–सुसंस्कृति परिहार
फेसबुक पर किसी महाशय ने लिखा’ सभी न्यायाधीश रंजन गोगोई नहीं होते कुछ चंद्रचूड़ भी होते हैं।’ बेशक यह एक पिछले दशक की सच्चाई है।हद तो तब हो गई थी जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई ने ज़रखरीद ग़ुलाम की तरह सत्ता पक्ष के लिए अपनी काबिलियत दांव पर लगा दी यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक कलंक की तरह है। उन्होंने तीन बड़े गुनाह किए।द वायर के मुताबिक पहला गुनाह था महत्वपूर्ण मामलों को भटकाने, कुछ मामलों को फास्ट ट्रैक करने और राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मसलों को अपने चुने हुए जजों को सुपुर्द करने के लिए मास्टर ऑफ रोस्टर की अपनी शक्ति का दुरुपयोग।

दूसरा गुनाह था, विभिन्न बेंचों के प्रमुख के तौर पर उनके द्वारा दिए गए बेहद विवादास्पद फैसले- जिनमें अयोध्या और रफाल जैसे बेहद अहम मामले से लेकर अभिजीत अय्यर मित्रा की अभिव्यक्ति की आजादी की याचिका, जिन्हें एक चुटकुले के लिए ओडिशा पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जैसे दूसरे मामले शामिल हैं. नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) पर उनके द्वारा अपनाया गया रुख और शरणार्थियों के अधिकारों तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति भारत के दायित्वों को लेकर उनका रवैया भी इसी श्रेणी में आता है।
सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी द्वारा उनके खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों पर उनका बर्ताव, तीसरा पाप था।
अयोध्या पर- भयंकर त्रुटिपूर्ण निर्णय में जाने की जगह नहीं है, जिसने वास्तव में 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस करने वालों को इस अपराध के लिए इनाम से नवाजे जाने की इजाजत दे दी- गोगोई के पास इस सवाल का कोई वाजिब जवाब नहीं है कि आखिर अयोध्या की जमीन के मालिकाना हक वाला मुकदमा इतना ज्यादा अहम क्यों था कि इस मामले से जुड़े आपराधिक मुकदमे की सुनवाई के पूरा होने से पहले ही इसे फास्ट ट्रैक करने की जरूरत आन पड़ी वह भी तब जबकि भारत के लोकतंत्र के लिए गंभीर निहितार्थ वाले कई बेहद अहम संवैधानिक मसलों (मिसाल के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड का मसला, या कानून-प्रशासन और संघवाद (अनुच्छेद 370)) के लिए सर्वोच्च न्यायालय के पास वक्त नहीं था।
सेवानिवृत्ति के बाद गोगोई ने अपने दामन पर एक और दाग लगा लिया उन्होंने ऑफिस छोड़ने के कुछ हफ्तों के भीतर सरकार की तरफ से राजसभा में मनोनयन का तोहफा स्वीकार कर लिया। किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश द्वारा सरकार से ऐसा तोहफा स्वीकार करने की इससे पहले बस एक नजीर मिलती है, जब रंगनाथ मिश्रा ने पद से सेवानिवृत्त होने के छह साल बाद राज्यसभा का मनोनायन स्वीकार किया था।
रंजन गोगोई की किताब ‘जस्टिस फॉर द जज’ उनके द्वारा की गई नाइंसाफ़ियों का सबूत है सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं पिछले वर्ष आई उनकी किताब का मक़सद इन सभी का बचाव करना है, लेकिन हर मामले में यह ख़राब ही साबित हुआ है।
इससे पहले भी आपको यहां पर बता दें सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। वे रिटायर हो गए थे। नियमतः और संविधानतः इसमें कुछ गलत नहीं है। मगर यह कुछ अटपटा तो लगता है। वैसे अब लगना नहीं चाहिए।इसलिए कि वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम ने केरल के राज्यपाल का पद स्वीकार कर लिया था। रिटायर होने के कुछ महीने बाद ही। वह पहला अवसर था, जब किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने राज्यपाल जैसे कमतर पद पर रहना कबूल किया था। बीते वर्ष एक और पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया. संयोग से अयोध्या विवाद में हिंदू पक्ष या राम मंदिर के पक्ष में फैसला देनेवाले पीठ में जस्टिस रंजन गोगोई के साथ ही जस्टिस नजीर भी थे और संयोग से नोटबंदी को सरकार का ‘वैध’ फैसला बताने वाले पीठ में भी!
याद कीजिए जस्टिस लोया की मौत जो नागपुर में हुई थी। उस वक्त वह अपने एक सहकर्मी के यहां विवाह में गए हुए थे।जस्टिस लोया बहुचर्चित सोहराबुद्दीन शेख मामले की सुनवाई कर रहे थे. 2005 में सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर की मौत को फर्जी मुठभेड़ कहा गया था।मामले से जुड़े ट्रायल को सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में ट्रांसफर किया था. इस मामले की सुनवाई पहले जज उत्पत कर रहे थे, लेकिन इस मामले में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के सुनवाई में पेश नहीं होने पर नाराजगी व्यक्त की थी जिसके बाद उनका तबादला हो गया था। इसके बाद जस्टिस लोया के पास इस मामले की सुनवाई आई थी। एनकाउंटर के ठीक एक माह बाद 26 दिसंबर 2005 को इस मामले के प्रमुख गवाह तुलसीराम की भी मौत हो गई थी। उनकी मौत की वजह आज तक साफ नहीं हुई है।
इस मौत से सहमे बहुत से न्यायाधीशों ने सत्ता की मर्जी के अनुकूल फैसले दिए।एक लहर सी चल पड़ी लोग कहने लगे इस सरकार के रहते न्याय मिलना मुश्किल है। सबसे बड़ी बात तो ये हुई कि सरकार से जुड़े लोग आपराधिक कार्य करते रहे और उनके हौसले इतने बढ़ गए कि वे मंत्रियों के साथ घूमते और सम्मानित होते देखे गए। अल्पसंख्यकों और सरकार विरोधी लोगों को सरे-आम सिर्फ परेशान ही नहीं किया गया बल्कि कईयों को मौत के घाट उतारा गया।इसी श्रंखला की परिणति हम दिल्ली, मणिपुर और मेवात में देख रहे हैं। राष्ट्र को गौरवान्वित करने वाली महिला पहलवानों को भाजपाई सांसद के खिलाफ हुए आंदोलन में सरकार मौन रही। मामला न्यायालय पहुंचा है । बिल्किस बानों और अन्य के अपराधियों को समय पूर्व छोड़ने और उनके अभिनंदन का मामला सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है।ताजातरीन घटना मुम्बई से आई है जहां एक न्यायाधीश ने अपना इस्तीफा सिर्फ राजनीतिक दबंगों के दबाव के चलते दे दिया है।
भारतीय लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ सांसद राहुल गांधी को जिस तरह गुजरात के कोर्टों ने सजा सुनाई फिर सांसदी और मकान छीना गया यह सब किसके इशारे पर हुआ आसानी से ऊपरी स्थितियों से समझा जा सकता है।अब जब माननीय सीजेआई चन्द्रचूड़ ने उनकी सजा पर तात्कालिक रोक लगाई तो न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ने लगा है।इसी तरह पिछले तीन माह से मणिपुर में जो आग लगाई गई महिलाओं के साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ, लोगों को बेघर किया गया उस पर चन्द्रचूड़ जी ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था सरकार संज्ञान ले वरना हम खुद देखेंगे ।तब प्रधानमंत्री के मुखारबिंद से दो बातें निकलीं मुझे बहुत दुख है और मुझे क्रोध आ रहा है।बस। मणिपुर के हालात जस के तस बने रहे तब माननीय सीजेआई ने संज्ञान लेते हुए तीन महिला जजों की कमेटी बनाई है जो मणिपुर जाएगी और वास्तविकता सामने लाएगी। उन्होंने तीनों महिला जजों की सुरक्षा व्यवस्था करने राज्य सरकार को कहा है। इससे पहलेजस्टिस चंद्रचूड़ कई संविधान पीठों का हिस्सा भी रहे हैं. अयोध्या का ऐतिहासिक फैसला, निजता के अधिकार, व्यभिचार को अपराध से मुक्त करने और समलैंगिता को अपराध यानी IPC की धारा 377 से बाहर करने, सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश, और लिविंग विल जैसे बड़े फैसले दिए हैं।भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए पांच एक्टिविस्टों के अधिकारों को बरकरार रखने के लिए उन्होंने पीठ के बाकी दो सदस्यों तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविलकर से अलग राय रखी थी। उन्होंने न्यायपालिका को याद दिलाया कि अनुमानों के आधार पर असहमति की बलि नहीं दी जा सकती. जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी माइनॉरिटी ओपिनियन में लिखा था कि असहमति जीवंत लोकतंत्र का प्रतीक है. लोगों को पसंद न आने मुद्दों को उठाने वालों को सताकर विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जा सकता है. उन्होंने गिरफ्तारियों की जांच के लिए विशेष जांच टीम बनाने के लिए भी लिखा था।
वे देश के अंतिम व्यक्ति तक सस्ता व जल्द न्याय उपलब्ध कराने की कोशिश में जुटे चीफ जस्टिस ने ऐलान किया है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की प्रति अब जल्द ही हिंदी सहित देश की अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध कराई जाएगी।मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ का एक और भी सपना है जिसे वे जल्द ही साकार होते हुए देखना चाहते हैं.संसद की कार्यवाही की तर्ज़ पर ही अदालत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण का विषय भी उनके एजेंडे में शामिल है.इसीलिये उन्होंने कहा है कि मेरा मिशन है कि न्यायालय कागज रहित और तकनीक सुगम बने. हालांकि कई देशों में सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की व्यवस्था है, जो न्यायपालिका में पारदर्शिता लाने के साथ ही उसे जनता के प्रति जवाबदेह भी बनाती है। न्याय-व्यवस्था में एक उम्मीद की किरण बनकर आए हैं।माननीय चन्द्रचूड़ जी।
वर्तमान में जनापेक्षित न्यायालयीन कार्रवाइयों से पंगु हो रही न्यायप्रणाली को जो आक्सीजन मिली उससे न्यायाधीशों के हौसले भी बढ़े हैं।वह माननीय सीजेआई चन्द्रचूड़ जी की शालीन संविधाऩीत न्याय प्रणाली का ही परिणाम है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस कार्यपद्धति से हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था मज़बूत होगी और फासिस्ट होती जा रही सरकारें सबक सीखेंगी साथ ही साथ प्रलोभन के चलते या दबाववश निर्णय देने से जज भी तौबा करेंगे ।