हिंदी सिनेमा का एक ऐसा विलेन जो बिना चीखे चिल्लाये पर्दे पर सूट-बूट, हैट पहने और मुंह में पाइप दबाए, घनी भौंहों और उनींदी पलकों से दर्शकों की तरफ देखे तो सिहरन सी पैदा हो जाए। के एन सिंह हिंदी सिनेमा के ऐसे सितारे रहे हैं, जिन्होंने अपने फिल्मी करियर में कई यादगार किरदार निभाए हैं। हिंदी सिनेमा के अच्छे से अच्छे सितारें सेट पर उन्हें देखकर घबरा जाते हैं। 31 जनवरी को के एन सिंह के पुण्यतिथि पर आइये जानते हैं, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें…
पारिवारिक पृष्ठभूमि
अपने जमाने के दिग्गज अभिनेता के. एन. सिंह का जन्म 1 सितंबर 1908 को देहरादून (उत्तराखंड) में हुआ था। छह भाई बहनो में के एन सिंह सबसे बड़े थे। के एन सिंह का पूरा नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। इनके पिता चंडी प्रसाद सिंह एक जाने-माने क्रिमिनल लॉएर थे। लखनऊ से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद के एन सिंह देहरादून आ गया। उनके पिता चाहते थे कि के. एन. सिंह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े हों। उन्होंने कई काम किए, कभी लाहौर जा कर प्रिंटिग प्रेस स्थापित की, तो कभी राजों रजवाड़ों को पालने के लिये जंगली जानवर सप्लाई किए तो कभी चाय बागान में काम करने वालों के लिए खास तरह के जूते बनवाए, लेकिन के. एन. सिंह का किसी काम में मन नहीं लगता था।
वकालत से हो गया मोहभंग
अपने पिता के सलाह पर के एन सिंह ने वकील बनने की सोची। के एन सिंह लंदन जाकर बैरिस्टर की पढाई करना चाह रहे थे। एक बार वह अपने पिता के साथ कोर्ट गए। कोर्ट में बैठकर उन्होंने देखा कि एक मुजरिम जिसने कत्ल किया था उसे बचा लिया गया। उस मुजरिम को बचाने वाला कोई और नहीं बल्कि उनके पिता चंडी प्रसाद सिंह ही थे। यह अन्याय देखकर के एन सिंह का वकालत से मोह भंग हो गया।
देहरादून से चले गए कोलकाता
के. एन. सिंह एथलीट भी थे और अच्छी खासी वेटलिफ्टिंग किया करते थे। उस समय वह बर्लिन ओलंपिक के लिए चुने गए थे। उनका मन आर्मी भी ज्वाइन करने का था। उनकी एक बहन की शादी कोलकाता में हुई थी। उनकी अचानक तबियत खराब हो गयी। तो उनकी देखभाल के लिए के. एन. सिंह को भेज दिया गया। उनके कोलकाता जाने की बात सुनकर देहरादून में उनके एक दोस्त नित्यानंन्द खन्ना ने उन्हें पृथ्वीराज कपूर के नाम एक पत्र दिया। पृथ्वीराज उन दिनों कोलकाता में रह कर फिल्मों में व्यस्त थे और नित्यानंद उनके फुफेरे भाई थे।

फिल्मों में पहला ब्रेक
कोलकाता जाने के बाद पृथ्वीराज कपूर ने के. एन. सिंह की मुलाकात निर्देशक देबाकी बोस से करवाई। देबाकी बोस उन दिनों कोलकाता में न्यू थियेटर्स की फिल्में निर्देशित करते थे।देबाकी बोस ने के एन सिंह को अपनी फिल्म सुनहरा संसार में छोटा सा किरदार निभाने का मौका दिया। यह फिल्म 1936 में रिलीज हुई थी। ‘सुनहरा संसार’ के बाद के एन सिंह ने न्यू थियेटर्स में 150 के मासिक वेतन पर फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया। कोलकाता में की गई फिल्मों में उनकी अदाकारी से चर्चे मुंबई तक होने लगे।
मुंबई में मिला बड़ा मौका
पृथ्वीराज कपूर कोलकाता से पहले ही मुंबई आ चुके थे। निर्देशक ए आर कारदार ने के एन सिंह को मुंबई आने का न्योता दिया और वह वह साल 1937 मुंबई आ गए। मुंबई आने के बाद के एन सिंह को निर्माता फाजलीभाई की ‘बागबान’ में काम किया। साल 1938 में रिलीज इस फिल्म ने के एन सिंह को उस युग के प्रमुख खलनायकों में से एक के रूप में स्थापित किया। खलनायक की भूमिका में वह किंग ही थे। फाजली भाई के बाद के एन सिंह ने नानुभाई देसाई के साथ कुछ दिनों तक काम किया और फिर सोहराब मोदी के मिनर्वा स्टूडियो से जुड़ गए। और ‘सिकंदर’, ‘फिर मिलेंगे’, जैसी कई फिल्मों में काम किया। मिनर्वा स्टूडियो उन्हें महीने के 500 रुपये मिलने लगे।
देविका रानी की पारखी नजर पड़ी
मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में के एन सिंह के काम के चर्चे होने लगे। बॉम्बे टॉकीज की पारखी निर्माता और अभिनेत्री देविका रानी की उन पर नजर थी। उन्होंने के एन सिंह को बॉम्बे टॉकीज में आने का निमंत्रण दिया। साथ ही उन्होंने पूछा कि आप कितनी रकम की उम्मीद करते हैं। के एन सिंह ने एक निश्चित रकम बताने के बजाय जवाब दिया मैं क्या बताऊं आप तय करें कि मुझे क्या मिलना चाहिए ? उन्हें 1600 रूपये के मासिक वेतन पर रख लिया गया। मासिक वेतन के अलावा घर से स्टूडियो आने-जाने का टैक्सी किराया भी मुकम्मल किया गया। साल 1944 तक वह स्टूडियो से जुड़े रहे। इस दौरान के एन सिंह ने बॉम्बे टॉकीज की ‘ज्वार भाटा; जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया। बाद में स्टूडियो सिस्टम टूटने पर उन्होंने बाकी कलाकारों की तरह स्वतंत्र रूप से अभिनय जारी रखा।
लोकप्रिय फिल्में
1940 और 1950 के दशक के दौरान के एन सिंह उस युग की कई प्रतिष्ठित फिल्मों में काम किया। जिनमें सिकंदर, ज्वार भाटा, हुमायूं, आवारा, सीआईडी, हावड़ा ब्रिज, चलती का नाम गाड़ी, आम्रपाली, एन इवनिंग इन पेरिस,झूठा कहीं का, हाथी मेरे साथी, ‘मेरे जीवन साथी’ जैसी कई लोकप्रिय फिल्में शामिल हैं। उन्होंने चीखने चिल्लाने वाले विलेन की भूमिका के बजाय शांत विलेन की भूमिका निभाई। उन्होंने ज्यादातर एक सफेद कॉलर वाले सज्जन विलेन की भूमिका निभाई, जो एक अच्छा सूट पहने हुए था और शांत ठंडी डिलीवरी के साथ पाइप पीता था। सूट-बूट और हैट पहने व मुंह में पाइप दबाए के एन सिंह पर्दे पर आते थे और घनी भौंहों और उनींदी पलकों से दर्शकों की तरफ देखते थे तो सिहरन सी पैदा होती थी।
दिलीप कुमार के छूट गए पसीने
बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘ज्वार भाटा’ से दिलीप कुमार लांच हो रहे थे। दिलीप कुमार का पहला शॉट लिया जा रहा था। सेट पर मौजूद के एन सिंह को देखकर उनकी घबराहट बढ़ गई तो निर्देशक अमिय चक्रवर्ती ने उनसे आग्रह किया है कि आप चाय पीने के लिए थोड़ी देर सेट से बाहर चले जाए। निर्देशक की बात के एन सिंह के समझ में नहीं आ तो उन्होंने वजह पूछा। अमिय चक्रवर्ती ने बताया कि दिलीप कुमार आपकी मौजूदगी से घबरा रहे हैं । यह सुनते ही के एन सिंह ने दिलीप कुमार के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें समझाया। दिलीप कुमार की घबराहट खत्म हो गई। दोनों ही पहले दिन से दोस्त बन गए।
आखिरी फिल्म
के एन सिंह की आखिरी फिल्म ‘दानवीर’ 20 सितंबर 1996 को रिलीज हुई थी। इस फिल्म में के एन सिंह एक छोटे से किरदार में नजर आए थे जो प्रेम चोपड़ा को खलनायकी का गुर मंत्र देते हैं। इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती और रंभा की लीड भूमिकाएं थी। के. एन. सिंह की पत्नी प्रवीण पाल भी सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी। के. एन. सिंह अपने छोटे भाई विक्रम सिंह के बेटे पुष्कर सिंह को अपना पुत्र माना था। विक्रम सिंह फिल्मफेयर के कई साल तक संपादक रहे। और, पुष्कर सिंह टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता हैं।
आखिरी दिन
अपने अंतिम वर्षों में के एन सिंह को दिखाई देना बंद हो गया था। बताया जाता है कि के एन सिंह का मामूली सा मोतियाबिंद का ऑपरेशन हुआ था। इसके बाद उन्हें कम दिखाई देने लगा और एक समय ऐसा कि बिल्कुल ही दिखाई देना बंद कर दिया। 31 जनवरी 2000 को उन्होंने मुंबई में अंतिम सांस ली।