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*किस हिंदू कव‍ि के सामने झुकने को मजबूर हुए जिन्‍ना, किसने दिया पाकिस्‍तान को कौमी तराना*

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9 अगस्त 1947 को भारत की आजादी में सिर्फ छह दिन बाकी थे, लेकिन पंजाब में हालात बेहद तनावपूर्ण थे. इसी दिन पाकिस्तान के भावी गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना ने युवा हिंदू कवि जगन्नाथ आजाद को पाकिस्तान के लिए कौमी तराना लिखने की जिम्मेदारी दी. दूसरी ओर अमृतसर में मुस्लिम लीग कार्यकर्ता मोहम्मद सईद की गिरफ्तारी के बाद हिंसा भड़क उठी. हिंदू और सिख इलाकों को निशाना बनाया गया और कई लोगों की जान गई. इसी बीच गांधी कलकत्ता पहुंचे, नेहरू ने लियाकत अली खान को संदेश भेजा और रैडक्लिफ सीमा आयोग का काम निर्णायक दौर में पहुंच गया.

9 अगस्त 1947. हिंदुस्तान अपनी आजादी से सिर्फ छह दिन दूर था, लेकिन आजादी की इस दहलीज पर माहौल जश्न वाला नहीं था. पंजाब में हिंदू, सिख और मुस्लिम समुदाय के बीच बढ़ती हिंसा ने हालात को बेहद दर्दनाक बना दिए थे. एक तरफ पाकिस्तान अपने जन्म की तैयारी कर रहा था, तो दूसरी तरफ अमृतसर और आसपास के इलाकों में खून बह रहा था. इसी दिन पाकिस्तान के भावी गवर्नर जनरल मोहम्मद अली जिन्ना अपने बंगले में बैठकर नए मुल्क के मुस्तकबिल के बारे में सोच रहे थे. पाकिस्तान बनने वाला था, लेकिन उसके पास अभी न कोई कौमी तराना था और न ही उस पर गंभीरता से चर्चा शुरू हुई थी. जिन्ना के जेहन में अचानक एक युवा पंजाबी हिंदू कवि का नाम आया और यह नाम था जगन्नाथ आजाद का.

जिन्ना उनकी उर्दू शायरी से पहले से मुरीद थे. उन्हें लगता था कि आजाद पाकिस्तान के लिए एक अच्छी नज्म लिख सकते हैं. लेकिन एक पल के लिए जिन्ना के मन में सवाल उठा कि क्या एक हिंदू से पाकिस्तान का कौमी तराना लिखवाना सही होगा? फिर उन्होंने इस सोच को किनारे कर दिया. उनके लिए उस वक्त सबसे जरूरी था कि नज्म अच्छी हो. जगन्नाथ आजाद को जिन्ना के बंगले पर बुलाया गया. आजाद तय समय से पहले ही पहुंच गए. जिन्ना ने जब उन्हें देखा तो कुछ पल के लिए चौंक गए. उन्हें उम्मीद थी कि इतनी शानदार उर्दू लिखने वाला कोई उम्रदराज शायर होगा, लेकिन सामने करीब 30 साल का नौजवान खड़ा था. जिन्ना ने उनसे पाकिस्तान के कौमी तराने के लिए नज्म लिखने को कहा. आजाद के पास उस वक्त कोई तैयार नज्म नहीं थी.

उन्होंने अपनी कल्पना से कुछ पंक्तियां सुनाईं. जिन्ना ने उन्हें सुना और कहा- ‘बस… बस, यही चाहिए था मुझे.’ इस तरह पाकिस्तान के शुरुआती दौर का कौमी तराना लिखने की जिम्मेदारी एक पंजाबी हिंदू कवि को मिली.

9 अगस्त 1947 के कुछ बड़े घटनाक्रम

  1. कलकत्ता पहुंचे महात्‍मा गांधी: 9 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी नोआखली जाने के रास्ते में कलकत्ता पहुंचे और सोदपुर आश्रम में ठहरे. उस समय कलकत्ता में भी हिंदू-मुस्लिम तनाव और हिंसा का खतरा बना हुआ था. महात्‍मा गांधी का मानना था कि आजादी का जश्न तभी सार्थक होगी, जब लोग शांति से रह सकें. उन्होंने राजनीतिक कार्यक्रमों से ज्यादा सांप्रदायिक सद्भाव को प्राथमिकता दी और कलकत्ता में लोगों के बीच शांति कायम करने की कोशिश शुरू कर दी.
  2. शरणार्थियों की बढ़ती जा रही थी भीड़: बंटवारे की आशंका के बीच हजारों लोग अपना घर छोड़कर सुरक्षित इलाकों की तरफ जाने लगे थे. रेलवे स्टेशनों पर शरणार्थियों की भारी भीड़ जमा थी. कई लोग सामान और बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे इंतजार कर रहे थे. हालात इतने खराब थे कि शरणार्थियों को सुरक्षित निकालने के लिए रेलवे मार्गों और ट्रेनों में अतिरिक्त सैन्य सुरक्षा की जरूरत महसूस की गई.
  3. नेहरू ने लियाकत अली खान को भेजा संदेश: भारत और पाकिस्तान बनने में कुछ ही दिन बाकी थे और दोनों तरफ से हिंसा रोकना सबसे बड़ी चुनौती बन चुका था. गंभीर होते हालात के बीच 9 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को पत्र लिखा. इस पत्र में उन्‍होंने पश्चिमी पंजाब के हालात पर चिंता जताई थी. उन्होंने शरणार्थियों की सुरक्षा और सुरक्षित आवाजाही का मुद्दा भी उठाया था.
  4. कराची में तेज हुईं मुस्लिम लीग की तैयारियां: पाकिस्तान बनने से कुछ दिन पहले कराची में मुस्लिम लीग की गतिविधियां तेज हो गई थीं. नए देश की प्रशासनिक और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर अहम चर्चाएं चल रही थीं. पाकिस्तान की संविधान सभा भी अपने शुरुआती कामकाज की तैयारी कर रही थी. सत्ता हस्तांतरण की तारीख नजदीक आने के साथ मुस्लिम लीग के सामने एक नए देश की शासन व्यवस्था खड़ी करने की बड़ी जिम्मेदारी थी.

पंजाब में लागू हुई प्रेस सेंसरशिप और…

  1. अग्रेजों ने लगाई प्रेस सेंसरशिप: लाहौर में बैठे पंजाब के गवर्नर ईवॉन मेरेडिथ जेनर्किस को जैसे ही अमृतसर और आसपास के इलाकों में हुए दंगों की खबर मिली, उन्होंने पूरे पंजाब में प्रेस सेंसरशिप लागू करने का आदेश दे दिया. इसके बाद 9 अगस्त को अमृतसर में हुई हिंसा और उसमें हुए भारी रक्तपात की खबरें अगले दिन पंजाब के किसी भी अखबार में प्रकाशित नहीं हो सकती थीं. ब्रिटिश सरकार का यह फैसला सिर्फ खबरों पर रोक लगाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका मकसद हिंसा की सच्चाई को जनता से दूर रखना भी था.
  2. निर्णायक दौर में पहुंचा सीमा आयोग का काम: 9 अगस्त 1947 तक भारत और पाकिस्तान की नई सीमा तय करने वाले रैडक्लिफ सीमा आयोग का काम अंतिम दौर में पहुंच चुका था. पंजाब और बंगाल को बांटने की जिम्मेदारी सर सिरिल रैडक्लिफ को दी गई थी. आयोग के फैसले लाखों लोगों की जिंदगी बदलने वाले थे. हालांकि सीमा का औपचारिक ऐलान 17 अगस्त को हुआ, लेकिन 9 अगस्त तक नक्शे और सीमाओं को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लगभग पूरी कर ली गई थी.
  3. तेज हुई पांडिचेरी के भारत में विलय की मांग: 9 अगस्त 1947 को पांडिचेरी में फ्रांसीसी शासन से मुक्ति और भारत में विलय की मांग ने जोर पकड़ लिया. फ्रेंच इंडिया स्टूडेंट्स कांग्रेस और दूसरे संगठनों ने प्रदर्शन की तैयारी की. प्रशासन ने सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगाने की कोशिश की, लेकिन इसके बावजूद छात्र, मजदूर और स्थानीय लोग विरोध में उतर आए. कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. मजदूरों की हड़ताल ने फ्रांसीसी शासन के खिलाफ बढ़ते जनदबाव को स्पष्ट कर दिया था.
  4. ध्रांगध्रा रियासत ने किया भारत से जुड़ने का फैसला: ध्रांगध्रा रियासत के विलय को लेकर सरदार पटेल और वीपी मेनन के साथ बातचीत अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी. वहीं बदलते हालात को देखते हुए ध्रांगध्रा रियासत के महाराजा श्रीराज ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज यानी ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर का मन बना लिया था. आजादी से कुछ दिन पहले देश की सैकड़ों रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का सवाल था. ध्रांगध्रा का फैसला भारत के साथ रियासतों के एकीकरण की दिशा में अहम कदम था. इसके बाद आजाद भारत में अलग-अलग रियासतों को एक साथ जोड़ने की प्रक्रिया और तेज हो गई.

कौन था मोहम्‍मद स‍ईद और अमृतसर में क्‍यों भड़की हिंसा?
9 अगस्त की सुबह करीब 11.30 बजे अमृतसर रेलवे स्टेशन के आसपास सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों ने घेराबंदी कर रखी थी. इसी दौरान एक हट्टा-कट्टा पठान स्टेशन से बाहर निकला. पहले से घात लगाकर बैठी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. वह मुस्लिम लीग का कार्यकर्ता मोहम्मद सईद था, जिसका नाम पहले से कई हिंसक घटनाओं से जोड़ा जाता था. सईद की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही अमृतसर में हिंसा भड़क उठी. हिंदू और सिखों के घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया. शाम तक हिंसा कई इलाकों में फैल गई. जबलफाद गांव में बड़ी संख्या में हिंदू और सिख मारे गए. धापाई गांव में भी हमला हुआ और सिखों ने प्रतिकार किया. इसके बाद सेना और मुस्लिम नेशनल गार्ड के बीच भी टकराव की स्थिति बन गई.

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