Site icon अग्नि आलोक

जोशीमठ….सरकारों ने हर बार चेतावनियों को नजरअंदाज किया

Share

चंद्रभूषण

जोशीमठ में जो हो रहा है, वह एक ट्रैजिडी है। ऐसा नहीं कि इसकी आशंका नहीं थी। इसके बारे में जानकारी पहले से ही थी और इसे प्रेडिक्ट भी किया गया था। अगर आप पिछले पचास साल में देखें तो पाएंगे कि जोशीमठ के धंसाव को हर जगह बड़े करीने से डॉक्युमेंट किया गया। सुप्रीम कोर्ट की कमिटी से लेकर उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार तक की कमिटी बनी। हालांकि ये सारी दूसरे कारणों से बनी थीं। सिर्फ जोशीमठ को लेकर एक कमिटी 1976 में गढ़वाल के कमिश्नर रहे महेश चंद मिश्रा के नेतृत्व में बनी थी। इन सारी कमिटियों ने चेतावनी दी थी कि आप हिमालय, खासकर उत्तराखंड में शहरीकरण न करें, बड़े बांध न बनाएं, इन्फ्रास्ट्रक्चर- खासकर सड़क चौड़ीकरण के लिए पहाड़ों की कटाई न करें क्योंकि इसका बड़ा खराब पर्यावरणीय प्रभाव होगा। लैंडस्लाइड बढ़ेंगे, पूरा का पूरा हिमालयन इकोसिस्टम बिगड़ जाएगा।

कैसे पहुंचे यहां तक

मगर सरकारों ने हर बार इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया। नतीजा यह है कि जोशीमठ की किस्मत पर ताला लग गया है। इंजीनियरिंग समाधानों के साथ भी, इस ऐतिहासिक शहर के एक हिस्से को छोड़ना होगा और बाकी जीवित रहने के लिए संघर्ष करेंगे। हम इस अवस्था में कैसे पहुंचे हैं और हम भविष्य में और अधिक जोशीमठ जैसी घटनाओं को कैसे रोक सकते हैं?

उत्तराखंड में ऐसे काफी प्रॉजेक्ट हैं, जिनसे हिमालय खतरे में है। हिमालय दुनिया का सबसे अस्थिर पहाड़ी क्षेत्र है। यहां भूकंप, लैंडस्लाइड और बाढ़ बहुत कॉमन हैं। हिमालय पहाड़ सिर्फ पत्थर का नहीं बना है, यह मड और रॉक का मिक्स है। अभी भी इसकी ऊंचाई बढ़ रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में 90 फीसदी भूकंप, अधिकांश भूस्खलन और बादल फटने का एक बड़ा हिस्सा हिमालय में होता है। इसलिए जो भी इस माउंटेन रेंज में मैदानों का विकास मॉडल कॉपी करने की कोशिश कर रहा है, बहुत बड़ी गलती कर रहा है।

क्या हो रास्ता

तो फिर हिमालय क्षेत्र में आने वाले राज्यों को क्या करना चाहिए?

हमारे हिमालयी राज्यों के पास भी ऐसे बहुत से ऑप्शन हैं और हमें वही करने की जरूरत है। अगर हम यह नहीं करते हैं तो जोशीमठ जैसे बहुत सारे संकट देखने को मिलेंगे।

(लेखक iForest के CEO हैं)

प्रस्तुति : राहुल पाण्डेय

Exit mobile version