नेसार अहमद
शुरुआत से ही, राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के प्रति अपनी नापसंदगी जाहिर करने से झिझकी नहीं है। 2015 में, सत्ता में आने के एक वर्ष बाद ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में तंज़ कसते हुए कहा कि उनकी सरकार मनरेगा को जारी रखना पसंद करेगी क्योंकि “यह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की विफलताओं की जीती जागती यादगार है।”
मोदी ने सत्ता पक्ष के सदस्यों की तालियों और हंसी के बीच कहा, “इतने साल सत्ता में रहने के बाद आप गरीब आदमी को यही काम दे पाए कि महीने में कुछ दिन गड्ढे खोदो!”
2005 में लागू मनरेगा ग्रामीण इलाकों में हर घर को हर साल 100 दिनों के काम की गारंटी देती थी। यह मांग आधारित कार्यक्रम था और अधिनियम ने ग्राम पंचायतों को मनरेगा के तहत किए जाने वाले कार्य चुनने को अधिकृत किया था। मनरेगा की कार्य योजना ग्राम पंचायतों की बनाई ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) का एक महत्वपूर्ण अंग होती थी। जब कोरोना महामारी ने देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया, मनरेगा और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 ने देश की बड़ी आबादी के लिए जीवन रेखा का काम किया।
केवल पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में मनरेगा ने 286.18 करोड़ कार्य दिन पैदा किए और 5.78 करोड़ परिवारों व 7.88 करोड़ लोगों को सहारा दिया। इनमें से आधे से ज्यादा मनरेगा मज़दूर महिलायें (58 फीसदी) थीं। 18 फीसदी अनुसूचित जाति से और 18 फीसदी ही अनुसूचित जनजाति समुदायों से थे। 4.82 लाख लाभार्थी विकलांग थे। यह मनरेगा के सामाजिक न्याय पहलू को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
पिछले वर्ष के ससंद के अंतिम सत्र में एनडीए सरकार ने मनरेगा को रद्द कर इसकी जगह विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एण्ड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, (संक्षेप में वीबी जी राम जी) विधेयक संसद में प्रस्तुत किया और इसे आनन फानन में 2 दिन के अंदर ही पारित कर लिया गया। विधेयक पर घंटों चले बहस के दौरान विपक्ष इस विधेयक को संसद की स्थायी समिति को भेजेने की मांग करता रहा जिससे इस पर एयर व्यापक चर्चा हो सके। लेकिन सरकार के इसे पारित कर कानून बनाना ही उचित समझा।
हालांकि, यह नया कानून रोज़गार गारंटी योजना का नाम बदलने से कहीं ज्यादा बदलाव करता है। नया कानून कई तरीकों से मनरेगा के तहत ग्रामीण गरीबों को मिल रही रोजगार गारंटी को कमजोर करता है।
‘विकसित भारत’ के लिए नया विधेयक
नए कानून का उद्देश्य, जैसा कि विधेयक के अनुसूची में बताया गया है, “ग्रामीण विकास ढांचे को 2047 में विकसित भारत के राष्ट्रीय विचार के अनुकूल बनाना” और “लोक निर्माण कार्यों को समेकित कर विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवरंचना स्टैक बनाने के लिए सशक्तिकरण, वृद्धि, संमिलन और परिपूर्णता पर फोकस करना” और ग्राम पंचायतों की अलग अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए पीएम गति शक्ति के साथ मिलकर विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के जरिए संमिलन (convergence), परिपूर्णता केंद्रित योजनाओं का संस्थानीकरण करना” है।
इसमें, जिन वैकल्पिक संभावनाओं पर प्रयास नहीं किया गया, उस पर कई महत्वपूर्ण सवाल पैदा होते हैं। यदि मनरेगा के तहत किए जा रहे विकास कार्य विकसित भारत के विचार के समरूप नहीं थे तो सरकार मनरेगा के तहत किए जाने वाले कार्यों की सूची को संशोधित कर सकती थी।
जहां तक “विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के जरिए संमिलन, परिपूर्णता केंद्रित योजनाओं का संस्थानीकरण करने” की बात थी, तो यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि मनरेगा कार्य भी जीपीडीपी के तहत ग्राम पंचायतों की तरफ से प्रस्तावित और नियोजित किए जाते थे और इनके लिए भी ग्राम सभा की मंजूरी जरूरी थी।
गैर कृषि रोजगार से दूर जाने के लिए प्राथमिकताओं में बदलाव
विधेयक का दूसरा घोषित उद्देश्य “ग्रामीण कार्यबल के लिए पारिश्रमिक-रोजगार गारंटी के मद्देनजर सघन कृषि मौसम के दौरान खेत मजदूरों की पर्याप्त उपलब्धता मुहैया कराना” है। जी राम जी कानून में कृषि सीजन के दौरान ग्रामीण रोजगार कार्यों को दो महीने के लिए रोक देने का प्रावधान है ताकि खेती के लिए श्रमिक आपूर्ति हो सके।
लेकिन, ऐसा क्या था जिसने सरकार को यह प्रावधान शामिल करने के लिए प्रेरित किया, यह स्पष्ट नहीं है। हम जानते हैं कि कृषि क्षेत्र में पहले से काफी अधिक लोग कार्यरत हैं। ताज़ा पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) संकेत देता है कि कृषि क्षेत्र देश के 46 फीसदी कार्यबल को रोजगार देता है, जबकि देश की कुल आय में कृषि का योगदान केवल 18 फीसदी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यबल का 60 फीसदी हिस्सा और महिला कार्यबल का 78% हिस्सा कृषि क्षेत्र में लगा है। पीएलएफएस आंकड़ों के अनुसार कृषि क्षेत्र में लगे लोगों का एक चौथाई हिस्सा कृषि मजदूर हैं। इसलिए नीतिगत जोर इस पर होना चाहिए कि कैसे मजदूरों को खेती से निकाल कर गैर कृषि रोजगार में ले जाना चाहिए, लेकिन नया कानून इसके ठीक उल्टा प्रावधान करता दिख रहा है।
संसाधनों की कमी का दबाव झेल रही राज्य सरकारों पर नया दबाव
नया कानून हर ग्रामीण घर के वयस्क सदस्यों, जो अकुशल श्रम कार्य करना चाहते हैं, को साल में 125 दिन रोजगार देने का वादा करता है, जबकि मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार दिये जाने की गारंटी थी। गारंटीयुक्त रोजगार दिनों की बढ़ी संख्या हालांकि केंद्र सरकार के आवंटित बजट पर निर्भर करेगी और जरूरी नहीं है कि यह मांग आधारित हो। नए कानून के अनुसार केंद्र सरकार हर राज्य को एक मानक बजट आवंटित करेगी, जो वस्तुपरक मापदंडों के आधार पर होगा।
एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है: यदि केंद्र सरकार का वस्तुपरक मापदंडों पर अनुमानित आवंटन 125 दिन का गारंटीशुदा रोजगार मुहैया नहीं कर पाता है तो क्या होगा?
विधेयक कहता है कि मंजूर मानक आवंटन से ज्यादा खर्च राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगा। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि राज्य सरकार केंद्र सरकार के मानक आवंटित बजट होने वाले कार्यों से अधिक दिनों का कार्य मुहैया कराना चाहे तो उन्हें आवश्यक खर्च अपने खजाने से करना होगा।
इसके अलावा भी नया कानून राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ाता है। नए कानून के तहत रोजगार गारंटी कार्यक्रम के बजट में केंद्र और राज्य सरकारों की हिस्सेदारी बदल दी गई है। मनरेगा के तहत 100 फीसदी श्रम लागत और 75 फीसदी सामग्री लागत केंद्र सरकार वहन करती थी। इस तरह मनरेगा के तहत केंद्र सरकार कुल खर्च का लगभग 90 फीसदी हिस्सा वहन करती थी।
जी राम जी विधेयक, जो अब कानून बन गया है, में केंद्र सरकार ने अधिकतर राज्यों के लिए ये हिस्सेदारी बदलकर 60:40 का अनुपात कर दिया है। पूर्वोत्तर राज्यों और हिमालियाई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर) लिए अनुपात 90:10 है। इस बदले हिस्सेदारी से नए कानून को लागू करने में राज्य सरकारों का आर्थिक बोझ स्पष्ट रूप से बढ़ गया है।
मनरेगा के तहत भी अभी तक बहुत कम परिवार (केवल लगभग 7 फीसदी) 100 दिनों का रोजगार पाते थे। इसलिए दिनों की बढ़ी संख्या भाषणबाज़ी ज्यादा लग रही है और यदि बाय कानून के तहत अधिक परिवारों को 125 दिन का कार्य मिलता है तो यह निश्चित रूप से राज्य सरकारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ के बिना नहीं हो सकेगा।
भारत के विकेंद्रीकृत सूक्ष्म योजना मॉडेल को केन्द्रीयकृत करना
नया कानून पंचायतों के जरिए की जाने वाली विकेंद्रीकृत सूक्ष्म योजना में भी बदलाव करता है। हालांकि नए कानून के अनुसार ग्राम पंचायतें वार्ड सभाओं व ग्राम सभा के सुझावों पर आधारित “विकसित ग्राम पंचायत योजना” बना सकती हैं, लेकिन मस्टर रोल और ग्राम पंचायत निवासियों को उपलब्ध रोजगार अवसरों की सूचियां ग्राम पंचायतों को दी जाएंगी। नए कानून के तहत ग्राम पंचायत “विकसित ग्राम पंचायत योजना” से भी कोई कार्य ले सकती हैं “जो कार्यक्रम अधिकारी से मंजूरी प्राप्त हो।“
नए कानून में जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम समन्वयक और ब्लॉक स्तर पर कार्यक्रम अधिकारी होंगे, जिनकी नियुक्ति राज्य सरकारों द्वारा जिला पंचायत और ब्लॉक पंचायत की सहायता के लिए की जाएगी। कार्यक्रम अधिकारी ग्राम पंचायतों द्वारा बनाई विकसित ग्राम पंचायत योजना को समेकित कर अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले इलाके में उपलब्ध रोजगार अवसरों से रोजगार की मांग पूरा करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
इस तरह विधेयक स्पष्ट करता है कि कार्यों के संबंध में निर्णय और रोजगार चाहने वाले लोगों को कार्य आवंटन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कार्यक्रम अधिकारी (जो ब्लॉक स्तर पर ब्लॉक विकास अधिकारी होगा) करेंगे।
इस कानून में “विकसित ग्राम पंचायत योजना” की बात की गई है जो नया है। मनरेगा की योजना ग्राम पंचायतों के ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) का हिस्सा होती थी, जो पंचायती राज मंत्रालय और सम्बद्ध राज सरकारों के पंचायती राज विभागों के दिशानिर्देशों पर आधारित होती हैं।
क्या “विकसित ग्राम पंचायत योजना” रोजगार गारंटी कार्यों के लिए जीपीडीपी से अलग एक और योजना होगी? आदर्श रूप से पंचायतों को संविधान के निर्देशानुसार केवल एक वार्षिक विकास योजना बनाने के लिए ही कहा जाना चाहिए।
एक तकनीकी-प्रधान कानून
नया कानून योजना बनाने, उस पर अमल करने और निगरानी यहाँ तक कि कार्यक्रम की सोशल ऑडिट के लिए भी प्रौद्योगिकी पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। नए कानून की धारा 24 प्रौद्योगिकी सक्षम पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही का प्रावधान करती है जिसमें बायोमेट्रिक पुष्टि, जियोस्पैशल योजना, मोबाईल और डैशबोर्ड निगरानी, साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासे और सोशल ऑडिट प्रणालियों को मजबूत बनाना शामिल है।
लेकिन हमारी ग्राम पंचायतें, पंचायत प्रतिनिध और ग्राम पंचायत कर्मचारी और रोजगार गारंटी योजनाओं के तहत काम चाहने वाले ग्रामीण श्रमिक केंद्र व राज्य सरकारों के डिजिटल एकोसिस्टम की जटिलताओं से का सामना करने के लिए आवश्यक कौशल और उपकरणों से सुसज्जित नहीं हैं। वर्तमान में, अधिकांश ग्राम पंचायतें अपनी जीपीडीपी ही ई-ग्रामस्वराज पोर्टल पर अपलोड करने (जो आवश्यक है) में ही संघर्ष करती हैं। और अधिकांश राज्यों में यह आम तौर पर ब्लॉक पंचायत ऑफिस में प्रबंधन सूचना प्रणाली स्टाफ (अधिकतर अप्रशिक्षित) के जरिए किया जाता है।
इस तरह जी राम जी कानून ऊपरी तौर पर 125 दिन के कार्य की गारंटी और प्रौद्योगिकी पर निर्भरता पर जोर देते हुए बाहरी तौर पर विकास की बात करता है लेकिन वास्तविकता में रोजगार गारंटी को कमजोर करता है और रोजगार गारंटी योजनाओं के प्रबंधन में पंचायत की भूमिका को भी कम करता है। नया कानून रोज गारंटी के बजाय कृषि के लिए मसदूरों की उपलब्धता को प्राथमिकता देता है और रोजगारी गारंटी योजना के अमल को राज्यों के पहले से ही कमजोर वित्तीय स्थिति के हवाले कर देता है।
भारत भर के गाँवों में “जै राम जी” अक्सर सामने वाले का अभिवादन करने के लिए भी और जाते समय अलविदा के रूप में भी किया जाता है। कई मायनों में, यह सवाल बनता है कि नया कानून ग्रामीण रोजगार गारंटी का नया युग शुरू करेगा या रोज़गार गारंटी को ही जी राम जी कर देगा । देश के लाखों ग्रामीण पुरुष और महिलाएं जो मनरेगा में कार्य करते थे उनके लिए यह उनके रोज़गार और आजीविका से जुड़ा एक बहुत बड़ा सवाल है।
(नेसार अहमद का लेख लीफलेट से साभार। यह लेख लीफ्लिट के मूल अंग्रेजी लेख का संशोधित रूप है।

