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क्या यही है इक्कीसवीं सदी के नये भारत का रामराज्य ? 

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 स्वराज करुण )

चौंकिए मत ! ये यूक्रेन नहीं ,भारत की राजधानी दिल्ली है! क्या ऐसे हॄदय विदारक दृश्य हमारी आत्माओं को नहीं कचोटते? क्या हमारी आत्मा हमें नहीं धिक्कारती ?अगर नहीं तो फिर हम आत्माविहीन चलती-फिरती लाशों के अलावा और क्या रह गए हैं ?

क्या हमें खुद पर शर्म नहीं आती कि हम कहीं दूर बैठे ऐसे दिल दहला देने वाले नज़ारों को देख रहे हैं ,जिनमें मनुष्य ही मनुष्य के सपनों को रौंदकर मिट्टी में मिला रहा है।  सभाओं में जलसों में मानवता,दया और करुणा की  की बड़ी -बड़ी बातें करने वाले संत -महात्मा , नेता ,अभिनेता भी यह सब देखकर  क्यों चुप हैं ?   आज यूट्यूब पर  एक संक्षिप्त वीडियो देखा ,जिसमें बुलडोजर के सामने एक युवक अपनी दुकान को बचाने के लिए हाथ जोड़कर रो रहा है ,मिन्नतें कर रहा है , छाती पीट रहा है और उसकी माँ उसे दिलासा देने की कोशिश करते हुए खुद भी रो रही है। यह वाकई एक विचलित कर देने वाला कारुणिक  दृश्य था। जिनका दिल ऐसे दर्दनाक नज़ारों को देखकर भी नहीं पसीजता ,उन्हें क्या माना जाए और क्या कहा जाए ?   कृपया कोई बताइए कि जिन छोटे -छोटे व्यापारियों की दुकानों , रेहड़ियों  और गुमटियों को बुलडोजरों से रौंदा जा रहा है , जिनके  घरों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है ,उनकी रोजी -रोटी के लिए  क्या व्यवस्था की जा रही है ? उनके उजाड़े गए मकानों के बदले उन्हें सिर छुपाने के लिए कहाँ वैकल्पिक इंतज़ाम किया गया है ?               उनके घरों के बच्चों की पढ़ाई का अब क्या होगा ?उनके परिवारों की माताओं ,बहनों और बुजुर्गों का क्या होगा? वो कहाँ सिर छुपाएंगे ?  इन ग़रीब और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों के  छोटे छोटे रोजगार को चौपट करने और  उन्हें घरों से बेघर करने वालों की आत्मा क्या उन्हें नहीं धिक्कारती होगी ? इनकी जगह पर अगर इन्हें उजाड़ने वाले स्वयं होते ,तब वो कैसा महसूस करते ?  

       अगर ये सब  अतिक्रमण था तो रातों रात तो नहीं हुआ होगा ? कोई ग़रीब बस्ती एक दिन में तो नहीं बस गई होगी ? किसी ग़रीब ने छुपकर तो अपना छोटा सा कोई आशियाना नहीं बनाया होगा ?इनमें से कई गरीबों को तो बाकायदा संबंधित नगर निगम से  दुकान ,गुमटी आदि के लिए लिखित अनुमति भी मिली हुई थी , बिजली विभाग से बाकायदा बिजली का कनेक्शन और पानी सप्लाई वाले विभाग से नल कनेक्शन भी मिला हुआ था ,जिसका बिल भी ये लोग हर महीने जमा करते रहे होंगे , फिर भी उन्हें उजाड़ दिया गया !        

हे राम ! क्या यही है इक्कीसवीं सदी के नये भारत का रामराज्य ? 

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