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राजा

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राजा के पाँव चूँकि ज़मीन पर नहीं होते
राजा के पाँवों में बिवाइयाँ नहीं फटतीं
राजा के हाथ सख़्त नहीं होते
किसान या मज़दूर के हाथों की तरह
उसके हाथ मुलायम होते हैं और
मौत की तरह ठंडे और ख़ौफ़नाक
विभिन्न मुद्राओं में नाचती उसकी उंगलियाँ
इन्सानों को कठपुतलियों की तरह नचाती हैं
राजा के चेहरे पर लहू की सी लाली होती है
राजा की आँखों में जंगल की आग सी चमक
राजा कब, क्यों और किस पर हँसता है
यह उसके अलावा कोई नहीं जानता
कान होते हैं पर राजा किसी की नहीं सुनता
राजा की ज़ुबान असल में कमान होती है
जहाँ से निरंतर विषबुझे तीर छूटते रहते हैं
कफ़न से नए और सुथरे होते हैं राजा के वस्त्र
राजा की दाढ़ी में हमेशा तिनका अटका होता है
राजा के दिमाग़ में एक करघा रहता है
जिस पर रात दिन काता जाता है महीन झूठ।
– हरभगवान चावला

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