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जार्ज को केवल आपातकाल का हीरो मानना सही नहीं है

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प्रवीण मल्होत्रा

आज जॉर्ज साहब (पद्मविभूषण समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नीन्डिस) की पुण्यतिथि है. लंबी बीमारी के बाद 29 जनवरी 2019 को उनका निधन हो गया था. फेसबुक पर उनके बारे में काफ़ी लिखा जा रहा है. मैं भी बचपन से लेकर उनके रक्षामंत्री बनने तक उनके निकट सम्पर्क में रहा हूं. इसलिए उनके बारे में मेरा भी निजी विश्लेषण है जो संक्षेप में प्रस्तुत है :-

कुछ विश्लेषणकर्ता जॉर्ज साहब को सिर्फ आपातकाल की पैदाइश मानते हैं. यह सही नहीं है. जॉर्ज साहब सिर्फ आपातकाल की पैदाइश नहीं थे. वे 1967 में ही बॉम्बे/बम्बई (वर्तमान मुंबई) से लोकसभा का चुनाव जीत चुके थे. 1970 के दशक में वे बम्बई के मजदूरों और ट्रेड यूनियनों के एकछत्र कद्दावर नेता बन चुके थे, जिनके एक आव्हान पर पूरी बंबई बन्द हो जाती थी. 1974 में उन्होंने रेलवे मेन्स फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में देश में सबसे बड़ी रेल हड़ताल करवाई थी. जिससे लगभग दो महीने तक पुरे देश की यात्री और गुड्स रेलों के पहिये थम गए थे. इस एतिहासिक रेल हड़ताल को इंदिरा गांधी की सरकार ने बहुत निर्ममता से तोड़ा था. जॉर्ज साहब सहित हजारों रेल मजदूरों और रेलकर्मियों को जेलों में डाल दिया गया था और उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया था. आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी सरकार बनी तब रेल मंत्री सोशलिस्ट लीडर मधु दंडवते जी ने जॉर्ज साहब के जबरदस्त आग्रह और दबाव को स्वीकार कर सभी बर्खास्त रेलकर्मियों को नौकरी पर बहाल किया था. जॉर्ज साहब की राजनीति का एक अहम पड़ाव था एमरजेंसी का भूमिगत रहकर सक्रिय विरोध करना और बड़ोदा डायनामाइट षड़यंत्र केस. 1977 में यदि कांग्रेस पराजित नहीं होती तो सम्भवतः देशद्रोह के झूठे आरोप में जॉर्ज साहब को फांसी या उम्र कैद हो सकती थी.

उनके स्वर्णिम राजनीतिक कैरियर के बावजूद उनकी दो नकारात्मक भूमिकाओं का उल्लेख करना भी जरूरी है. वह जॉर्ज साहब के लम्बे राजनीतिक जीवन पर काले धब्बे के रूप में दर्ज हैं. बावजूद इसके भारत के समाजवादी आंदोलन की राजनीति को जॉर्ज साहब ने जो योगदान दिया था वह भी अभूतपूर्व है.

जॉर्ज साहब की दो नकारात्मक भूमिकाओं को स्वीकारा नहीं जा सकता है –

  1. गोधरा कांड के बाद गुजरात नरसंहार में गुजरात की बीजेपी सरकार का समर्थन करना और
    2.ओड़िशा में पादरी ग्राहम स्टेन और उनके दो मासूम बच्चों को जीवित जला देने पर कोई विरोध दर्ज नहीं कराना.

अटलजी की कैबिनेट में वे कांग्रेस विरोध के कारण और बिहार में लालू प्रसाद यादव की दबंगता की प्रतिक्रिया में शामिल हुए थे.अटलजी 24 दलों की एक मिली जुली सरकार चला रहे थे और उस समय बीजेपी ने अपने तीनों प्रमुख मुख्य मुद्दे – राम मंदिर निर्माण, धारा 370 और समान नागरिकता – हाशिये पर धकेल दिए थे. इसलिए जॉर्ज साहब, शरद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान उस मोर्चा सरकार में शामिल हुए थे. गुजरात दंगों के विरोध में सिर्फ रामविलास पासवान ने ही मन्त्रीमण्डल से इस्तीफा दिया था. बाकी के समाजवादियों को भी इस्तीफा देना चाहिए था.

जॉर्ज साहब को अपने पुराने समाजवादी तेवर के अनुरूप यह मांग करना चाहिए थी कि गुजरात की सरकार को बर्खास्त किया जाये और वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाये अन्यथा वे इस्तीफा दे देंगे. उनकी यह मांग अटलजी को स्वीकार करना पड़ती क्योंकि वे NDA के संयोजक और सरकार के संकट मोचक भी थे. यदि आरएसएस के दबाव में आकर अटलजी जॉर्ज साहब की बात नहीं मानते तो उनकी सरकार गिर भी सकती थी. 1979 में मोरारजी देसाई सरकार के पक्ष में धुंआधार भाषण देने के अगले ही दिन उन्होंने चौधरी चरणसिंह को समर्थन देकर मोरारजी की सरकार को गिरा दिया था. यदि गुजरात के दंगों के विरोध में जॉर्ज साहब इस्तीफा दे देते तो सम्भवतः वे देश के अगले प्रधानमंत्री भी बन सकते थे और देश में साम्प्रदायिक शक्तियाँ कभी इतनी मजबूत नहीं हो पाती जितनी वे आज हैं. यह सिर्फ काल्पनिक अनुमान ही है. सच्चाई तो सबके सामने है ही. आज उनकी पुण्यतिथि है. उनकी स्मृति को शत शत नमन. 🙏🙏

नीचे दिया गया चित्र ऐतिहासिक चित्र है, जिसमें प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जॉर्ज साहब और लैला कबीर जी के विवाह समारोह में बधाई देने के लिए आई थीं. सम्भवतः इसका कारण यह था कि लैला जी के परिवार के साथ नेहरू परिवार की गहरी मित्रता थी और लैला जी के पिता प्रो. हुमायूं कबीर जो प.बंगाल के राज्यपाल भी रहे थे, नेहरूजी के निजी मित्रों में से थे. उसी पारिवारिक रिश्ते का निर्वाह करने इंदिराजी अपने सबसे बड़े विरोधी को उनकी शादी पर बधाई दे रही हैं.

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