Site icon अग्नि आलोक

कश्मीर अंतर्कथा : जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल जनता ने नेहरू और सरदार पटेल को अपना माना था

Share

वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह की पुस्तक शेषजी, शेष नारायण सिंह : राजनीतिक व वैचारिक लेखों का संकलन प्रकाशित हुई है। इस पुस्तक के एक लेख में वे कश्मीर के संदर्भ में पूरी निष्पक्षता से शेख अब्दुल्ला, जवाहरलाल नेहरू, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और सरदार पटेल की भूमिका का जिक्र करते हैं।

आज जम्मू – कश्मीर की सियासत में बहुत बड़ी उथल-पुथल चल रही है। संविधान के अनुच्छेद 370 का असर खत्म कर दिया गया है और राज्य को किसी भी अन्य राज्य की तरह बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। फिलहाल लद्दाख को जम्मू- कश्मीर से अलग कर दिया गया है और एक राज्य की जगह दो केन्द्रशासित राज्य बना दिए गए हैं।

जम्मू-कश्मीर ऐतिहासिक रूप से हमेशा से भारत का हिस्सा रहा है। सच है कि समय-समय पर राजनीतिक एकता नहीं रही है लेकिन सांस्कृतिक एकता बराबर रही है। आज़ादी के बाद जो समस्याएँ पैदा हुई उनकी जड़ में तत्कालीन महाराजा हरिसिंह की गैर- ज़िम्मेदार भूमिका थी।

जब सरदार पटेल ने राजा से जम्मू-कश्मीर के विलय के दस्तावेज़ पर दस्तख़त करवा लिए तभी वहाँ के हिन्दू, मुसलमान और बौद्धों ने अपने को आज़ाद माना। जम्मू – कश्मीर सीधे अंग्रेज़ों के अधीन तो कभी नहीं रहा इसलिए उनकी आज़ादी 15 अगस्त, 1947 के दिन नहीं हुई। उनकी आज़ादी तब हुई जब अक्टूबर , 1947 में राजा हरिसिंह ने उनका पिंड छोड़ दिया और जम्मू-कश्मीर आजाद भारत का हिस्सा हो गया। लेकिन आज हालात बिल्कुल अलग हैं। जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना को धता बताया था और तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ विलय की कोशिश को नकार दिया था, भारत के साथ विलय की शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी, वही आज भारतीय नेताओं से बेहद नाराज है। जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल जनता ने नेहरू और सरदार पटेल को अपना माना था। 70 साल के इतिहास पर नजर डालने से तस्वीर साफ हो जाएगी।

जिस कश्मीरी अवाम ने कभी पाकिस्तान और उसके नेता मुहम्मद अली जिन्ना को धता बताया था और तत्कालीन राजा की पाकिस्तान के साथ विलय की कोशिश को नकार दिया था, भारत के साथ विलय की शेख अब्दुल्ला की कोशिश को अहमियत दी थी, वही आज भारतीय नेताओं से बेहद नाराज है। कश्मीर में पिछले 30 साल से चल रहे आतंक के खेल में लोग भूलने लगे हैं कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल जनता ने नेहरू और सरदार पटेल को अपना माना था। पिछले 70 साल के इतिहास पर नजर डालने से तस्वीर पूरी तरह साफ हो जाएगी।

देश के बँटवारे के वक्त अंग्रेजों ने देशी रियासतों को भारत या पाकिस्तान के साथ मिलने की आजादी दी थी। बहुत ही पेचीदा मामला था। ज्यादातर देशी राजा-नवाब तो भारत के साथ मिल गए लेकन जूनागढ़ , हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर का मामला विवादों के घेरे में रहा। कश्मीर में ज्यादातर लोग आज़ादी के पक्ष में थे। कुछ लोग चाहते थे कि पाकिस्तान के साथ मिल जाएं लेकिन अपनी स्वायत्तता सुरक्षित रखें। इस बीच, महाराजा हरिसिंह के प्रधानमन्त्री ने पाकिस्तान की सरकार के सामने स्टैंड-स्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव रखा जिसके तहत लाहौर सर्किल के केन्द्रीय विभाग, पाकिस्तान सरकार के अधीन काम करते। 15 अगस्त को पाकिस्तान सरकार ने स्टैंड-स्टिल एग्रीमेंट का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और पूरे राज्य के डाकखानों पर पाकिस्तानी झंडे फहराने लगे। भारत सरकार को इससे चिन्ता हुई। जवाहरलाल नेहरू ने इन शब्दों में चिन्ता व्यक्त की, “ पाकिस्तान की रणनीति यह है कि अभी ज्यादा- से-ज्यादा घुसपैठ कर ली जाए और जब जाड़ों में कश्मीर अलग- थलग पड़ जाए तो कोई बड़ी कार्रवाई की जाए।”

नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र भी लिखा कि ऐसे हालात बन रहे हैं कि महाराजा के सामने और कोई विकल्प नहीं बचेगा और वे नेशनल कॉन्फ्रेंस और शेख अब्दुल्ला से मदद माँगेंगे और भारत के साथ विलय कर लेंगे। अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर हमला करना इसलिए मुश्किल हो जाएगा कि उसे सीधे भारत से मुकाबला करना पड़ेगा। अगर राजा ने यह सलाह मान ली होती तो कश्मीर समस्या का जन्म ही न होता। इस बीच, जम्मू में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। अक्टूबर तक बात बहुत बिगड़ गई और महात्मा गाँधी ने इस हालत के लिए महाराजा को व्यक्तिगत तौर जिम्मेदार ठहराया। पाकिस्तान ने महाराजा पर दबाव बढ़ाने के लिए लाहौर से कपड़ों, पेट्रोल और राशन की सप्लाई रोक दी। संचार व्यवस्था पाकिस्तान के पास स्टैंड-स्टिल एग्रीमेंट के बाद आ ही गई थी। उसमें भी भारी अड़चन डाली गई। लगने लगा था कि अक्टूबर 1946 की महात्मा गाँधी की भविष्यवाणी सच हो जाएगी, जब उन्होंने कहा था कि अगर राजा अपनी ढुलमुल नीति से बाज नहीं आते तो कश्मीर का एक यूनिट के रूप में बचे रहना सन्दिग्ध हो जाएगा।

राजा ने पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की कोशिश शुरू कर दी। उनके प्रधानमन्त्री मेहर चन्द महाजन को कराची बुलाया गया। महाजन ने कहा कि उनकी इच्छा है कि कश्मीर पूरब का स्विटज़रलैंड बन जाए, स्वतन्त्र देश हो और भारत और पाकिस्तान, दोनों से उसके दोस्ताना सम्बन्ध रहें। पाकिस्तान की इसमें दिलचस्पी नहीं थी। उसने कहा कि पाकिस्तान में विलय के कागजात पर दस्तखत करो फिर देखा जाएगा। इधर 21 अक्टूबर, 1947 को राजा ने रिटायर्ड जज बख्शी टेक चन्द को कश्मीर का नया संविधान बनाने के लिए नियुक्त कर दिया। कश्मीर को स्वतन्त्र देश बनाने का राजा का विचार जिन्ना को पसन्द नहीं आया और पाकिस्तान सरकार ने कबायली हमले शुरू कर दिए। राजा को अँधेरे में रख कर कबायलियों को आगे करके पाकिस्तानी फ़ौज श्रीनगर की तरफ बढ़ने लगी। जब हमले का पता चला तब राजा हरिसिंह को जिन्ना की तिकड़मबाज़ी समझ में आई। प्रधानमन्त्री मेहर चन्द महाजन 26 अक्टूबर को दिल्ली गएऔर नेहरू से कहा कि महाराजा भारत के साथ विलय करना चाहते हैं। शर्त यह है कि भारतीय सेना आज ही कश्मीर पहुँच जाए और पाकिस्तानी हमले से उनकी रक्षा करे वरना वे पाकिस्तान से बातचीत शुरू का देंगे। नेहरू ने गुस्से में उन्हें भगा दिया। शेख अब्दुल्ला दिल्ली में थे। उन्होंने नेहरू का गुस्सा शान्त कराया। सरदार पटेल ने वी.पी. मेनन को भेजकर राजा से विलय के कागजात पर दस्तखत करवाए, जिसे भारत सरकार ने 27 अक्टूबर को मंजूर कर लिया। सरदार पटेल ने तत्काल हवाई जहाज से भारत की फौज को रवाना कर दिया और पाकिस्तानी शह पर आए कबायलियों को कश्मीर से खदेड़ दिया गया। कश्मीरी अवाम ने कहा कि भारत हमारी आजादी की रक्षा के लिए आया है जबकि पाकिस्तान ने हमारी आज़ादी को रौंदने के लिए हम पर फौजी हमला किया था।

उसके बाद बात बिगड़ना शुरू हो गई। लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर नेहरू 1 जनवरी 1948 को पाकिस्तान हमले का मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले गए। अपने इस फैसले पर बाद में वे खुद बहुत पछताए और एक देश के रूप में तो भारत आज तक अफसोस कर रहा है। पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाने शुरू कर दिए। ब्रिटेन ने मामले को तूल दे दिया। ब्रिटिश सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में अपने प्रभाव और अमरीका की मदद से इसे भारत-पाकिस्तान विवाद का रूप दे दिया। सरदार पटेल इसके पक्ष में नहीं थे लेकिन नेहरू को अंग्रेजों की न्यायप्रियता पर बहुत भरोसा था। 21 अप्रैल , 1948 को सुरक्षा परिषद् ने एक प्रस्ताव पास कर दिया, लेकिन उसमें पाकिस्तान से अपने कबायली लड़ाके वापस लेने को नहीं कहा गया। भारत को अपमानित करने के लिए भारत और पाकिस्तान को बराबर माना गया। भारत में चारों तरफ तल्खी का माहौल बन गया। उन दिनों सुरक्षा परिषद् में भारत के स्थायी प्रतिनिधि एन. गोपालस्वामी आयंगर हुआ करते थे। उन्होंने सरकार के पास जो नोट भेजा उसमें लिखा है कि, “ मैं अपनी सरकार को यह सलाह कभी नहीं दूंगा कि वह कोई मामला सुरक्षा परिषद् में लाए।” नेहरू को इस बात की गम्भीरता का अनुमान हो गया था। बाद में जब अमरीका की सरकार भारत से दोस्ती के संकेत देने की कोशिश कर रही थी और अमरीका में भारत की राजदूत विजयलक्ष्मी पंडित के ज़रिये कुछ सन्देश भेजने की कोशिश कर रही थी तो 10 नवम्बर 1952 को नेहरू ने एक सख्त टेलीग्राम विजयलक्ष्मी पंडित को भेजा। उसमें लिखा था, ” गलत बुनियाद पर कभी सही फैसला नहीं हो सकता। अमरीका ने हमारे साथ अन्याय किया है। पहले उस अन्याय को ठीक करें तब आगे बात की जाएगी।” नेहरू ने अमरीकी विदेश विभाग को कह दिया था कि अमरीका का रवैया द्वेषपूर्ण है। हम सबकी इच्छा है कि दोनों देशों के बीच दोस्ती कायम हो लेकिन अमरीकी रुख के साथ यह सम्भव नहीं है। ( नेहरू का पत्र , जी . एल .मेहता के नाम)

कश्मीर के मामले में शेख अब्दुल्ला हमेशा से एक स्थायी तत्त्व रहे हैं। शुरू में वे पूरी तरह से गाँधी, नेहरू और सरदार पटेल के साथ थे। लेकिन बाद में उनके नजरिये में भारी बदलाव आ गया। शेख अब्दुल्ला पर नेहरू को बहुत भरोसा था। एक समय था जब नेहरू मानते थे कि शेख अब्दुल्ला ही कश्मीर को संभाल सकते हैं। उन्होंने 13 नवम्बर 1947 को राजा हरि सिंह को लिखा था कि, अगर कोई आदमी कश्मीर में सब कुछ ठीक कर सकता है, तो वह है शेख अब्दुल्ला। उनकी विश्वसनीयता और दिमागी सन्तुलन पर मुझे पूरा भरोसा है। बड़े फैसलों में चूकेंगे नहीं, ऐसा मुझे विश्वास है। कश्मीर की किसी परेशानी का हल शेख के बिना हासिल नहीं किया जा सकता।’

शेख अब्दुल्ला भारत और उसके प्रधानमन्त्री के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। नेहरू को अनुमान ही नहीं था कि शेख़ साहब एक ऐसे कश्मीर की कल्पना कर रहे थे जो भारत से पूरी तरह आज़ाद होगा। इस बात की सम्भावना इसलिए भी ज़ोर पकड़ रही थी कि दिल्ली में कुछ अमरीकी अधिकारियों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि आज़ादी अच्छी चीज़ है। इसी बातचीत में उन्होंने ब्रिटेन और अमरीका को कश्मीर के विकास में सहभागी के रूप में आमन्त्रित करने के भी संकेत दिएए थे। हद तो तब हो गई जब नेहरू को पता लगा कि शेख अब्दुल्ला उनके और सरदार पटेल के बीच मतभेद पैदा करने की कोशिश कर रहे थे। हुआ यों कि शेख ने कहीं बयान दे दिया कि कुछ लोग कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले कर देना चाहते थे। सरदार पटेल ने इस बात का बहुत बुरा माना और अपनी नाराजगी जाहिर की।

लेकिन नेहरू ने बात को टालना चाहा। उन्होंने 4 अक्टूबर 1948 को सरदार पटेल को चिट्ठी लिखकर बात सँभालने की कोशिश की। चिट्ठी में लिखा कि, ” मुझे विश्वास है कि शेख अब्दुल्ला की सोच में स्पष्टता की कमी है और बहुत सारे नेताओं की तरह बोलते-बोलते कुछ भी बोल जाते हैं। वे इस बात से बहुत चिन्तित रहते हैं कि कहीं उनके लोग पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा के प्रभाव में न आ जाएं। मैंने उनसे साफ़ कह दिया है कि उनकी समझ अपनी जगह ठीक है लेकिन उनको सँभाल कर बात कहनी चाहिए।” शेख अब्दुल्ला नेहरू की बात समझने के लिए तैयार ही नहीं थे। उनके और जवाहरलाल के बीच मतभेद इस कदर बढ़ गए कि जनवरी , 1949 में जवाहरलाल को उनसे अपील करनी पड़ी कि हर बात को प्रेस में बोलने से बाज़ आएं और विवाद को बातचीत से हल करने की आदत डालें। लेकिन इसके बाद भी हालात सुधरे नहीं। नेहरू ने फरवरी , 1949 में कृष्ण मेनन को लिखा कि शेख अब्दुल्ला और केन्द्र सरकार के बीच कोई समझदारी ही नहीं है। शेख अब्दुल्ला ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि सर ओवन डिक्सन को सुझाव दिया कि उनकी इच्छा है कि वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के नेताओं से बातचीत करके स्वतन्त्र कश्मीर की बात को आगे बढ़ाएं। ये बातें सार्वजनिक हो चुकी थीं ।शेख अब्दुल्ला प्रेस से बात करने से बाज नहीं आ रहे थे और कृष्ण मेनन भी तुरन्त जवाब दे रहे थे। नेहरू ने कहा कि जब इस तरह के दोस्त हों तो बात कैसे कर सकते थे। नेहरू ने उनको को पत्र लिखा। वे लिखते हैं, अफसोस है कि आपने ऐसी पोजीशन ले ली है कि हमारी किसी बात पर कोई दोस्ताना सलाह को आप कोई महत्त्व नहीं देते और उसको दखलअंदाजी मानते हैं। शेख अब्दुल्ला जवाहरलाल से सरदार पटेल के मातहत अफसरों की शिकायत करते रहते थे और सरदार की शिकायत जवाहरलाल नेहरू को बर्दाश्त नहीं थी।

शेख अब्दुल्ला की ज़िद के कारण बात बिगड़ती जा रही थी। गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने नेहरू को बताया कि वल्लभ भाई (सरदार पटेल) सोचते हैं कि शेख अब्दुल्ला से डील करने का काम सिर्फ वही कर सकते हैं। शेख ने 11 अप्रैल, 1952 को रणबीरसिंह पुरा में ऐसा भाषण दे डाला जिसमें जवाहरलाल और उनके मतभेद बहुत खुलकर सामने आ गए। भाषण में उन्होंने भारत और पाकिस्तान को एक-दूसरे के बराबर साबित करने की कोशिश की और भारतीय अख़बारों को खूब कोसा। शेख की समझ में आ गया कि नेहरू नाराज हैं। एक बयान जारी करके उन्होंने कहा कि प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रेस ट्रस्ट वालों ने उनकी सरकार से कुछ आर्थिक सहयोग माँगा था। जब मना कर दिया गया तो उनके पीछे पड़ गए हैं। नेहरू ने शेख को 25 अप्रैल को चिट्ठी में लिखा कि वे उनसे किसी भी मसले पर बात कोई बात नहीं करना चाहते। मेरी नज़र में आप ही कश्मीरी अवाम के प्रतिनिधि थे लेकिन आपने इस तरह के बयानात देकर मुझे बहुत तकलीफ पहुँचाई है। नेहरू की परेशानी यह थी कि सरदार पटेल का स्वर्गवास हो चुका था। जब तक सरदार जीवित थे कश्मीर के राजा या शेख अब्दुल्ला की बातों को सँभाल लेते थे लेकिन अब नेहरू अकेले पड़ गए थे। अगस्त , 1952 तक कश्मीर की यह हालत हो गई थी कि वह न तो स्वतन्त्र था, न वहाँ शान्ति थी और न ही वहाँ के हालात सामान्य थे।

शेख अब्दुल्ला के रुख का नतीजा था कि जम्मू के इलाके में हिन्दू साम्प्रदायिक शक्तियों को शेख़ के बहाने नेहरू पर हमला करने का मौका मिल रहा था। जम्मू में प्रजा परिषद् का शेख अब्दुल्ला और उनकी सरकार के ख़िलाफ़ जो आन्दोलन चल रहा था, वह पूरी तरह साम्प्रदायिक था। प्रजा परिषद् को हिन्दू महासभा के पुराने नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नई पार्टी जनसंघ, अकाली दल, हिन्दू महासभा और आर.एस.एस. का समर्थन मिल रहा था। हालत बहुत नाजुक हो गई थी और अब नेहरू इस आन्दोलन के निशाने पर आ गए थे। शेख के हवाले से बढ़ रहे आन्दोलन में गौहत्या और पूर्वी बंगाल (अब ही बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों के मुद्दे भी जुड़ गए थे। सहालात बिगड़ने का ख़तरा रोज़ बढ़ रहा था। जवाहरलाल ने खुद संकेत दिया कि वे हर मोर्चे पर असफल नज़र आ रहे हैं। उनके आदेशों का पालन नहीं हो रहा था। उन्होंने आदेश दिया कि जहाँ भी उपद्रव हो रहा हो उसको फौरन रोका जाए लेकिन कोई असर नहीं हो रहा था। नए गृहमन्त्री कैलाशनाथ काटजू में वह बात नहीं थी जो सरदार पटेल में थी। बहुत सारे अफसर काटजू की बात नहीं सुनते थे।

उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं आचार्य जे . बी . कृपलानी और जयप्रकाश नारायण से अपील की कि इस आन्दोलन का समर्थन मत करो क्योंकि यह धर्मनिरपेक्ष राजनीति के खिलाफ है। जयप्रकाश नारायण ने टका-सा जवाब दिया कि साम्प्रदायिकता के विरोध का मतलब यह नहीं है कि समस्या के निदान के लिए नेहरू की तरकीब का समर्थन किया जाए। जयप्रकाश नारायण अपने को नेहरू से ज़्यादा काबिल समझते थे। उधर नेहरू की बुनियादी गलती यह थी कि वे साम्प्रदायिक आन्दोलन को रोकने के लिए शेख अब्दुल्ला की सरकार को सेकुलर और राष्ट्रहित में बता रहे थे, जबकि उनके अलावा कोई इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं था।

जम्मू के आन्दोलन को श्यामा प्रसाद मुखर्जी बहुत ही सलीके से जवाहरलाल की धुलाई करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। उन्होंने संसद के उस अधिकार को चुनौती देना शुरू कर दिया था जिसके कारण जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा और अधिकार दिए गए थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जवाहरलाल को फरवरी, 1953 को एक बहुत ही सख्त चिट्ठी लिखी जिसमें लिखा था कि, ” आपकी गलत नीतियों और अपने विरोधियों की राय को नज़रअन्दाज़ किए जाने की आदत के कारण ही आज देश बर्बादी के मुहाने पर खड़ा है।” नेहरू ने शेख अब्दुल्ला से कहा के समस्या विकराल है और उसका समाधान लोगों के दिल और दिमाग़ को जीत कर हासिल किया जाना चाहिए। दमन का रास्ता ठीक नहीं है। लेकिन शेख उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी बिना किसी परमिट के जम्मू-कश्मीर चले गए और शेख अब्दुल्ला ने उनको गिरफ्तार कर लिया। नहीं मानेंगे इसलिए केवल एक रास्ता बचता । काहिरा में नेहरू को पता लगा कि 23 जून, 1953 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जेल में ही मृत्यु हो गई। शेख अब्दुल्ला की सरकार बरखास्त हुई और वे गिरफ्तार भी हुए। नेहरू को लगा कश्मीर की समस्या का समाधान शेख अब्दुल्ला के बिना नहीं हो सकता तो उन्होंने शेख को रिहा किया। 64 में नेहरू की मौत की खबर सुन कर शेख अब्दुल्ला फूट-फूट कर रोए। लेकिन नेहरू के देहावसान के साथ ही नेहरू युग का भी अवसान हो चुका था।
(प्रकाशक-वाणी प्रकाशन)

Exit mobile version