शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी सुबह मेरे पास आए,और मुझे से अपने साथ चलने का कहा।
मैने पूछा कहां जाना है?
सीतारामजी ने कहा ढूंढने जाना है।
मैने पूछा क्या ढूंढना है?
सीतारामजी ने कहा किसी भ्रष्ट नेता को ढूंढना है।
मैने कहा यह कार्य मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है।
सीतारामजी ने मुझ से पूछा क्यों,कैसे?
मैने कहा जब जांच एजेंसियां कईं दिनों,कईं घंटों तक पूछताछ के बात भी किसी भी नेता का भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं कर पाती है,तो क्या हम किसी भ्रष्ट नेता को कभी ढूंढ पाएंगे?
मैने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा,भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन कर भ्रष्टाचार की सफाई के लिए हाथों में झाड़ू थामने वालें,मदिरा का सेवन करने वालों को मदिरा सरलता से उपलब्ध होने के लिए नीति बनाते हैं?
यही लोग रेवड़ी संस्कृति को जन्म देते हैं।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन के मुखिया पर किसी दल विशेष की कोई सरपरस्त संस्था ने,आंदोलन को प्रायोजित किया था,ऐसा आरोप लगता है?
आंदोलन की समाप्ति के बाद आंदोलन का मुखिया अदृश्य हो जाता है। भ्रष्टाचार और जन लोकपाल भी राजनीति के पटल से गायब हो जाता है।
आंदोलन, देश में सर्वत्र कीचड को फैलाने के लिए और हाथों में झाड़ू थाम कर सत्ता में विराजित होने के लिए काम आता है।
मैने सीतारामजी से कहा,भ्रष्ट नेता को ढूंढने से पहले अद्भुत,और अदृश्य,वाशिंग मशीन की ख़ोज करने वाली तकनीक पर विचार करना होगा।
इस वाशिंग मशीन की तकनीक की ख़ोज सिर्फ एक स्लोगन से हुई हैं। यह स्लोगन है ना खाऊंगा ना खाने दूंगा
इस स्लोगन का प्रचार बहुत जोर शोर से किया गया है।
यह वाशिंग मशीन भ्रष्टाचारी को स्वच्छ करने के बाद उसे पद प्रतिष्ठा भी प्रदान करती है।
इस वाशिंग मशीन में ऐसा चुंबक फिट किया गया है कि,यह चुंबक भ्रष्टाचार में सराबोर व्यक्तियों को अपनी ओर खींच लेता है।
गलत मत समझना,यह मशीन भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने के लिए नहीं,भ्रष्टाचार को साफ करने के लिए इज़ाद की गई है।
सीतारामजी ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा सच में भांग तो पूरे कुएं में घुली हुई हैं।
दूध और पानी को अगल करने की क्षमता तो हंस पक्षी में होती है।
कुएं के पानी में घुली भांग को अलग करने की क्षमता किसी भी प्राणी में नहीं है?
जो भी प्राणी भांग अगल करने की कोशिश करेगा उसे भांग का नशा चढ़ जाएगा।
भांग के नशे पर मुझे एक विनोद याद आया,पांच लोगों ने गांव के बाहर जाकर भांग का भरपूर सेवन किया। इन पांचों में एक लंगड़ा,एक लूला,एक अंधा,एक बहरा,और एक नग्न था।
जब भांग ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो बहरा बोला मुझे डाकू दल का शोर सुनाई दे रहा है,अंधा बोला मुझे पूरे बीस डाकू दिखाई दे रहे हैं,लंगड़ा बोला चलो भाग चलते हैं,अंत नंगा बोला तुम लोग कुछ नहीं कर पाओगे मुझे ही लुटावाओगे।
सीतारामजी को विनोद सुनकर जोर की हँसी आ गई,हँसते हुए सीतारामजी ने कहा अच्छा व्यंग्य है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

