राजकुमार कुकरेजा
कल अपने फेसबुक वाल पर मैंने एक पोस्ट शेयर की थी, जिसमें भारतीय वायुसेना द्वारा एयरलिफ्ट किये जा रहे ऑक्सीजन टैंकर्स, मेडिकल इक्विपमेंट का ज़िक्र था. बहुत सारे लोगों ने पोस्ट को ना सिर्फ लाइक किया बल्कि कहा कि ऐसे समय पर सेना ही आगे आ कर काम करती है.
जब ‘ऑक्सीजन एक्सप्रेस’ चलाई गई तो मेरी फेसबुक वाल पर कई लोगों ने ‘मोदी है तो मुमकिन है’ लिख कर उक्त ख़बर को पोस्ट किया. वो क्या है कि आईटी सेल ‘ब्रांडिंग’ का काम बखूबी कर लेता है और फिर व्हाट्सएप, फेसबुक वगैरह पर उसको वायरल कर देता है. इतना वायरल की लोग उसके पीछे की हकीकत तक भूल जाते हैं.
ऑक्सीजन एक्सप्रेस से जुड़ी कुछ जानकारी आपके साथ साझा करना चाहता हूँ. भारतीय रेलवे ने केंद्र सरकार के अनुरोध पर राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड के विज़ाग स्थित प्लांट से 100 मीट्रिक टन लिक्विड ऑक्सीजन लाने के किये एक हाई प्रायोरिटी ट्रेन चलाने का निर्णय लिया *जिसके लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया. ट्रेन को ऑपरेट किया ‘भारतीय रेलवे’ ने*, *उस समय ना तो आईआरसीटीसी आगे आया और ना ही निजी क्षेत्र का कोई बड़ा खिलाड़ी जिसके पास ‘लो फ्लोर डिब्बे’ थे जिसके माध्यम से कंटेनर्स को उसमें लोड करके भेजा जा सकता था.* तो वो ‘लो फ्लोर डिब्बे’ *भारतीय सेना*’ ने दिए जिसके माध्यम से वो अपने आयुध/अपने टैंकों/अपनी मशीनों को एक जगह से दूसरी जगह भेजते हैं.
अब आते हैं विज़ाग स्थित स्टील प्लांट पर जहां से उक्त ट्रेन को 100 मीट्रिक टन ऑक्सीजन ले कर आना था. आप में से शायद कइयों को ना पता हो पर *इस प्लांट को सरकार निज़ी हाँथो में बेचना चाहती है.* 18000 करोड़ रुपये के टर्नओवर और *740 करोड़ रुपये के नेट प्रॉफिट के बावजूद* सरकार इस प्लांट को निजी हाँथों में देना चाहती है. कोरोना की दूसरी लहर आने से पहले इसी प्लांट के कर्मचारी दो महीने से आंदोलित थे सरकार के इस निर्णय के खिलाफ. *प्रत्यक्ष तौर पर 40,000 लोगों को और अप्रत्यक्ष रूप से 400000 लोगों को रोजगार देता है ये स्टील प्लांट.* इस प्लांट में 5 ऑक्सीजन एक्सट्रैक्शन यूनिट लगी हुई हैं जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 2600 टन है.
खैर मुद्दे की बात ये है कि *जब जब देशहित की बात आती है तो देश के जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर को सम्भालने वाले पब्लिक सेक्टर यूनिट्स सबसे पहले खड़े हो जाते हैं.* *भारतीय रेल, भारतीय पोस्ट ऑफिस, सरकारी अस्पताल, सरकारी स्टील प्लांट, सरकारी बैंक, भारतीय सेना ये सब आज उस समय भी काम कर रहे हैं जब देश की एक बड़ी आबादी घर से बाहर निकलने में असमर्थ है* और महामारी का दंश झेल रही है.
जब आप किसी सरकारी अस्पताल का मज़ाक बनाते हैं, उसके इंफ्रास्ट्रक्चर का मज़ाक बनाते हैं तो आप कभी ये नहीं सोचते कि सरकार ने इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या किया? *जब बड़े बड़े निजी अस्पताल कोरोना के पेशेंट को एक अदद आईसीयू बेड के लिए 3 दिन में 100000 रुपये तक चार्ज कर लेते हैं,* किसी नेता, एमएलए, पत्रकार की गुज़ारिश पर एडमिट करते हैं *तब जा कर समझ आता है कि देश में मूलभूत सुविधाओं का नियंत्रण सरकारी हाँथों में होना क्यों ज़रूरी है.*
नासिक में जब ऑक्सीजन टैंक लीक होने से 24 लोग मर जाते हैं तो किस पर कार्यवाही हुई? आज दिल्ली में एक अस्पताल में ऑक्सीजन समाप्त हो जाने से 9 मरीज मर गए, किस पर कार्यवाही हुई?
*ये वही देश है जहाँ सरकार के अनुरोध करने पर भारतीय सेना के तीनों अंगों (एयरफोर्स, आर्मी, नेवी), डीआरडीओ (DRDO), आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB), डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (DPSU)और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने अहमदाबाद में 900 बेड, लखनऊ में 400 बेड और वाराणसी में 750 बेड के अस्थाई कोविड अस्पताल का निर्माण मात्र 9 घंटे में कर दिया.* सरकार के अनुरोध करने पर इन सभी ने अपने सभी रिटायर्ड सरकारी डॉक्टर्स/पैरामेडिकल स्टाफ से आग्रह किया है कि वो इस महामारी से लड़ने में अपना योगदान दें. और वो दे भी रहे हैं.
*ये वही देश है जहां बड़े बड़े निज़ी अस्पताल अपने नोटिस बोर्ड पर लिख कर लगा रहे हैं ‘ऑक्सीजन सप्लाई की ज़िम्मेदारी सरकार की है’.* कल को निज़ी अस्पताल लिख कर टांग देंगे ‘आयुष्मान भारत जैसी किसी योजना के लाभार्थी का इलाज यहाँ नहीं किया जाता है’ तब आप कहाँ जाएँगे? किससे जवाब माँगेंगे?
*सरकारी बैंकों के 1000 से ज़्यादा स्टाफ कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में आ कर काल कवलित हो चुके हैं.* परंतु *फिर भी मात्र 48 घंटे में शाखा को सैनीटाइज़ करने के बाद दुबारा खोल दिया जाता है* *ताकि आम जनता को परेशानी ना हो*. मेरा एक दोस्त जो कि बैंक में ही था, मात्र 32 साल की उम्र में कोविड का शिकार हो गया. अभी 3 साल पहले उसकी शादी हुई थी और 1 साल से कम उम्र की उसकी बच्ची है. अपनी आंखों के सामने 25 साल, 28 साल, 24 साल की उम्र के बैंकर्स को ज़िंदगी की जंग हारते हुए देख रहा हूँ पर कुछ भी कर पाने में असमर्थ हूँ. *हर रोज़ मेरे जैसे 10 लाख बैंकर्स अपनी जान हथेली पर रख कर अपने घरों से निकलते हैं, आम जनता से रूबरू होते हैं, बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के, बिना पीपीई किट के.* *सरकार अभी तक इन 10 लाख बैंकर्स को वैक्सीन तक नहीं लगवा पाई है* जबकि सरकारी दस्तावेजों में हमें ‘फ्रंट लाइन वर्कर्स’ और ‘एसेंशियल सर्विस’ का तमगा दिया गया है.
खैर,देर सवेर ये कठिन वक़्त भी गुज़र जाएगा, लेकिन देश की प्रायोरिटी क्या है ये सुनिश्चित करना बहुत ज़रूरी है. देश को ये समझना होगा कि मुसीबत के इस समय पर कौन लोग हैं जो देश के लिए आगे आ कर खड़े हैं. *किसी सरकारी कर्मचारी को ‘रिश्वतखोर’ ‘कामचोर’ बोलने वाले जो खुद ‘वर्क फ्रॉम होम’ कर रहे हैं उनके लिए भी प्रार्थना करता हूं कि भगवान ना करे कि उन्हें या उनके परिवार के किसी भी सदस्य को इस समय हमारे देश के जर्जर सिस्टम से जूझना पड़े, क्योंकि तुमने कभी उस जर्जर सिस्टम के पीछे की वजह को जानने की जदोजहद नहीं की*, कभी ये नहीं सोचा कि उस सिस्टम को कैसे अच्छा बनाया जा सकता है. तुम्हें तो बस उस सिस्टम की कमियां निकाल कर उसका मीम बनाना, उसका जोक बनाना अच्छा लगा.
*इस समय हर तथाकथित ‘रिश्वतखोर’ पुलिस वाला मैदान में है, हर ‘कामचोर’ बैंक वाला शाखा में बैठा है, हर ‘मक्कार’ नगर निगम कर्मी सड़कें साफ कर रहा है, कूड़ा उठा रहा है, हर ‘लॉस मेकिंग’ पब्लिक सेक्टर इस समय वो काम कर रहा है जो वो हमेशा करता आया है, और वो है ‘देशसेवा’.*
जाते जाते एक सवाल छोड़ जाता हूँ आपके लिए. आर्टिकल 21 पढ़ा है कभी आपने? नहीं पढ़ा हो तो गूगल करके पढियेगा. आपका अपना हक किस तरह से आपके किसी काम नहीं आएगा ये समझना बहुत ज़रूरी है आपके लिये
राजकुमार कुकरेजा द्वारा प्रेषित संदेश

