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जानिए विश्वामित्र का विशिष्ट प्रयोग

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         डॉ. विकास मानव

    वैज्ञानिक अध्यात्म के वैदिक द्रष्टा ऋषि विश्वामित्र इन दिनों अपने विशिष्ट महाप्रयोग में लीन थे। पिछले कुछ वर्षों से वे पूरी तरह से एकांत में थे। वाणी का प्रयोग भी उन्होंने प्रायः बंद कर रखा था। उनकी वाणी अब केवल विशेष मुहूर्तों में किए जाने वाले अति आवश्यक मंत्रोच्चार के लिए ही सक्रिय होती थी, अन्य कार्यों के लिए तो वे बस, संकेतों से काम चला लेते थे। 

     उनके इस महाप्रयोग की ऊष्मा ऊर्जा से उनकी महान तपस्थली सिद्धाश्रम का कण-कण ऊर्जस्वित-आपूरित हो रहा था। यों तो महर्षि विश्वामित्र ने अपना समूचा जीवन तप के अनगिनत आध्यात्मिक प्रयोगों में बिताया था। ऋग्वेद के तृतीय मंडल के सभी बासठ सूक्त इसकी साक्षी देते हैं।

       ऋग्वेद के इस तृतीय मंडल के बासठवें सूक्त का दसवाँ मंत्र गायत्री महामंत्र के रूप में लोकविख्यात हो रहा था। इसी के साथ गायत्री महामंत्र के द्रष्टा, अलौकिक अनुभवी सिद्ध एवं इस महामंत्र से जुड़ी सहस्राधिक साधनाओं के सूक्ष्म एवं पारगामी तत्त्वदर्शी महर्षि विश्वामित्र भी सुविख्यात हो रहे थे। परंतु उन्हें लोकख्याति नहीं, लोकसेवा प्रिय थी। 

        विश्वहित के प्रयोजनों में स्वयं को निरंतर खपाते रहने के कारण ही विश्व आज उन्हें विश्वामित्र के रूप में जान रहा था। पहले कभी वे वैभवशाली नरेश विश्वरथ हुआ करते थे, परंतु जब से उन्होंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के संग-सान्निध्य में अध्यात्म विद्या, ब्रह्मतेज एवं ब्रह्मबल की महिमा जानी, तब से वे क्षात्रबल व क्षात्रतेज से वैराग्य लेकर आध्यात्मिक प्रयोगों में लीन हो गए।

       अब तो ब्रह्मर्षि वसिष्ठ भी उनके महान तप एवं लोकसेवा की प्रशंसा करते थकते नहीं थे। इसीलिए तो उन्होंने आग्रहपूर्वक महाराज दशरथ से अनुरोध करके श्रीराम एवं उनके अनुज लक्ष्मण को महर्षि विश्वामित्र की सेवा में भेजा था। उस समय भी महर्षि आवश्यक प्रयोग कर रहे थे, लेकिन यह तो बहुत साल पहले की बात थी।

       महाराज दशरथ स्वर्गवासी हो चुके थे। श्रीराम अपनी भार्या सीता एवं अनुज लक्ष्मण सहित चित्रकूट वन में थे। ब्रह्मर्षि वसिष्ठ अयोध्या में कुमार भरत को अपना संरक्षण प्रदान कर रहे थे।

    इधर ऋषि विश्वामित्र ने सिद्धाश्रम में नया विशिष्ट महाप्रयोग प्रारंभ किया था। इस प्रयोग को शुरू करने से पहले उन्होंने अपने शिष्य जाबालि, पुत्र मधुच्छंदा, पौत्र जेत एवं अघमर्षण को बुलाकर कहा था कि इस बार की चुनौतियाँ पहले की सभी चुनौतियों से कहीं अधिक गंभीर हैं।

       इस बार सवाल किन्हीं मारीच, सुबाहु या ताड़का द्वारा फैलाए जा रहे आतंक का नहीं है, सवाल किसी क्षेत्र विशेष की सुरक्षा का भी नहीं है, इस बार तो संकट सृष्टि के अस्तित्व पर है। असुरता अपने व्यूह रच रही है। मायावी एवं पैशाचिक शक्तियाँ नए-नए संहारक-मारक प्रयोग कर रही हैं।

       उन सबको एक साथ निरस्त करना है। इतना ही नहीं, भविष्य की सतयुगी परिस्थितियों के लिए अपरा एवं परा प्रकृति में, जड़ एवं चेतन प्रकृति में एक साथ महापरिवर्तन करने होंगे और यह तभी संभव हो पाएगा, जबकि समूचे विश्व की कुंडलिनी का जागरण हो।

    ‘विश्व कुंडलिनी जागरण’ इस शब्द ने युवा जेत एवं अघमर्षण को ही नहीं, प्रौढ़ हो चुके मधुच्छंदा एवं जाबालि को भी चकित एवं रोमांचित कर दिया। ये दोनों तो अति दीर्घकाल से महर्षि के सभी प्रयोगों में घनिष्ठ सहयोगी थे, परंतु आज इनके चौंकने एवं रोमांचित होने को उन्होंने अनदेखा कर दिया। 

     वे इन्हें समझा रहे थे-“इसके लिए धरती की कुंडलिनी शक्ति, जो उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव के बीच प्रवाहित चुंबकीय प्रवाह के रूप में है, इसे सौर ऊर्जा से आंदोलित, उद्वेलित एवं परिवर्तित करना पड़ेगा। इसके लिए अनिवार्य है सौर ऊर्जा का व्यापक संदोहन एवं आवश्यक संप्रेषण-संयोजन। यह कार्य अति कठिन है, परंतु असंभव नहीं। इसके लिए मैं गायत्री महाविद्या का सावित्री प्रयोग करूँगा।

    “यानी कि विलोम गायत्री के ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मशिरस् एवं पाशुपात का एक साथ समन्वय, बल्कि उससे भी कहीं कुछ अधिक।” महर्षि के कथन के साथ ही ऋषि जाबालि एवं ऋषि मधुच्छंदा के मन में लगभग एक साथ ही यह बात आई।

       उनके इन मानसिक संवेदनों ने महर्षि की भावचेतना को कहीं छुआ। वे बोले-“तुम ठीक सोचते हो, परंतु मैं सृष्टि की रक्षार्थ अध्यात्म विद्या के इस महानतम वैज्ञानिक प्रयोग को अवश्य करूँगा। आत्मिक चेतना एवं सविता चेतना के तारतम्य को बनाने वाले आधार इसी से विनिर्मित होंगे। सावित्री विश्वव्यापी है। इसके प्रभाव से भूमंडल का संपूर्ण क्षेत्र एवं प्राणिसमुदाय का समूचा वर्ग प्रभावित होगा। 

     इस प्रभाव से तमस् क्षीण होगा और सत्त्व की अभिवृद्धि होगी। इससे अंतःकरण एवं पर्यावरण में एक साथ सुखद परिवर्तन होंगे। विनाशक शक्तियाँ विनष्ट होंगी एवं सृजन शक्तियों का नवोत्थान होगा।”

    “हमें क्या करना होगा भगवन्!” महर्षि को सुन रहे सभी जनों ने अपने कर्त्तव्य को निर्धारित करना चाहा। उनके प्रश्न के उत्तर में महर्षि बोले- “इस कठिन घड़ी में तुम सभी को अपने दायित्व दृढ़ता से निभाने चाहिए। वत्स जाबालि इस कठिन कार्य में मेरे निजी सहयोगी की भूमिका निभाएँगे। 

      पुत्र मधुच्छंदा अयोध्या में तप कर रहे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ, चित्रकूट में तपस्यारत ब्रह्मर्षि अत्रि एवं सुदूर दक्षिण में वेदपुरी में कठोर तप में संलग्न महर्षि अगस्त्य से सूक्ष्म संपर्क बनाए रखेंगे और उनके संकेतों से समय-समय पर हमें अवगत कराएँगे। क्योंकि ब्रह्मर्षि वशिष्ट इस कार्य के लिए सौ पुरुषों का ऐसा महान साधक वर्ग तैयार कर रहे हैं. जो लोक में सतयुगी वातावरण, सावित्री शक्ति के अवतरण को सहज बनाएँ। 

      महर्षि अत्रि चित्रकूट में हैं, उनका दायित्व यह है कि वे इस महाप्रयोग की ऊर्जा को धारण करने में वत्स राम, लक्ष्मण एवं पुत्री सीता को समर्थ बनाएँ।

    “इसी क्रम में अगली कडी में महर्षि अगस्त्य हैं। वे इस सावित्री महाप्रयोग से उत्पन्न होने वाली शक्ति महान दिव्यास्त्रों की संरचना करेंगे और समय आने पर श्रीराम को प्रदान करेंगे। ये सभी कार्य एक साथ, एक ही स्तर पर संपन्न होंगे। यद्यपि हम सभी का चेतना स्तर पर जुड़ाव तो होगा ही, परंतु अपनी-अपनी प्रायोगिक निमग्नता के कारण यदा-कदा यह संपर्क-संस्पर्श न्यून पड़ेगा।

      इसलिए पुत्र मधुच्छंदा इस कार्य के लिए तत्पर रहेंगे। वत्स जेत एवं अघमर्षण इस कार्य में अपने पिता का सहयोग करेंगे। हमारी दिव्यदृष्टि कहती है कि यह महान सावित्री- साधना अवश्य सफल होगी और धरती पर सतयुगी परिस्थितियाँ अवश्य विनिर्मित-विस्तारित होंगी।” 

     महर्षि विश्वामित्र के सावित्री महाप्रयोग से धरती पर सतयुगी विधान क्रियान्वित हो सका था। 

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