंत्र से रिश्ता: न्याय की समानता या प्रतीकात्मकता?

          भारत में संविधान के अनुच्छेद 14–18 समानता के अधिकार की गारंटी देते हैं।
परंतु क्या आज दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमों, स्त्रियों को समान न्याय मिल रहा है?

उदाहरण:

·        हाथरस बलात्कार: अपराधियों को सत्ता संरक्षण;

·        भीमा कोरेगांव केस: बुद्धिजीवी जेल में, बिना सुनवाई के;

·        बिलकिस बानो केस: बलात्कारी रिहा, नेताओं द्वारा स्वागत।

          “जहाँ न्याय में वर्ग, धर्म और जाति दिखने लगे, वहाँ लोकतंत्र नहीं, सामाजिक अधिनायकवाद होता है।” — जस्टिस कृष्ण अय्यर

7. नेता नहीं, भगवान बनते शासक: लोकतंत्र से भक्ति-तंत्र की ओर:

          लोकतंत्र में नेता जनता के प्रति जवाबदेह होता है। लेकिन जब वह आलोचना को गद्दारी, और सवाल को षड्यंत्र मानने लगे, तो वह ‘नायक’ से ‘भगवान’ बन जाता है।

चेतावनी:

·        प्रधानमंत्री की आलोचना को देश की आलोचना मानना;

·        सरकारी योजनाओं का नाम व्यक्ति विशेष पर;

·        ‘मोदी मंदिर’, ‘मोदी पूजा’, ‘मोदी की थाली’ जैसे कार्य।          

          “नेताओं का ईश्वर बन जाना लोकतंत्र का पतन है। क्योंकि ईश्वर को जवाब नहीं देना पड़ता।” — अशोक वाजपेयी

लोकतंत्र है या भ्रमलोक?

          क्या यह वही लोकतंत्र है, जिसकी कल्पना गांधी, अंबेडकर, नेहरू, लोहिया ने की थी?

·        जहाँ जनता को विकास नहीं, विभाजन मिलता है;

·        जहाँ संविधान को आरती की थाली में सजा दिया जाता है, पर नीतियों में रौंदा जाता है;

·        जहाँ चुनाव होते हैं, पर विकल्प खत्म;

·        जहाँ वोट होता है, पर प्रतिनिधि नहीं।

यह लोकतंत्र नहीं, “चुनावी साम्राज्यवाद”“वोट-तंत्र” या “धार्मिक-राष्ट्रवादी अधिनायकवाद” है।

आखिर किया क्या जा सकता है?

·        संविधान की पुनर्पाठ और जनचेतना;

·        स्थानीय स्तर पर नागरिक विमर्श और संगठनों का निर्माण;

·        स्वतंत्र मीडिया और वैकल्पिक सूचना स्रोतों का सशक्तिकरण;

·        शिक्षा में लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना;

·        “भक्त” से “नागरिक” बनने की मानसिक तैयारी।

           डॉ. आंबेडकर ने कहा–  “हमारा लोकतंत्र एक विरोध की संस्कृति पर खड़ा है। यदि हम विरोध करना छोड़ दें, तो यह तंत्र किसी दिन हमें निगल जाएगा।” इसलिए अब वक्त है पूछने का, बोलने का, और खड़े होने का—वरना इतिहास हमसे पूछेगा —“तुम चुप क्यों थे, जब लोकतंत्र ‘कुछ और’ बनता जा रहा था?”

निष्कर्षत: नागरिकता का पुनर्जागरण या लोकतंत्र का अंतिम संस्कार?

          लोकतंत्र किसी एक दिन, एक वोट, एक नेता या एक दल का नाम नहीं है। यह एक निरंतर अभ्यास है—जहाँ जनता सिर्फ शासक चुनती नहीं, उन्हें जवाबदेह भी बनाती है; जहाँ विरोध देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र की आत्मा होता है; और जहाँ संविधान केवल किताब नहीं, जीवन पद्धति होता है। लेकिन जब संविधान की आत्मा को धार्मिक प्रतीकों से ढंका जाए, संस्थाओं को गुलाम बना दिया जाए, और जनता को सिर्फ भक्त या ग्राहक में बदल दिया जाए—तब लोकतंत्र नहीं बचता, सिर्फ उसका ढांचा बचा रहता है। और ढांचा जब आत्मा से खाली होता है, तो वह लोकतंत्र नहींलोकतांत्रिक शवगृह होता है।

हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ:

          “लोकतंत्र तब मरता है जब लोग बोलना बंद कर देते हैं।”– अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री मेडलीन ऑलब्राइट। अब निर्णय जनता के हाथ में है—क्या वे एक जिम्मेदार नागरिक बनना चाहेंगे या एक मौन मतदाता? क्या वे सत्ता को चुनौती देने का साहस करेंगे, या उसके चरणों में आत्मसमर्पण कर देंगे?

          यदि हमने अपने विवेक, प्रश्न और अधिकारों की रक्षा नहीं की, तो एक दिन इतिहास हमें याद करेगा—जिन्होंने लोकतंत्र को कुछ और‘ में बदल जाने दियासिर्फ इसलिए कि वे चुप रहे।

अंततः, लोकतंत्र एक उपहार नहीं है, यह प्रत्येक पीढ़ी द्वारा अर्जित किया जाने वाला उत्तरदायित्व है। यह प्रश्न हम सबके सामने है–क्या हम उसे बचाएंगेया इतिहास में खो जाने देंगे?”

                                                0000

Exit mobile version