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कविता…*माई बाप*

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विवेक मेहता

पेट पीठ से चिपक रहा रोटी दो,रोजगार दो 

माई बाप।

मोबाइल नहीं, पैसे नहीं, सिग्नल नहीं,

नेट नहीं, पढ़े कैसे?

माई बाप। 

ऑक्सीजन नहीं, दवाईयां नहीं, लकड़ियां नहीं, 

श्मशान खाली नहीं, 

कहो तो गंगा में बहा दें? 

माई बाप।

कर लेंगे बात जात पात की 

कर देंगे दंगे फसाद भी 

समय और जगह बता दे सब 

राशन तो देंगे ना आप! 

माई बाप। 

दौड़ दी मशीनें 

रौंद डाले सारे आसरे

भाई देखा ना माई

सुबह देखी ना रात 

सबसे बड़ा हुकुम आपका

माय बाप। 

आपने लगा मुझे उधर 

मेरा आसरा उजड़वा दिया इधर 

मलबे के ढेर पर खड़ा आंसू पी रहा हूं आज

कल पिएंगे आप 

मशीन तो हृदय हीन है 

क्या मशीन है आप ! 

माय बाप।

         

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