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गौण हो रहें जनहित के मुद्दे चेहरे की आड़ में?

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शशिकांत गुप्ते

किसी कहानी पर फ़िल्म बनानी हो तो फ़िल्म निर्माता को कहानी पढ़कर कहानी के लिए उपयुक्त Suitable चेहरा ढूंढना पड़ता है।
प्रायः फिल्मों की कहानी कल्पनातीत होती हैं।
इनदिनों राजनीति में चेहरे की चर्चा जोरों पर है।
अहम प्रश्न तो यह है कि, राजनीति में मुद्दों का महत्व होना चाहिए। चेहरे का नहीं। चेहरे को महत्व देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विपरीत है।
यह भी समझना जरूरी है कि,किसी भी राजनैतिक दल के द्वारा चुनाव पूर्व किसी चेहरे को प्रस्तुत करना, मतलब ही राजनैतिक दल के पास एक ही व्यक्ति योग्य है। शेष सारे अयोग्य?
चुनाव पूर्व किसी व्यक्ति को प्रमुख पद के लिए घोषित करना मतलब थोपने जैसा प्रतीत होता है?
लोकतंत्र में निर्वाचन का महत्व है,नियुक्ति अलोकतांत्रिक प्रकिया महसूस होती है।
राजनैतिक दलों में चेहरे की चर्चा होती है,यह स्वाभाविक है लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में कार्यरत सजगप्रहरियों द्वारा जब चेहरे के बारे में सवाल किया जाता है तब लगता है कि, सजगपरहरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अनिभिज्ञ हैं?
फिल्मों में चेहरे का महत्व है कारण फिल्मों में एक ही चेहरा विभिन्न तरह का अभिनय करता है। फिल्मी कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन में झाँकने पर लगता है,फिल्मी कलाकरों का भारतीय संस्कृति, संस्कारो और आदर्शों से कोई लेना देना नहीं है?
इसलिए असली नकली सच्चा झूठा नामक फ़िल्म निर्मित होती है। ऐसी फिल्मों में गीत भी इसीतरह गाएं जातें हैं।
लाख छुपाओ छुप न सकेगा राज हो कितना गहरा
दिल की बात बता देता है, असली नक़ली चेहरा
इसी गीत ये पंक्ति भी विचारणीय है।
लोग तो दिल को खुश रखने को क्या क्या ढोंग रचाते है
भेष बदल कर इस दुनिया में बहरूपिये बन जाते हैं
इसतरह सच्चा झूठा फ़िल्म का यह गीत याद आता है।
दिल को देखो,चेहरा न देखो
चेहरे ने लाखों को लूटा
हाँ, दिल सच्चा और चेहरा झूठा

राजनीति में दिल से नहीं दिमाग़ से काम करना पड़ता है।
राजनीति में दिल से काम लेना मतलब जनता की भावनाओं से खेलना है, जो उचित नहीं है।
राजनीति में चुनाव पूर्व चेहरे की बात करना मतलब जनहित के मुद्दों से भटकना,साथ ही अधिनायकवाद को बढ़ावा देने जैसा प्रतीत होता है।
चेहरे की बात पर प्रसिद्घ शायरा
मोहतरमा अंजुम रहबर का ये शेर मौजु है।
मान लो कि चेहरे पर धूल है
इल्ज़ाम आईने पर लगाना फ़िजूल है

राजनीति में चेहरे पर जब चर्चा होती है तब शायर स्व. राहत इंदौरीजी का यह शेर याद आता है।
कहकर तो गए थे कि कपड़े बदल कर आतें हैं
लेकिन सब चेहरे बदल कर आए हैं
देश की जनता को चेहरे से कोई लेना देना नहीं है। जनता तो यही चाहती है कि जो भी सत्ता सम्भाले उसकी कथनी करनी में भिन्नता नहीं होनी चाहिए।
वादे किए जाएं तो ईमानदारी से निभाए भी जाएं।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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