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*अवतारी या दसरथपूत नहीं कबीर के राम*

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      पुष्पा गुप्ता

संत कबीरदास ने सदियों से चली आ रही राम विषयक सारी धारणाओं को बदल दिया। उनके राम को विरला ही कोई जान पाया।
सच में अगर विवेचन करें तो पाएंगे कि कबीर के राम पुराण प्रतिपादित अवतार नहीं थे, यह निश्चित है। वे न तो दशरथ के घर उतरे थे :
“दसरथ के गृह ब्रह्म न जनमें, ई छल माया कीन्हा.”
और न लंका के राजा का नाश करने वाले हुए, न तो देवकी की कोख से पैदा हुए थे और न यशोदा ने उन्हें गोद खेलाया था, न तो वे ग्वालों के संग घूमा करते थे और न उन्होंने गोवर्धन पर्वत को धारण किया था, न तो उन्होंने बलि को छला था और न वे वेदोद्धार के लिए वाराह रूप धारण करके धरती को अपने दांतों पर उठाया था, न वे गण्डक के शालिग्राम है, न वराह, मत्स्य, कच्छप आदि वेषधारी विष्णु के अवतार।
कबीरदास ने बहुत सोच विचार करके, अनुभव करके कहा है कि ये सब ऊपरी व्यवहार है। जो संसार में व्याप्त हो रहा है, वह राम इनकी अपेक्षा कही अधिक अगम-अपार है। उसको दूर खोजने की जरूरत नहीं, वह सारे शरीर में भरपूर हो रहा है, लोग झूठ है। सत्य है वह राम जो इस सारे शरीर में रम रहा है।

“कहै कबीर विचार करि, जिनि कोई खोजै दूरि।
ध्यान धरौ मन सुद्ध करि, राम रह्या भरपूरि।।
कहै कबीर विचार करि, झूठा लोही चांम।
जा या देहि रहित है, सो है रमिता रांम”।।

वस्तुत: जब कबीरदास निर्गुण भगवान का स्मरण करते है तो उनका उद्देश्य यह होता है कि भगवान के गुणमय शरीर की जो कल्पना की गई है वह रूप उन्हें मान्य नहीं है। परन्तु निर्गुण से वे केवल एक निषेधात्मक भाव ग्रहण करते हो, सो बात भी नहीं है।
दरअसल वे भगवान को सत्व, रज और तमोगुणों से अतीत मानते है और इसी गुणातीत रूप को ‘निर्गुण’ शब्द से प्रकट करते है। वे कहते हैं :
हे सन्तों,
मैं धोखे की बात किससे कहूँ।
गुण में ही निर्गुण है और निर्गुण में गुण,
इस सीधे रास्ते को छोड़कर कहाँ बहता फिरा जाय?
लोग उन्हें अजर कहते है, अमर कहते हैं, पर असल बात कोई कहता नहीं। वस्तुतः वह अलख है, अगम्य है:
संतौ, धौखा कांसू कहिये।
गुनमैं निरगुन, निरगुनमैं गुन, बाट छांड़ि क्यूँ बहिये।
अजर-अमर कथै सब कोई, अलख न कथनां जाई।

संक्षेप में कहे तो कबीर के राम किसी भी दार्शनिक वाद के मानदंड से परे है, तार्किक बहस के ऊपर है, पुस्तकीय विद्या से अगम्य है, पर प्रेम से प्राप्य है, अनुभूति का विषय है, सहज भाव से भावित है. यही कबीरदास के ‘निर्गुण राम’ हैं.

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