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*पत्रकारिता: स्वाभिमान से अभिमान तक — चुनौतियाँ और बदलाव*

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                     -प्रियांशु कुमार 

देश में पत्रकारिता एक समय में मिशन मानी जाती थी  सच की आवाज़, जनता का पक्ष और सत्ता से सवाल करने वाली आवाज़। लेकिन आज, पत्रकारिता अपने उसी स्वाभिमान को धीरे-धीरे अभिमान और आत्ममुग्धता में बदलती हुई दिख रही है। यह परिवर्तन केवल पत्रकारिता की आत्मा पर चोट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की नींव को भी हिला रहा है।

जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, तो उससे निष्पक्षता, जिम्मेदारी और विवेक की अपेक्षा की जाती है। लेकिन हाल के वर्षों में मीडिया की साख पर जो सवाल उठे हैं, वह केवल सोशल मीडिया की ट्रोलिंग नहीं, बल्कि जनमानस की चेतावनी है। गोदी मीडिया’, ‘प्रचार तंत्र’, ‘टीआरपी की दुकान’ ये शब्द अब आलोचना नहीं, बल्कि आम अनुभव का रूप ले चुके हैं।

2025 की रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 159वें स्थान पर पहुँच गया है — जो पाकिस्तान (152) और श्रीलंका (150) से भी पीछे है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस स्वतंत्रता का गिरता ग्राफ है, जो लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्त है।

एक जनसंचार छात्र के रूप में, जब मैंने इस क्षेत्र में पढ़ाई शुरू की, तो सीखा था कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है — तथ्य आधारित सूचना देना, सत्ता से सवाल करना, और जनता की आवाज़ बनना। लेकिन आज के न्यूज़ स्टूडियो में इन मूल्यों की जगह चीखते एंकर, ध्रुवीकृत पैनल, और भड़काऊ बहसों ने ले ली है।

NDTV पर चला लंबा मामला, जो 2025 में अप्रत्याशित रूप से समाप्त हुआ, और न्यूज़क्लिक के संपादक की गिरफ्तारी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी ठहराया ये घटनाएं बताती हैं कि पत्रकारिता पर संस्थागत दबाव किस तरह बढ़ रहा है। वहीं जिन चैनलों पर सत्ता के पक्ष में एकतरफा कवरेज के आरोप हैं, उन पर कोई गंभीर कार्यवाही नहीं होती।

कॉर्पोरेट स्वामित्व और राजनीतिक झुकाव के बीच फंसी पत्रकारिता अब स्वतंत्र नहीं, बल्कि अक्सर निर्देशित दिखती है। कई संस्थानों में पत्रकारों के लिए वैचारिक स्वतंत्रता नहीं बची उनके पास केवल स्क्रिप्ट होती है। न्यूज़ बुलेटिन अब सूचना नहीं, एक शो बन चुका है जिसमें सच्चाई और असहमति दोनों के लिए जगह सिकुड़ गई है।

आज सोशल मीडिया भी पत्रकारिता की छवि गढ़ने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है। कभी यह वैकल्पिक मीडिया बनकर जनता की आवाज़ को सामने लाता है, तो कभी अफवाहों और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाता है। ऐसे में डिजिटल साक्षरता, सूचना की जांच, और सोच-समझकर साझा करना पहले से कहीं अधिक ज़रूरी हो गया है।

पत्रकारिता केवल सत्ता से सवाल पूछने की भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे विश्वसनीयता,नैतिकता, और जनपक्षधरता के मूल्यों पर भी खरा उतरना होता है।

इसे पुनः उसी राह पर लाने के लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं:

1. संपादकीय स्वतंत्रता को संस्थागत रूप से मज़बूत किया जाए, ताकि पत्रकार राजनीतिक या कॉर्पोरेट दबाव से मुक्त होकर काम कर सकें।

2. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी संस्थाओं को निष्पक्ष और दंतयुक्त बनाया जाए, जिनके पास संज्ञान लेने की असली शक्ति हो।

3. पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों में नैतिक पत्रकारिता को अनिवार्य और व्यवहारिक रूप में पढ़ाया जाए।

4. दर्शकों को भी जिम्मेदार बनना होगा उन्हें वही कंटेंट देखना चाहिए जो तथ्यपरक, संतुलित और जनहित में हो।

पत्रकारिता को पुनः स्वाभिमान की राह पर लौटना होगा। क्योंकि लोकतंत्र वहीं फलता-फूलता है, जहाँ सत्ता से सवाल करने वाला साहसी पत्रकार हो, और उस पर भरोसा करने वाली जागरूक जनता।

वरना यह चौथा स्तंभ धीरे-धीरे खुद अपनी नींव खो देगा और लोकतंत्र खामोश हो जाएगा।

लेखक: प्रियांशु कुमार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।

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