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Issue मुद्दा सहिष्णुता की इंतहा

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शशिकांत गुप्ते

English भाषा का शब्द Issue इशू इसका हिंदी में अनुवाद होता है मुद्दा
वास्तव में राजनीतिशास्त्र नीति निर्धारण का मोर्चा है।
राजनीतिशास्त्र का उपयोग Management मैनेजमेंट मतलब प्रबंधन रूपी शस्त्र के रूप किया जा रहा है। मतदातओं,विपक्षिदलों और निर्वाचन की प्रशासनिक व्यवस्था को भी मैनेज किया जा रहा है।
जोड़, घटाओं, गुणा भाग के गणित को जोड़तोड़ में बदल कर Commission का अर्थ, अर्थ मतलब रुपयों के लेनदेन में तब्दील किया जा रहा है।
इसीकारण मूलभूत issue (मुद्दे) वादों और दावों के बनावटी आवरण में शिशु (issue का हिंदी में अनुवाद संतान भी होता है) अवस्था में ही सीमित रह जातें हैं। इन मुद्दों को कागजी कार्यवाही में विकसित अवस्था में दर्शया जाता है। बहुत से इशू तो गर्भवस्था में ही गर्भपात का शिकार हो जातें हैं।
राजनीति में प्रबंधन का शस्त्र के रूप में उपयोग कर महंगाई के मुद्दे को इसतरह गायब किया जाता है,मानो महंगाई सिर्फ विपक्ष के द्वारा विरोध करने का ही मुद्दा रह गया है। आसमान की ऊँचाई तक पहुँचने का प्रयास करती महंगाई को आमजन कौतूहल से देख रहा है। आसमान छूती महंगाई को देख आमजन की गर्दन अकड़ रही है और कमर टूट रही है, लेकिन कौतूहल में मग्न आमजन की सहनशीलता तारीफेकाबिल है।
बढ़ती बेरोजगारों की संख्या पर सिर्फ औपचारिक चिंता दर्शाई जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से कोरे आश्वासनों से बेरोजगारी मिटाने का नायब तरीका ईजाद कर इश्तिहारों में दिखाया जा रहा है।
भारत देश की जनता सच में बहुत सहिष्णु है। तमाम तरह के मुद्दों को दरकिनार कर त्योहारों का जश्न मनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। महंगाई में भी हर्षोल्लास के साथ महंगे आयोजन हो आयोजित किए जा रहें हैं। आस्था जागृत होने पर महंगाई महसूस नहीं होती है।
बहुत से अहम मुद्दे फाइलों बन्द पड़े हैं। तादाद में बेगुनाह लोगों के मुक़द्दमे न्यायायल की फाइलों में विचाराधीन है। लाखों युवतियों के तलाक़ के मुक़द्दमे न्यायालयों में वर्षो से विचाराधीन है।
बहुत सी जनहित की योजनाएं फाइलों में बंद पड़ी है।
घोटालों के आरोपों से भरी पड़ी फाइले खुलने के इतंजार में धूल का सेवन कर रही हैं।
एक फाइल ने पूरे देश में धूम मचा के रखी है। यह फिल्मी फाइल, भावनाओं का गुबार फूटने तक चर्चा में रहेगी? ऐसे नए नए भावनात्मक गुबार निरंतर सियासी बाजार में उपलब्ध होतें रहेंगे ऐसी आशंका विश्लेषक प्रकट कर रहें हैं। लेकिन सहिष्णु लोगों पर इसका कोई असर नहीं होता है।
मानसविज्ञान के अनुसार अति का अंत निश्चित है।
अति तब ही होती है, जब मति मारी जाती है। ऐसे अवस्था में मानव सावन के अंधे की तरह हो जाता है।
आधुनिकता सिर्फ फैशन तक सीमित हो कर रह गई है। फिल्मों में अभिनय करने वाली,अभिनेत्रियों में अंग प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा प्रगतिशीलता का द्योतक हो गई है। दूसरी ओर हिज़ाब पर बवाल मचाया जा रहा है।
ऐसे बावल को महत्वपूर्ण issue मतलब मुद्दा बनाया जा रहा है।
आश्चर्यजनक बात तो यह है कि,ऐसे मुद्दे लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने वालें प्रसंशनीय मुद्दे बन कर रह गएं हैं।
सहिष्णुता की अभी इतन्हा बाकी है। अभी तो इम्तिहान चल रहा है।
सारे सहिष्णु जन को सौ में सौ मार्क निश्चित ही प्राप्त होंगे।
इन्ही कामनाओं के साथ पूर्ण विराम।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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