अग्नि आलोक

पर्दे के पीछे, नफरत की बेशुमार फसल पकने का जामो-जश्न …!

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मनीष सिंह

2001 में एक मामूली पोलिटीकल मैनेजर को अचानक उठाकर गुजरात की गद्दी पर बिठा दिया था. तब उनकी उनकी योग्यता थी – ‘केशुभाई पटेल के विधायक तोड़ना, असन्तोष फैलाना और अपनी ही पार्टी के जीते हुए मुख्यमंत्री की गद्दी में पलीता लगाना !’

मोदी ने जीवन में एक पार्षदी नहीं लड़ी. कभी विधायक नहीं बने, कभी सदन का मुंह नहीं देखा, कभी किसी प्रशासनिक पद का अनुभव नहीं पाया. शून्य योग्यता का व्यक्ति सीधे एक राज्य का मुख्यमंत्री बन गया. जिंदगी में पहला उपचुनाव जीता…तो सरकारी ताकत से, कुर्सी पर रहते हुए !

और मोदी ने कुर्सी के बगैर कोई चुनाव नहीं जीता है. दूसरा चुनाव इसलिए जीता क्योंकि तबतक अहमदाबाद की सड़कों पर बिखरा खून, सूखा नहीं था. उस चुनाव ने अटल बिहारी के मुंह पर कालिख पोत दी. गुजरात की अधम जमात ने इकट्ठा होकर फैसला दिया कि मोदी साहब, राजधर्म का पालन कर रहे थे.

और तब से उनके राजधर्म से खून की गंध आना बंद नहीं हुई. लम्बे राजनीतिक जीवन में एक बार उन्होंने कोर्स करेक्शन करने का अभिनय किया था. मगर सबका साथ-सबका विकास करने में बुरी तरह फेल रहे क्योंकि आदत बदलना कठिन होता है. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे इंसान और इंसान का फर्क, कपड़े से पहचानते हैं.

दो-दो बार मौका मिलने के बावजूद वे भारत का नेता बन नहीं सके. वे एक वर्ग के नेता, उसके ग्लेडियेटर, उसका हथियार बनकर सन्तुष्ट है और गाहे बगाहे अपने एलेक्टोरल कॉलेज को बताते रहते हैं कि उनके हथियार में वही धार अब भी बनी हुई है. मणिपुर उसी धार का स्मरण पत्र है.

यह पत्र भारत के नाम लिखा गया है. इसमें घोषणा की गई है कि जिस गुजरात मॉडल को उन्होंने देश में लागू करने का वादा किया था, वह पूरा कर दिया गया है. दस साल में घृणा का सैलाब, पश्चिम से पूर्व तक फैल गया है. अपने सबसे घृणित रूप में फैला है. आज प्रकट रूप में प्रशासनिक असफलता का दर्द जरूर प्रकट किया जाये, मगर तय है कि पर्दे के पीछे, इस नफरत की बेशुमार फसल पकने का जामो-जश्न हो रहा है.

यह गन्ध, यह योग्यता, यह विशेषज्ञता जिस व्यक्ति के जीवन की यूएसपी है, वह उम्र के इस पड़ाव पर आकर अपनी तासीर बदलेगा, ऐसा गुमान किसने पाला था ? कौन हैं वे जो अब भी सोचते हैं कि भारत विश्वगुरु बनेगा, लोकतंत्र की मिसाल, शांत समृद्ध, सुखी औऱ सम्मानित बनेगा ??

आंख खोलिये, देखिए कि मणिपुर की उस नग्न औरत ने हम पर अंग्रेजों से ज्यादा जघन्य और नाजियों से ज्यादा नीच कौम का बट्टा लगा दिया है. यह तस्वीर मेरे, आपके माथे पर खोद दी गयी है.

हम शर्मिदा हो सकते हैं, पर इस पाप से उन्मोचित हो नहीं सकते. क्योंकि हमारा प्रधानमंत्री हमारा ही चयन हैं. हमने ताकत दी उसे. जो ताकत हमारे दिलों की नफरत और हमारी दुर्बलता, हमारे दुर्भाग्य और हमारी दुर्दशा से बढ़ती है. आज वह ताकत उरूज पर है तो हम बेबस होकर कितना ही ‘आई एम सॉरी मणिपुर’ लिखते रहे…यह सब रुकने वाला नहीं क्योंकि इसका लाभ भारत के सबसे ताकतवर शख्स को मिल रहा है. जी हां…नफरत की बम्पर फसल काट रहे हैं मोदी.

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता…! बचपन में मुझे सिखाया गया यह श्लोक सही है, तो इस देश में अब देवताओं का वास नहीं रह गया है. यहां गली-गली हैवान बसते है, राक्षसों का राज है औऱ पिशाचों ने अपना अड्डा बना लिया है.

यहां जो कम है, उसी पर दम है. कहीं सिख कम है, कहीं मुसलमान कम है, कहीं कुकी कम हैं, कहीं किसी और नाम का समुदाय कम है. पर अब सचाई यह है शायद कि हर जगह इंसान कम है. और जो कम है, वह खतरे में है. आपकी बदकिस्मती यह कि जो ज्यादा है, वह ज्यादा खतरे में है- न भूलिएगा !

मणिपुर में ईसाई कम है. जाहिर है, यह महिला ईसाई है. मणिपुर उस प्रयोग की पराकाष्ठा है जो अहमदाबाद से शुरू हुआ था. जिसका तरीका है-कम और ज्यादा के बीच डर, नफरत और हिंसा भड़काना. और ज्यादा को ऐसी खुली छूट देना कि वह गंदे काम करके खुद भी भयभीत रहे औऱ सुरक्षा के लिए, राक्षसों को थोकबंद वोट करे.

यह प्रयोग ही ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ में ईजाद किया गया था. भारत के पश्चिमी छोर से शुरू होकर, यह प्रयोग देश के पूर्वी किनारे तक पहुंच चुका है. कभी नाजी जर्मनी में तस्वीरो, डॉक्यूमेंटरी में दिखने वाला दृश्य, यहां मेरे भारत मेरे हिंदुस्तान में दिखेगा…कतई-कतई कल्पना नहीं की थी.

मैं आज खुलकर कहता हूं- अगर यह हिंदुत्व है, तो मुझे हिन्दू नहीं होना है. मैं शर्मिंदा हूं हिन्दू होने पर और अगर पुनर्जन्म हो तो ईश्वर मुझे हिन्दू न बनाये. और इस जीवन में कसम खाता हूं, इस अनजान महिला की कसम खाता हूं, कभी इस नफरत की तिजारत को अपना समर्थन न दूंगा. इससे जुड़े हर आदमी का बहिष्कार करूंगा.

मेरे इर्द गिर्द का जो व्यक्ति इनको अब भी समर्थन देगा, वह मेरे रिश्तों, दोस्ती, प्रेम से अलहदा कर दिया जायेगा. आपके अंदर इंसानियत बची हो तो आप भी यही कसम लें. लड़ाई अब चुनावी या राजनीतिक चयन की नहीं, इंसान होने या पिशाच होने के चयन के बीच है.

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