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*मामा बालेश्वर दयाल जैसा बनना अब मुश्किल है* 

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 राजीव रंजन उपाध्याय

पिछले दिनों दो मित्रों की फेसबुक पोस्ट के जबाब में मामा बालेश्वर दयाल के जीवन से जुडी स्मृतियाँ ताजा हुईं ! मध्यप्रदेश के समाजवादी आंदोलन से परिचित व्यक्तियों को मामा का परिचय देने की आवश्यकता नहीं ! उनका कार्यक्षेत्र मध्यप्रदेश -राजस्थान तथा गुजरात का भील अंचल था ! प्रभाव इतना कि 1957 के लोकसभा चुनाव अपने क्षेत्र से दो महिलायों को पार्टी टिकट पर जितवाया ! गुना के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पूर्व विधायक धर्मस्वरूप सक्सेना को उनका बहुत सान्निध्य और स्नेह मिला ! अकसर पुराने वाकया सुनाया करते थे ! मेरे वर्षों के आग्रह के बाद संस्मरण पर किताब लिखने को राजी हुए, जिसका संपादन ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार राम विद्रोही जी ने किया !

         मामा गुना प्रवास पर आये ! रात में धर्मस्वरूप सक्सेना जी से कहा, धर्मस्वरूप सरकार से एक पत्र आया है, तय नहीं कर पा रहा क्या करूँ ! कह कर पत्र पढने को सक्सेना जी को दे दिया ! पत्र मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का था जिसमें उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें भोपाल में एक प्लाट देने का शासन के निश्चय पर उनकी सहमति चाही गई थी ! पत्र पढ़कर धर्मस्वरूप जी असमंजस में क्या राय दें ! वे मामा को अच्छी तरह जानते थे ! संकोच करते हुए कहा, मामा जी मुझे तो हाँ कहने में इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती ! आपने तो माँगा नहीं था ! जब सरकार स्वेच्छा से दे रही है तो हर्ज क्या ? मामा ने मौन गर्दन हिलाई, बोले धर्मस्वरूप अब तुम वकील हो गए हो ! तर्क अच्छा करते हो ! अच्छा एक कागज -पेन ले आओ ! फिर पत्र लिखवाया – ” आदरणीय मुख्यमंत्री जी आपका पत्र मिला ! आपके निश्चय के लिए धन्यवाद ! मैंने देश की सेवा किसी प्रलोभन में नहीं की ! पूरी भारत भूमि मेरी है, उसका एक टुकड़ा लेकर क्या करूँगा ! पत्र पूरा करवाकर लिफ़ाफ़े में बंद करवाया ! धर्मस्वरूप जी को आदेश दिया, इसी वक़्त डाक के डिब्बे में डाल कर आओ ! कहीं तुम जैसे स्नेहियों के आग्रह व् तर्क से मेरा मन न डोल जाए !

              दूसरा किस्सा मामा चुनाव लड़ रहे थे ! उनके समर्थक युवा उनके यहाँ पहुँच गए ! मामा ने सुविधा के लिए आसपास गांवों से मांग कर कुछ साइकिलों की व्यवस्था की थी ! सभी युवाओं को क्षेत्र में संपर्क का साधन साइकिल दिखा दी गईं ! तय था कि सुबह खाना खा कर निकल पड़ेगें ! कुछ साथियों ने धर्मस्वरूप जी से कहा मामा जी दस-दस रुपये मांग लो, एकदम खाने पीने की व्यवस्था कैसे हो पायेगी ! अब मामाजी से कैसे कहें ! मामा ने देखा कि सुबह नाश्ता भी हो गया फिर भी लड़के निकल नहीं रहे ! उन्होंने टोका, क्यों देर क्यों कर रहे हो ! बस अभी निकल रहे हैं , कह कर अचकचाते रहे ! उनके दो-तीन टोकने के बाद धर्मस्वरूप जी ने डरते -डरते कहा मामा जी लड़के चाहते हैं कि रास्ते खर्च के लिए दस-दस रुपये मिल जाएँ, बाद में तो वे अपनी व्यवस्था कर लेगें ! सुनते ही मामा ने जोर से कहा, सब अपनी साइकिलें रख दो ! कहीं जाने की जरुरत नहीं ! जो क्षेत्र में जाकर अपनी रोटी नहीं कमा सकता वो मेरे लिए वोट कैसे कमायेगा है ! सुनते ही लड़कों के होश गुम ! सबने चुपचाप साइकिल उठाई और निर्धारित क्षेत्र में निकल गए ! आज मामा हमारे बीच नहीं हैं शायद वे एकलौते समाजवादी होंगें जिनके उनके कार्यक्षेत्र में उनके सौ से ज्यादा मंदिर हैं ! आदिवासी आज भी अपनी पहली फसल लेकर उन्हें चढाने आते हैं ! घर में नवजात को उनका आशीर्वाद दिलवाने लाते हैं ! हर साल उनकी याद में पर बीस -पच्चीस हजार आदिवासी स्वप्रेरणा से जुटते हैं ! मेला होता है ! 

 ऐसे ही मध्यप्रदेश के एक विधायक रहे विष्णु प्रसाद शुक्ला ! फक्कड़ ! उनके घर चूल्हा नहीं था ! पूरा नगर यह जानता था ! सुबह शुक्ला जी नहा धोकर निकलते, जिस घर से आग्रह हुआ भोजन ग्रहण किया ! नहीं मिला तो घर लौटकर पानी पी कर रह गए ! यही क्रम रात्रि का ! मुझे भी एक बार उनसे मिलने का अवसर मिला ! गजब के वक्ता ! ( मित्रों से आग्रह है, जो इनसे जुड़े रहे वे अनुभव जरूर साझा करें )  

उदाहरण तो बहुत हैं ! आपकी आँखें अब खुल रहीं हैं तो मैं क्या करूँ !

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