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*इज़हार भी इश्तिहारों में*

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शशिकांत गुप्ते

आज जब मै सीतारामजी से मिलने गया,वे इश्तिहार पर विभिन्न शायरों द्वारा रचित शायरी पढ़ रहे थे।

मैने कारण पूछा? तो जवाब में सीतारामजी ने मुझे शायर *बशीर बद्रजी* का लिखा ये शेर सुना दिया।

*मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मोहब्बतों की कहानियाँ*

*जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो*

शेर सुनने के बाद मैने पूछा आज आप इश्तिहारों पर व्यंग्य लिख रहे हो?

सीतारामजी ने कहा इन दिनों समाचार माध्यमों में खबरें कम और इश्तिहार ज्यादा पढ़ने,देखने,

और सुनने में आतें हैं।

देश की आर्थिक स्थिति का हाल ऋण के बोझ से असहनीय हो रहा है,दूसरी ओर हर क्षेत्र में उन्नति के बेशकीमती  इश्तिहारों की भरमार है?

इश्तिहारोंं का व्यापार इतना विकसित हो रहा है कि इस मुद्दे पर शायर *कैफ़ी आज़मी* रचित एक गज़ल के चंद आशआर मौंजू हैं।

*मै खड़ा था कि पीठ पर मेरी*

*इश्तिहार इक लगा गया कोई*

*ऐसी महंगाई है कि चेहरा भी*

*बेच के अपना खा गया कोई*

सीतारामजी ने कहा इन दिनों इश्तिहार में अबोध बालको का इस्तेमाल किया जा रहा है।

जिन पालकों में सामन्य और व्यवहारिक ज्ञान होता है तो वे अपने बच्चों को धूल,मिट्टी और कीचड़ में खेलने से रोकते हैं।

ये इश्तिहार बनाने वाले अबोध बालक और बालकों को कीचड़ धूल, और मिट्टी में खेलने के लिए प्रोत्साहित करतें हैं और इन बालकों की मम्मियां जो मॉडलिंग के व्यवसाय करती है,वे कहती है,सिर्फ चंद रुपयों में दाग साफ हो जाएंगे।  ऐसे विज्ञापनों का आशय यह समझना चाहिए कि विज्ञापनों में दर्शाया साबुन गंदे कपड़े साफ नहीं करता है,बल्कि जान बुझ कर गंदे किए गए कपड़ों को साफ करता है?

ठीक अदृश्य वाशिंग मशीन जैसा।

सीतारामजी ने कहा इस तरह के विज्ञापन सफाई पखवाड़े के विज्ञापन जैसे लगते हैं।

सिर्फ एक निश्चित पखवाड़े में सफाई अभियान को सफल बनाओ।

मैने कहा इश्तिहारों का व्यापार तबतक फलता फूलता रहेगा जबतक मानव के दिमाग की सफ़ाई का अभियान चलाया नहीं जाता है?

सीतारामजी ने मेरी बात का समर्थन करते हुए कहा,ये इश्तिहार नहीं वास्तव में ये मानव की स्वार्थ पूर्ति की हवस है।

उक्त मुद्दे पर सीतारामजी ने शायर

*रईसुदीन रईस* रचित निम्न शेर सुनाए।

*तमाम शहर में है,आम कारोबारे-ए-हवस*

*कि चेहरे पे चेहरे हैं इश्तिहार-ए-हवस*

मैने सीतारामजी से कहा सही फरमाया आपने ये इश्तिहार हवस ही हैं।

सीतारामजी ने कहा सच में सिर्फ इज़हार ही करना है,वास्तव में तो कुछ करना धरना है ही नहीं?

ठीक त्वचा को गोरे बनाने की क्रीम का विज्ञापन जैसा,

या फिल्मी गीतों जैसा,

*तू कहे तो आसमान से चांद तारे ले आऊं*

देश की आर्थिक स्थिति का विज्ञापन भी पुरानी फिल्मों में दर्शाए जाने वाले इस दृश्य जैसा ही प्रतीत होता है।

प्रायः पुरानी फिल्मों में अभिनेता आठ,दस प्रतिष्ठानों में नौकरी के लिए जाता है,वहां उसे No vacancy का बोर्ड लटका हुआ दिखता है,लेकिन संयोग से नौकरी मिलने के बाद,अभिनेता को पहली तनख़्वाह मिलते ही वह पूरे परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए,उपहार लाता है।

जब की दर्शक यह जानते हैं कि जो दर्शाया जाता है,वह सब बनावटी है।

समझने वाले समझ जाते हैं।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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