आप लोगों में से बहुत लोगों ने 2010 में रिलीज हुई आशुतोष गवारीकर निर्देशित हिंदी फिल्म “खेलें हम जी जान से* देखी होगी। यह फिल्म चटगांव विद्रोह पर केंद्रित थी। इसमें अभिषेक बच्चन ने मास्टर सूर्य सेन की भूमिका की थी और दीपिका पादुकोण कल्पना दत्त की भूमिका में थी। कल्पना दत्त जो बाद में कल्पना दत्त जोशी के नाम से जानी गईं क्योंकि उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव कॉमरेड पी.सी. जोशी से विवाह कर लिया था, एक अद्भुत क्रांतिकारी थीं जो भारत से अंग्रेजी राज के खात्मे के लिए हथियार बंद संघर्ष में उतर गई थीं।
आज जब इतिहास के ज्ञान से कोरे कुछ लोग यह कहते हैं कि लाल सलाम कहने वालों को जीने का हक़ नहीं है तो दरअसल वे अंग्रेजों की कही बात को दोहरा रहे हैं। अंग्रेज जो चाहते थे, वे ये लोग करना चाहते हैं।
क्यों? क्योंकि उनका तो इतिहास ही अंग्रेजों के पिछलग्गू होने का था। उनके पास तो एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने आजादी की लड़ाई में कुर्बानी दी हो। जबकि लाल सलाम बोलने वाले तो हजारों लोग थे। इन्हीं में से एक हैं कल्पना दत्त जोशी।
कल्पना दत्त का जन्म पूर्वी बंगाल जो अब बांग्लादेश है के चटगांव जिले के श्रीपुर गांव में हुआ था। 1929 में चटगाँव में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद, वह कलकत्ता चली गईं और विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए बेथ्यून कॉलेज में दाखिला ले लिया।
यहां आकर वे महिला छात्र संघ में शामिल हो गईं जहां उन्हें प्रीतिलता बाड़ेददार और बीना दास जैसी दोस्त मिली जो उनके जीवन मिशन का अभिन्न हिस्सा बन गई।
ये सब मास्टर सूर्य सेन के नेतृत्व में चल रही इंडियन रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गई और क्रांतिकारी अभियानों का हिस्सा बनने लगीं। क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने के लिए धन और हथियारों की जरूरत पड़ती थी और इसके लिए क्रांतिकारी अक्सर अंग्रेजी सरकार के ठिकानों पर छापा मारते थे।
चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हुए काकोरी ट्रेन काण्ड की जानकारी आपको होगी ही। ऐसा ही एक अभियान था चटगांव के अंग्रेजी शस्त्रागार को लूटने का प्रयास जिसमे ये क्रांतिकारी शामिल हुए।
आमने सामने की लड़ाई भी हुई। दर्जनों क्रांतिकारी मारे गए लेकिन सौ से भी अधिक ब्रिटिश सैनिकों को मारकर।
बहरहाल गिरफ्तारियां हुई। कल्पना दत्त भी बहुत दिनों तक भूमिगत रहने के बाद 1933 में पकड़ी गई और उन्हें अंग्रेजी अदालत ने आजीवन कारावास की सजा दी।
समय पूर्व जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और उस दौर के अधिकांश क्रांतिकारियों की तरह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं।
1943 में उन्होंने सीपीआई के महासचिव और देश के एक और महत्वपूर्ण व्यक्तित्व कॉमरेड पी सी जोशी से विवाह कर लिया।
इसी साल बंगाल में भीषण अकाल पड़ा जिसमें उन्होंने अपने जीवन को खतरे में डालकर लोगों की सेवा की और राहत के काम में जुटी रहीं।
उनके दो बेटे हुए: चांद और सूरज। ये चांद की पत्नी मानिनी चटर्जी की किताब ही थी जिस पर आशुतोष गवारीकर की फिल्म आधारित थी।
कॉमरेड कल्पना दत्त जोशी को हमारा क्रांतिकारी लाल सलाम।

