दीपक असीम
मुनव्वर राना को पहली बार रानीपुरा में मुन्ना अंसारी के घर सुना था। नब्बे का दशक रहा होगा। तब मुनव्वर की शोहरत अपनी उड़ान भर ही रही थी। रानीपुरा में जफर अंसारी उनके जबरे फैन थे। उस ज़माने में इंटरनेट नहीं था, रेख्ता जैसी कोई साइट नहीं थी जहां हर शायर का हर शेर मिल जाए। जफर अंसारी जैसे फैन हर शायर के लिए एक पूंजी थे, जो उनके तमाम शेर अपनी याददाश्त में रखते थे और लोगों को सुनाया करते थे। मुन्ना अंसारी के यहां मुनव्वर राना ने बहुत से शेर भी सुनाए थे। मुशायरे जैसा ही परफारमेंस दिया था। फिर जफर अंसारी को अटैक आया तो मुनव्वर न सिर्फ देखने आए बल्कि इलाज में मदद भी की थी।
ये वो दौर था कि जब पुरानी शायरी से बगावत हो रही थी। शायरी में नए विषय, नई बातें आ रही थीं। मुनव्वर का रंग बिल्कुल नया था। भाषा एकदम सरल। तमाम मुशायरे वे लूट लिया करते थे। उनसे दोस्तीनुमा परिचय कब हुआ याद नहीं। फिर मुनव्वर की किताब आई। गजलगांव या मोरपांव…। वे खुद अपनी किताबें छपवाते थे और पूरे देश में अपने चाहने वालों के जरिये लोगों तक पहुंचाते थे। उनकी किताब जैनसन बुक डिपो पर रखवाई और अखबार में खबर छाप दी। किताबें हाथो हाथ बिक गईं तो और मंगाई। बहुत खुश हुए कि उनकी किताब इंदौर में पहले पहल बिकी और इतनी सारी बिकी। बाद में और किताबें इसी तरह आईं। फिर उनका परिचय रूपांकन लाइब्रेरी वाले अशोक दुबे जी से हुआ और आगे का काम उन्होंने संभाल लिया।
रिश्ते निभाने के मामले में मुनव्वर लाजवाब थे। 2009 का लोकसभा चुनाव कवर करते हुए रायबरेली में उनके घर मेहमान हुआ। वे तो किसी मुशायरे में थे, मगर घर पर फोन कर दिया था। इतनी ज्यादा मेहमाननवाजी हुई कि मेहमान परेशान हो गया। मुनव्वर की जो बेटियां एनआरसी के खिलाफ आंदोलन में पेश पेश रहीं, वे ही ध्यान रखती थीं। नाश्ते से लेकर डिनर तक इतना तकल्लुफ होता था कि परेशान होकर झूट बोल दिया कि यहां काम हो गया अमेठी जा रहा हूं। उनके घर से एक किलोमीटर दूर एक लॉज में जाकर टिक गया, मगर जब काम से बाहर निकलो, तो उनके घर के किसी फर्द से मुलाकात हो जाए। फिर झूट बोलना पड़ता था कि अमेठी के एक होटल में हूं यहां तो एक काम से आ गया था।
पता नहीं कैसे आखिर आखिर में राहत और मुनव्वर में कुछ लागडाट सी हो गई थी। मुनव्वर ने इंदौर को अपना तीसरा खेमा सा बना लिया था। कोलकाता और रायबरेली के बाद इंदौर…तीसरा ठिकाना बना। घुटने का घटिया ऑपरेशन भी यहीं के अस्पताल में हुआ और उन्होंने बहुत दुख पाया। मगर यहां टिके रह कर राहत इंदौरी को परेशान करने का जो मज़ा वे लेना चाहते थे, ले रहे थे। वे जैसे बताना चाहते थे कि तुम्हारे शहर में मेरे चाहने वाले तुम्हारे चाहने वालों से ज्यादा हैं। मुनव्वर शराब नहीं पीते थे और शराब की वजह से जो कठमुल्ला टाइप लोग राहत से खफा रहते थे, वे
कठमुल्ले ही उनके भगत बने। शायरी की समझ उनमें कितनी थी नहीं पता, मगर खेमेबाजी में माहिर थे। आखिरकार मुनव्वर को समझ आ गया कि इंदौर में रहे तो उनकी शुगर बढ़ती चली जाएगी और इलाज कुछ होगा नहीं। राहत से अनबन खत्म हुई या नहीं हुई नहीं पता, मगर उन्होंने इंदौर का मोह छोड़ दिया और खेमा तोड़ दिया।
मुनव्वर राना की शायरी आखरी में आत्मदया पर केंद्रित हो गई। अपनी मौत पर शेर कहते कहते वे रुंआसे हो जाते। कभी कभी तो रो भी देते। मौत उनके लिए ऐसी अत्याचारी शै थी, जो बिलावजह उन्हें सताने और ले जाने पर तुली हुई थी। ईमानदारी और हेकड़ी उनके खून में थी। सच्चाई के लिए कोई भी कीमत अदा करने में वे पीछे नहीं थे। हालांकि सत्ता के खिलाफ कुछ बोला भी, फिर माफी भी मांग ली। मगर इसका पछतावा रहा उन्हें और एनआरसी सीएए के खिलाफ उनके बयानात लगातार सुर्खियों में रहे। उनकी बेटियों पर मुकदमे भी कायम हुए। मीठे और मीठी बातों के बहुत शौकीन रहे। शायरी के अलावा जो आपबीती उन्होंने लिखी, उसमें मुश्ताक अहमद युसूफी सरीखा विट है। मुनव्वर राना के जाने के बाद मुशायरों की दुनिया का एक और सुपरस्टार चला गया है।
तो ये शेर बहुत अच्छा है
रगों में दौड़ता सारा लहू ईमान वाला है, मगर ज़ालिम समझता है कि पाकिस्तान वाला है…।
कतील शिफाई ने जब मुनव्वर राना यह शेर सुना तो सोच में पड़ गए। बाद में कुछ लोगों के बीच जब इस शेर की चर्चा निकली तो कतील साहब ने कहा शायरी में बात इशारों में की जाती है। तो इस शेर को उसी हिसाब से अगर देखा जाए तो इसका मतलब कुछ और निकलता है। उस मजमे में एक आदमी मुनव्वर राना का भक्त तो नहीं था, मगर कतील शिफाई की शराबखोरी की वजह से उनसे चिढ़ा हुआ था। कहने लगा कतील साहब ये गलत बात है। मुनव्वर आपकी इज्जत करते हैं, तारीफ करते हैं और आप उनके शेर में कीड़े निकाल रहे हो। कतील ने पूछा – क्या सचमुच मुनव्वर मेरी तारीफ करता है। जवाब मिला हां बिल्कुल करता है। तो फिर ये शेर बहुत अच्छा है…कह कर कतील साहब ने बात खत्म कर दी। मुनव्वर राना दक्षिणपंथियों के निशाने पर भी आए जब उन्होंने यह शेर कहा – हमारी दोस्ती से दुश्मनी शर्माई रहती है, हम अकबर हैं हमारे घर में जोधाबाई रहती है। मगर मुनव्वर कभी कहीं सांप्रदायिक नहीं हुए। बाबरी मस्जिद विवाद के ज़माने में जब उर्दू का मंच फिरकापरस्ती के जहर से हरा हो गया था और हर शायर इस्लाम का प्रचारक सा हो गया था, मुनव्वर की शायरी इंसानियत की झंडाबरदार ही रही। हिंदुओं के हर त्योहार, हर रस्म की उन्होंने इज्जत की और रायबरेली में होते थे, तो होली दिवाली में शिरकत भी करते थे। हिंदू त्यौहार उनके लिए लोगों से मिलने, मुहब्बत करने और मिठाई खाने का एक मौका थे।
दीपक असीम

