सनत जैन
भारत सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया भारत के निजी और सरकारी क्षेत्र के बैंकों को 2 बैंकों में विलय करने की योजना पर काम कर रही है। राष्ट्रीयकृत बैंकों को स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में तथा निजी क्षेत्र के बैंकों को एचडीएफसी बैंक मे विलय कराने की योजना तैयार की जा रही है। सरकार का मानना है, भारत में दो बड़े बैंक बना दिए जाने के बाद भारतीय बैंकों को वैश्विक मानचित्र में दुनिया के 20 बड़े बैंकों की सूची में शामिल कराया जा सकता है।
दो बड़े बैंक होंगे, तो वैश्विक स्तर पर भारत को इसका लाभ मिलेगा। भारत की अर्थव्यवस्था को गतिशीलता मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय प्रति स्पर्धा में भारतीय बैंक अन्तर्राष्ट्रीय बैंकों के मुकाबले में खड़े हो सकेंगे। सरकार का कहना है, अभी छोटे-छोटे बैंक होने से वैश्विक स्तर पर भारत के बैंक अपनी बेहतर भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है, भारत के बैंकों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। जिस तरह से भारतीय बैंकों में नगदी का संकट है। बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता चला जा रहा है। बैंकों का मुनाफा कम हुआ है।
रिजर्व बैंक आफ इंडिया के लाभ की राशि को सरकार हर साल प्राप्त करती है। जिसके कारण बैंकों की आंतरिक आर्थिक हालत भी खराब है। वह चाहकर भी बैंकों का जोखिम नहीं उठा सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक ने मिलकर दो बैंकों में भारत के सभी बैंकों के विलय की योजना पर काम करना शुरू किया है। यदि सभी बैंकों का इन दो बैंकों में विलय कर दिया जाता है। तो दिवालिया होने का जो खतरा अभी दिख रहा है, वह टल जाएगा।
सरकार का मानना है, आर्थिक स्थिति को बनाये रखने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए यह जरूरी हो गया है। भारत में 2 सबसे बड़े पूंजी वाले बैंकों को तैयार किया जाए। उन्हें वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाए। इससे राष्ट्रीकृत और निजी बैंकों की परिचालन लागत घटेगी। बैंकों का आर्थिक आधार आर्थिक सुधार होगा। जिसके कारण बैंकों को वैश्विक वित्तीय सहायता ज्यादा प्राप्त हो सकेगी। ग्राहकों को भी बेहतर कर्ज की सुविधा दी जा सकती है। बैंक लंबी अवधि के प्रोजेक्ट को कर्ज दे सकते हैं।
इसका भारतीय अर्थव्यवस्था में असर पड़ेगा। बैंक के कारोबार में डिजिटल सेवाओं को बढ़ाने में मदद मिलेगी। वैश्विक मुद्राओं के आदान-प्रदान में भी बैंकों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। सही मायने में भारत के बैंकों की आर्थिक हालत दिन प्रतिदिन खराब होती जा रही है। 2008 के अमेरिका में आए आर्थिक संकट के कारण सैकड़ो बैंक वहां दिवालिया हो गए थे।भारत की वित्तीय संस्थाओं का सबसे ज्यादा निवेश शेयर बाजार में है। शेयर बाजार में आस्थिरता देंखने को मिल रही है। इसका असर बैंकों पर पड़ना तय है। उससे बचने के लिए सरकार के सामने बैंकों के विलय के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है। सरकार बैंकों का विलय करके, बैंकों के खर्च को घटाना चाहाता है। कर्मचारियों की छटनी और स्थानांतरण से बैंकों के हजारों कर्मचारियों की नौकरी खत्म हो सकती है।
बैंकों में इससे असंतोष भी बढ़ सकता है। छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के बैंक उपभोक्ताओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। उपभोक्ताओं के लिए भाषा संबंधी एवं बैंकों की शाखा होने से जो विश्वास बना रहता था। उसमें अंतर आ सकता है। सिर्फ दो बैंक होने के कारण बैंकों का एकाधिकार बढ़ सकता है। जिसके कारण ग्राहकों की सुविधा और शुल्क में इसका असर देखने को मिल सकता है। बैंकिंग व्यवस्था अब हर परिवार से जुड़ी हुई है। चाहे वह गरीब हो या अमीर हो या मध्यम वर्ग हो। बैंकिंग में गरीबों की संख्या 65 फ़ीसदी तक है, जो बैंकिंग से जुड़े हुए हैं।
सरकार बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए सभी बैंकों को 2 बैंकों में विलय की तैयारी कर रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है, इसके जो भी परिणाम सामने आएंगे, उसका दूरगामी असर हो सकता है। पिछले एक दशक में बैंकिंग की दुनिया में भारी परिवर्तन हुआ है ऑनलाइन लेनदेन लगातार बढ़ा है, साइबर फ्रॉड भी बड़ी तेजी के साथ बढे हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में सरकार के लिए यह निर्णय भारी भी पड़ सकता है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है, रिजर्व बैंक और सरकार को इस मामले में बहुत सोच विचार के साथ निर्णय करने की जरूरत है। बैंकिंग व्यवस्था से हर परिवार जुड़ा हुआ है, इसका दिनचर्या पर प्रभाव पड़ता है। बैंकों में जमा और कर्ज की जो वर्तमान व्यवस्था है। उसमें यदि जमा कर्ताओं का विश्वास एक बार बैंकिंग व्यवस्था से उठ गया, तो फिर इसे बहाल करना बहुत मुश्किल होगा।
निश्चित रूप से सरकार जो निर्णय ले रही है, उसमें सरकार और रिजर्व बैंक ने होने वाले फायदे और नुकसान को लेकर चिंतन किया होगा। भारत जैसे विशाल देश में जहां पर इतनी सारी भाषाएं हैं। सेवा के क्षेत्र में भाषाओं और व्यक्तिगत जुड़ाव का बड़ा महत्व है। सरकार को इस समस्या पर भी ध्यान देने की जरूरत है। बैंकों के विलय होने से बैंक कर्मचारियों की छटनी होगी।
वहीं बैंकिंग सेक्टर में नौकरी के अवसर भी स्थाई रुप से बहुत कम हो जाएंगे। इस चुनौती पर भी सरकार को ध्यान में रखने की जरूरत है। जल्दबाजी में लिया गया निर्णय कहीं सरकार और जनता पर भारी तो नहीं पड़ेगा, इस पर चिंतन करने की जरुरत है।

