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…..है तो मुमकिन?

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शशिकांत गुप्ते

“कर” नाटक इतना ही लिख पाया था,एकदम सीतारामजी का मेरे घर आगमन हुआ। आते ही सीतारामजी ने कहा सांस्कृतिक मोर्चे के अंतर्गत नाटक की भी अहम भूमिका होती है।
नाटक की जगह नौटंकी करना गलत होता है।
नाटक एक पात्री भी होता है।
एक पात्रीय नाटक हास्य-व्यंग्य मिश्रित होता है तो दर्शकों का स्वस्थ मनोरंजन होता है।
लेकिन जब एक पात्रीय नाटक विनोद की जगह मसखरे के स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता है,तो वह नौटंकी की कहलाता है।
सीतारामजी ने कहा नाटक की कहानी में हमेशा, कुछ नया पन होना चाहिए।
हर बार सिर्फ वेष-भूषा और costume मतलब पोषाक बदलने से असलियत नहीं बदलती है। ऐसे व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किए नाटक को दर्शक नकारते हैं,और उलहाना देते हुए कहते हैं और “कर”नाटक?
पिछले दस वर्षो से ना तो नाटक की कहानी बदली ना ही संवाद बदले। ना ही संवाद deliver करने का तरीका बदला है।
संवाद की delivery मधुर आवाज में होती है तो, कर्ण प्रिय लगता है। दुर्भाग्य दस वर्षो में हर एक संवाद कर्कश आवाज में ही प्रस्तुत किया जा रहा है। इसलिए अब दिन-ब-दिन नाटक पूर्ण रूप से प्रभावहीन होता जा रहा है।
नाटक के प्रभावहीन होने का सबूत कर्नाटक राज्य ने बखूबी दे दिया है,संभवतः यही सिलसिला अन्य राज्यों में भी अनवरत चलता रहेगा?
नाटक को नौटंकी में बदलने वाले कलाकार को एक सुवाक्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
कुछ कलाकार अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझते हैं,लेकिन ऐसे कलाकार अंदर से खोखले होते हैं।
ऐसे कलाकार के नाटक जब Flop होने लगते हैं,तब यह ऐसा कलाकार अपने साथ अपनी पूरी टीम को नुकसान पहुंचाते हैं।
हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे वाला स्लोगन चरितार्थ होता है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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