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*कीर्ति के किस्से… किस्सों की कीर्ति*

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विनोद पुरोहित 

-आम अवधारणा है कि वक्त को एक रेखीय माना जाता है। वक्त खुद को दोहराता नहीं है लेकिन शुक्रवार 8 अगस्त को उन करीब तीन घंटों में वक्त की चाल वृत्ताकार थी। यादों में ही सही गुजरा दौर जीवंत हो उठा था। गुजरीं कितनी ही बातें और घटनाएं ताजा हो गईं। मौका था कीर्ति राणा जी की किताब ‘किस्से कलमगिरी के’ के  विमोचन का। 

1993 में चेतना अखबार जॉइन किया गया था तब कीर्ति राणा, उनकी खबरें और काम करने के अंदाज के बारे में साथियों से सुना करते थे। कुछ महीनों बाद ही उनके साथ ही भास्कर में काम करने का मौका मिल गया। 

कीर्ति जी वाकई इंदौर में रिपोर्टिंग के ‘राणा’ हैं। उनके अपने हल्दीघाटी के मैदान हैं, जहां उन्होंने जाने कितनी ही जंग लड़ी हैं। कितनी जीतीं, कितनी हारे…ये तो वही जानते हैं लेकिन बाहर से कुछेक में उनके संघर्ष को नजदीक से देखा है। हर संघर्ष के बाद उनके चेहरे पर मुस्कुराहट बढ़ती गई। निरंतरता उनका अहम गुणधर्म है। 90 के दौर से अब तक उनकी काम करने की रफ्तार और कीर्ति जस की तस है। वे तब जितने सक्रिय और चर्चा में रहते थे, आज भी वैसे हैं। तब भी प्रश्न पूछते थे और आज भी वे उतनी ही शिद्दत से प्रश्न पूछते हैं। खबरों के लिए उनकी जद्दोजहद के साथ ही रिश्ते बनाने और निभाने में भी उनका जज्बा गजब है। 

गुजरे दौर के किस्सों को कलमबद्ध करने के लिए राणा जी आभार। ये किस्से यकीनन उस दौर के साथियों को गुदगुदाएंगे तो आज के दौर के पत्रकारों की समझ और दृष्टि को  बढ़ाएंगे। ये रिपोर्टिंग और न्यूज रूम के जरूरी दस्तावेज हैं। 

कीर्ति राणाजी को किताब के लिए बधाई…शुभकामनाएं।

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