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कार्लमार्क्स का चिन्तन व्यवस्था निर्माण का अमूल्य सूत्र है ..पर अधूरा है ..

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मंजुल भारद्वाज

कार्लमार्क्स का चिन्तन व्यवस्था निर्माण का अमूल्य सूत्र है ..पर अधूरा है ..क्योंकि व्यवस्था को चलाने ‘वाले’ व्यक्ति की व्यवस्था यानी ‘चरित्र’ निर्माण पर खामोश है ..इस अधूरेपन को पूरा किये बगैर ‘न्यायसंगत’ व्यवस्था का टिक पाना असम्भव है. क्योकि लोभ. लालच, हिंसा,वर्चस्ववाद ये आत्मजनित मानव दुर्गुण हैं. 

वर्गीय संघर्ष अटल है सदियों तक हुआ है होता, रहेगा.संघर्ष के तरीके क्या हों? मार्क्स संघर्ष में हिंसा को नकराते नहीं हैं. धर्म को खारिज़ करते हैं और धर्म के अंतिम हथियार ‘वध’ को अपनाने में गुरेज़ नहीं करते ..ये विरोधाभास है मार्क्स के चिंतन में. 

मार्क्स हाशिये के द्वारा सत्ता क़ायम करने के बाद ‘सत्ता’ के चारित्रिक दुष्प्रभाव से निकलने का मार्ग नहीं सुझाते. मार्क्स ने स्वयं अपने सिद्धांत का प्रयोग सत्ता के लिए नहीं किया.पर उनके सिद्धांत पर खड़ी हुए सत्ता ‘हाशिये’ की व्यवस्था के नाम पर तानाशाहों की जागीर निकली. 

समता और सर्वहारा के नाम पर एक व्यक्ति सालों साल या अपनी मृत्य तक मसीहा बना रहा..यानी एक व्यक्ति ‘अवतार’ बनकर काबिज़ रहा. ये व्यक्तिवाद का उभार मार्क्स के चिंतन का दीमक है. 

मार्क्स का विचार तानाशाहों की हिंसा और साम्राजवादी मंसूबों की ढाल बना हुआ है. हमें मार्क्स के विचार को नए सिरे से समझने की ज़रूरत है . कोई भी मार्क्स को खारिज़ नहीं कर सकता पर उनके ‘विचार’ पर खड़े हुए ‘राजनीतिक साम्राज्यों का सटीक विश्लेष्ण अनिवार्य है. कार्लमार्क्स का चिन्तन व्यवस्था निर्माण का अमूल्य सूत्र है ..पर अधूरा है ....
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