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ढूंढो ढूंढो रे मानवता?

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शशिकांत गुप्ते

मानवीयता का मुख्य गुण है। बेसहारा को सहारा देना, दीनदुखियों की मदद करना, कोई गिरता है, तो उसे संभालना।
गिरता है मतलब जो अशक्त हो, जो कुपोषित हो, जो क्षीणकाय हो ऐसे व्यक्ति को गिरने से बचाना ही मानवीयता है।
यह सब करते हुए ,जो इस भजन में शब्दों के रूप में उपदेश है, वह भी ध्यान में रखना अनिवार्य है।
वैष्णव जन तो तेने कहिये,
जे पीड परायी जाणे रे
पर दुःखे उपकार करे तो ये,
मन अभिमान न आणे रे ॥

पंद्रहवीं सदी के प्रख्यात संत नरसी मेहता द्वारा रचित सारगर्भित भजन की उक्त पंक्तिया हैं।
वर्तमान में सब उल्टापुल्टा हो रहा है। ‘अ’ नीति को शिरोधार्य कर ‘अ’ नैतिक आचरण को अंगीकृत कर, तमाम तरह के कानून,कायदों को धता बताकर बेतहाशा धन अर्जन करने में निपुण लोगों को व्यंग्यात्मक भाषा में कहा है कि, ये गिरे हुए लोग हैं।
इसतरह गिरे हुए लोगों से निःसंकोच गलबहियां कर उनके साथ सत्ता में भागीदारी करने के लिए उन्हें विलासितापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है।
आश्चर्य का मुद्दा तो यह है कि,इसतरह से सत्ता प्राप्त कर जनसेवा की जाएगी।
यह भी बहुत ही अचरज की बात है,उक्त सारा खेल मालिक को बगैर पूछे मतलब जनता को बिना विश्वास में लिए खेला जा रहा है।
लोकतंत्र में जनता ही देश की मालिक होती है।
उक्त खेल करने वाले यह भूल जातें हैं कि,उनके द्वारा इसतरह से खेल खेलने में जो समयावधि व्यतीत होती है। उस समयावधि में जनहित के निर्णय नहीं हो पातें है,जनता परेशान होती है। उक्त खेल में जो धन व्यय होता है। यह धन श्वेत या स्याह कौन से रंग का है, यह अहम प्रश्न उपस्थित होता है।
जितने दिन उक्त खेल चलता है,उतने दिन प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति असमजंस्य हो जाती है। इस स्थिति का खामियाजा भी मालिक मतलब जनता को ही सहन करना पड़ता है।
यह सब सत्ता केंद्रित मानसिकता का परिणाम है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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