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कोवीड टीका- विज्ञान एवं राजनीती

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डॉ॰ अभिजित वैद्य

कोरोना संसर्ग की त्सुनामी के कारण पुरा विश्व बिलकुल एक शती के बाद महामारी का फिर से
अनुभव ले रहा है। यह अनुभव कुच्छ विधाओं में ध्वस्त तथा समृद्ध करनेवाला भी साबित
हुआ। इसके पूर्व करीबन १०२ साल पहले पुरा विश्व ‘स्पेनिश फ्लू’ की महामारी की चपेट में आ
गया था । इन दोनों महामारी में अनेक समानताए हैं । दोनों महामारी विषाणूजन्य अर्थात
वायरस के कारण होनेवाली तथा श्वसन संस्था से बाहर पडने वाले द्राव को चीपकने वाले
वायरस के कारण, ड्रॉपलेट ट्रान्समिशन के कारण फैलानेवाली है । पहली महामारी ने पांच
करोड लोगों की जान ली । दो साल बाद, टीका या वैक्सीन उपलब्ध न होके भी नैसर्गिक
तौर पर लुप्त हो गई । उस वक्त विश्व की आबादी थी करीबन १३० करोड और उस विषाणू के
कारण विश्व के ५% लोगों का खात्मा किया । उस वक्त भी विश्व के करोडो लोग मुखपट्टी
(मास्क) पहनते थे, बार-बार हाथ धोते थे, बफारा, कुल्ला आदि भी करते थे । क्यों की उस वक्त
भी यह विषाणू तथा उसके संसर्ग के मार्ग एवं परिणाम से पुरा विश्व परिचित था । उस विषाणू
का भाई यह ‘नया कोरोना विषाणू’ (नॉवेल कोरोना वायरस) थोडा ज्यादा हिंस्त्र है । वह इन्सान
की केवल श्वसन यंत्रणा पर हमला नहीं करता अपितु प्रतिकार पद्धती को उथल पुथल करके
रसायनों का तुफान निर्माण करता है। खून में गुठ्लीयॉ निर्माण करता है और कुछ लोगों में
फेफडो की हमेशा की समस्या निर्माण करता है । लेकिन एक शताब्दी के बाद पुरा विश्व
वैज्ञानिक तौर पर सक्षम बन गया है और इस विषाणू के भयानक रूप को काबू में रखने की
ताकत विश्व के पास है । दुसरी ओर इसके पूर्व जो विश्व या उसके तुलना में आजका विश्व भले
ही आधुनिकता की ओर बढ रहा है अपितु जनसंख्या का विस्फोट, सामाजिक उलझन,
यातायात, गतिमान आदान- प्रदानता, महंगाई, इंटरनेट के माध्यम से उचित ज्ञान साथ-साथ
पलभर में अज्ञान फैलानेवाला और सच की अपेक्षा झूठ का अधिक प्रचार करने की क्षमता
रखनेवाला है । सौ साल पहले सपनों में भी नहीं थी थर्मल गन, प्लस ऑक्सिमीटर, डीजीटल बी

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पी ऑपरेटस्ट तथा ग्लूकोमीटर जैसी अनेक वैद्यकीय उपकरणे अब हर मकान का अविभाज्य
घटक बन चुकी है । हर मकान के सम्मुख प्रवेश द्वार पर थर्मल गन, एवं सॅनिटायझर द्वारपाल के
रूप में खडे है । मुखपट्टी के साथ-साथ, फेस शिल्ड, पी.पी.ई.कीट, ग्लोव्हज, शीसे की तैयारी की
हुई दीवारे, लॉकडाउन, कर्फ्यू, निर्बंध आदि जिंदगी के अविभाज्य घटक बन चुके हैं । झूम
मिटिंग, गुगल मीट, वेबिनार आदि का उपयोग रोजमरी जिंदगी में हो रहा है । सामुहिक
कार्यक्रम, परिषद, व्याख्यान, शिक्षण, वैद्यकीय सलाह आदि ऑनलाईन हो चुके है । कोरोना
विषाणू, इन्सान का जीवन निष्ठुर समता, किसी भी प्रकार का भेदभाव न करके मथना और
उधेड रहा है । फटे हूए आकाश को जोडने का काम जम्बो कोवीड केंद्र, ऑक्सिजन बेड्स,
वेंटीलेटर, रेम्डेस्वीर, स्टीरॉइडस , ऑस्पिरीन आदी उपचार निरंतर कर रहे है । क, ड, जीवन
सत्व तथा झिंक आदि उनकी सहायता कर रहे है । इन आयुधों का इस्तेमाल करके वैद्यकीय क्षेत्र
के बहुत लोग निर्भर योध्दा की तरह अपने प्राणों की परवाह न करते हुए लड रहे है । आजतक
पुरे विश्व के सवा-दो सौ देशों में करीबन ११,७५,०००००/- लोगों को इसका संसर्ग हो गया
लेकिन मृत्यू का प्रमाण केवल ढाई करोड इतना ही है । अर्थात पुरे विश्व की आबादी के आधे
प्रतिशत से भी कम । हमारा देश सवा करोड बाधित तथा देढ लाख लोगों की मृत्यू के साथ
अमेरिका के बाद दुसरे स्थान पर खडा है । अर्थात हमारे देश के यह गिनती फरेबी है । क्योंकी
भारत में एक हजार जनसंख्या की तुलना में एक से भी कम टेस्ट की जाती है । तो अमेरिका में
पाँच गुना की जाती है । भारत की आबादी अमेरिका से पाँच गुना ज्यादा है और अमेरिका का
क्षेत्रफळ भारत से तीन गुना ज्यादा है । इसका साफ-साफ अर्थ यह है कि हमारे देश के
बाधितोंकी एवं मृत्यू की संख्या वास्तव में की कई गूनां ज्यादा है । एक बात माननी पडेगी कि
अतिसुक्ष्म इस विषाणू ने पुरे विश्व के नाक में दम कर दिया । यह विषाणू नैसर्गिक रूप में नष्ट
होता ही जा रहा था , जनजीवन थोडा सुधर रहा था लेकीन इसने फिरसे अपना माथा उँपर
निकाल दिया । सभी विषाणूओं में अपनी जनुकीय रचना बदलने की (जेनेटिक म्युटेशन)
अभूतपूर्व क्षमता होती है । वह इस विषाणू में भी है । विश्वको अब केवल दो चीजें ही बचा
सकती है, एक-संसर्ग का प्रवाह पुरे विश्व में फैलकर निर्माण हुई ‘सामुहिक प्रतिकार शक्ती’ (हर्ड
इम्युनिटी) तथा दुसरी- टीका (वैक्सीन)। पहली संभावना में संसर्गो के प्रवाह के साथ-साथ उसी
मात्रा में मृत्यू होंगे इसे स्वीकृत करना पडता है । और दुसरी संभावना में विश्व का
परिणामकारक तथा अति शीघ्रता से किया हुआ ‘टीकाकारण’ (मास वॅक्सीनेशन) पुरे विश्व को
सही अर्थ में बचा सकता है । पुरा विश्व चातक पक्षी की तरह टिके का इंतजार कर रहा है,

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संशोधकों द्वारा अथक परिश्रम लेने से ऐतिहासिक गति से अनेक टिके का विश्व में निर्माण होना
और टीकाकरण शीघ्रता से शुरू हुआ । लेकिन अभी भी विश्व के १३० देशों में टीका पहुंचा ही
नहीं । अपने देश में ही टीका तैयार किया गया लेकिन अपने ही देश के १८ उम्र के ७८ करोड
लोगों को इस गती से टीकाकरण करने में दो साल लंगेगे । इसमें गर्भवती महिलाएँ तथा अन्य
वैद्यकीय कारणों से जिन्हे यह टीका लेने की अनुमति नहीं है ऐसे लोगों को छोडकर भी वास्तव
बदलने वाला नहीं है । सोचो, साठ साल पुरे किए हुए लोगों को यह टीका देना तय किया तो
फिर भी इस गति से २७ करोड लोगों के लीए छह महिने लगेंगे । ४० से ६० उम्र के लोगों को
इस छत्र के अंतर्गत टीका लगाना तय किया तो इसमें २५ करोड लोगों की वृद्धी होगी । वयस्कों
को सबसे पहले टीका लगाना चाहिए यह उचित है लेकिन ४० से ६० उम्र के लोगों को संसर्ग
होकर उसमें से होने वाले मृत्यू किसी भी देश के लिए महॅंगे साबित होते है । देश के करीबन
५० करोड जनता का टीकाकरण अगर शीघ्रता से तीन से चार महिनों में पुरा किया गया तो इस
कोरोना महामारी को रोकने में यश मिलेगा । एक बार टीका लगाने से उपयोग नहीं होगा
अपितु दुसरा टीका भी चार हप्तों या छह हफ्तों बाद लेना अति आवश्यक है । यह तालिका
बरकरार रखना दुसरी बडी चुनौती है । इसलिए प्रतीदिन १५ लाख लोगों को टीका लगाने का
जो नियोजन है उसे छह गुना बढ़ाना होगा । हाल ही में उपलब्ध दो टिके, कोविशिल्ड तैयार
करनेवाली सिरम इंडिया और कोवक्सीन निर्माण करनेवाली भारत बायोटेक की हर दिन टीका
उपलब्ध कराने की क्षमता पर सोचना होगा । अन्यथा विश्व की अन्यान्य कंपनीयों के दरवाजों
पर दस्तक देनी पडेगी । ये चुनौतीयाँ सम्मुख होते हुए भी केवल शाबासकी प्राप्त करने के लिए
लाखों टिके ब्राझील को भेज देना उचित नही है । देश में तैयार होने वाला टिके की हर मात्रा
देशवासियो के लिए उपयोग में न लाना और इसे बाहर जे देशों में भेजना राष्ट्रद्रोह है । केवल
टिके की मात्रा बढाकर यह काम नही चलेगा अपितु टीका लगाने की सक्षम कार्यवाही करना
सबसे बडी चुनौती है । इसका तापमान संचय करते समय तथा सफर में भी उचित रखना
आवश्यक है । हमारे देश में दोनों प्रकार के टिके को तापमान २ से ८ डिग्री सेंटी ग्रेड आवश्यक
होता है । जो रखना सहज संभव है । यह टीका साधारण इंट्रमस्कुलर इंजेक्शन की तरह बाहू
पर दिया जाता है । अतः कोई भी आम डॉक्टर, नर्स दे सकती है । ये सब युद्धस्तर पर करते
समय केंद्र की ओर से अन्यान्य राज्यों को इसकी स्वतंत्रता देनी होगी । अपनी ७०% जनता
खासगी वैद्यकीय यंत्रणा का आधार लेती है क्योंकी हमारी सार्वजनिक आरोग्य व्यवस्था पर्याप्त
नहीं है । ऐसी यंत्रणा, भारत जैसे खंड प्राय देश की टीकाकरण सक्षमता से कर सके यह संभव

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नहीं है । इसलिए खासगी आरोग्य यंत्रणा को सहभागी कर लेना आवश्यक है । छीछला ‘एअर
स्ट्राईक’ की अपेक्षा ‘कोरोना स्ट्राईक’ अधिक महत्त्व पूर्ण है । कोरोना ने गत देढ साल में देढ लाख
से भी अधिक लोगों की जान ली है और अभी भी उसकी भूख पुरी नहीं हुई । स्वतंत्र भारत के
सभी युद्ध तथा आतंकी हमलो में जितनी कुर्बानी गई उससे कई अधिक कोरोना में गई । इसके
लीए शासन, ‘मिशन कोरोना-वैक्सीन स्ट्राईक’ इस नामसे एक मुहीम शुरू करनी पडेगी । मोदी
जी और एक घोषणा के मालिक होंगे । लेकिन यह हमला ‘मोदी माध्यम’ के लिए सनसनी खोज
घटनाओं तथा टी.आर.पी. का समाचार नहीं हो सकता अर्णव गोस्वामी को भोंकाने का अवसर
नहीं मिलेगा । चुनाव जितने के लिए इसका उपयोग नही होगा । देश की जनता को बचाने
वाला प्रामाणिक भावना प्रधान नेता न्यूज वैल्यू जैसी बात की परवाह न करते हुए चूनौतीयों
का सामना करता है । भावनिक एवं झुटी जैसी सनसनी खेज घटनाओं का उपयोग अपना
स्थान मजबूत करने की अपेक्षा चुनौतीयों का भिडना ही आवश्यकता है । अगर यह ताकत
है तो अदानी एवं अंबानी पर जनता का मुफ्त में टीकाकरण करने की जिम्मेदारी सौपानी
चाहीए । इस टिके के बारे में जनता के मन में बहुत गलत फहमियाँ हैं । गर्भवती तथा
स्तनपान करनेवाली महिलाएँ, प्रतिकार शक्ती कम करनेवाली बिमारीवाले लोग या दवाइयाँ
लेनेवाले, गंभीर स्थिती पानेवाले या हाल ही में देढ महिने में कोरोना संसर्गवाले लोग आदि
को छोडकर अठारह की उम्र के ऊपर सभी लोगों ने टीका लेना आवश्यक है । किसी दवा
की अॅलर्जी है इसका मतलब यह नहीं है कि टीकाकारण से अॅलर्जी होगी ।
मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, अस्थमा आदि बिमारीयाँ और स्थूलता कोरोना
के संसर्ग को ‘को मोर्बिडीटीज’ के रूप में पहचाने जाते है इसलिए उन्हें जल्द ही
टीकाकारण करना आवश्यक है । जो लोग खून पतला होने की गोलियाँ जैसी –
अॅस्पिरीन, क्लोपिडोग्रेल, टिकॅग्रेलाँल, प्रासुग्रेल या खून जम जाने की प्रक्रिया
रोकने वाली गोलियाँ या इंजेक्शन, जिने अँटीकोयॅग्युलंट कहा जाता है उदा.
वारफेरीन, अॅसिक्यूमॅरॉंल, रिव्हारॉक्सबॅन, हेपारीन आदि दवाईयाँ टिका लेने से पूर्व
दो दिन पुरी तरह से बंद करनी चाहीए और टीकाकरण के दुसरे दिन शुरू कर देनी
चाहिए । टिका लगाने से पहले अपने खून में शक्कर की मात्रा, रक्तचाप एवं

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अॅटीकोयॅगुलंट लेनेवाले लोगों ने खून की – पी.टी.-आय.एन.आर. टेस्ट करके
उचित होने की जाँच करनी चाहिए । टीका लेते समय खाना खाकर जाईए ।
केवल २ से ३% लोगों को टिका लेने के बाद अंग टूटना, कमजोरी, बुखार, बदन
दर्द आदि लक्षण दिखाई देते है । इसके लिए पॅरासीटमॉल जैसी गोली डॉक्टर की
सलाह के अनुसार लेनी चाहिए । बहुत थोडे लोगों को मतली का एहसास होने
लगता है और उलटी होती है । अन्य लोगों में इस तरह के कोई भी चिन्ह दिखाई
नहीं देते । टीका लेने के बाद व्यक्ती की तबियत गंभीर होना यह बात बहुत ही
दुर्मिल है । लाखों में एक को ऐसा होता है । बहुत बार टिका इसका कारण बन
जाता है । वास्तव में टिका अमरत्व नहीं है या कोई परवाह किए बिना घुमने का
अधिकार है, अनुमती है । भारतीय टीकाकरण के परिणाम का दावा केवल ७०%
है । इसका अर्थ है कि टीकाकरण करने के बाद भी ३०% लोगों को संसर्ग हो
सकता है । कोरोना ने अपना रूप बदल लिया तो क्या इस टिके का असर उतना
ही रहेगा ? इसका जवाब पुरे विश्व के पास नहीं है । लेकिन अंदाजा है कि असर
रहेगा । टीका लेने के बाद ‘प्रतीपिंड’ तैयार होने के लिए १५ दिनों का कालावधी
लग सकता है । अर्थात इस कालावधी में संसर्ग हो सकता है । संक्षिप्त में अगर
कहा जाए तो कोरोना अपनी लीलाएँ जबतक खत्म नहीं करता तबतक हमें
सावधानी एवं प्रतिबंधक उपचार जारी रखने चाहिए । कोरोना का टिका नए सिरे से
दुनिया में प्रविष्ट हो रहा है फिर भी टिका यह बात विश्व को नई नहीं है । भारत
के बुद्ध भिख्खू लोग साँपका जहर पिकर सर्पदंश पर प्रतिकार प्राप्त करते थे ।
चीन में इ.स.१००० में अत्यंत प्राथमिक अवस्था की देवी का टिका लगाने का
प्रयोग किया जा रहा था । गोमाता के अंचल को देवी सदृश बिमारी (काऊपॉक्स)
होने पर उसका द्राव निरोगी व्यक्ति के शरीर के छेदो में लगाया जाता था ।
लेकिन एडवर्ड जेन्नर ने १७९४ में काऊपॉक्स के द्राव्य का देवी का टिका के रूप
में पहला प्रयोग किया । अगली दो शती में इसमें और सुधार करके वैद्यकीय

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शास्त्र ने उसी मार्ग पर चलना जारी रखकर पुरी दुनिया से देवी की बिमारी का
उच्चाटन किया । लुई पाश्चर ने १८८५ में श्वानदंश पर टिके की खोज की ।
अलेक्झांडर ग्लेनी ने १९२३ में धनुर्वात पर टिके की खोज की । उसी का उपयोग
करके १९२६ में कंठ रोहिणी और १९४५ में कुकुरखाँसी पर टीका निर्माण किया ।
आगे चलकर वैद्यकीय क्षेत्र में प्रगति होने कुछ् दशकों में पोलिओ की बिमारी पर
मुख से टीका देने खोज की गई और दुसरी क्रांती हो गई । क्षयरोग, कॉलरा, हंजा,
गोवर, मोती झिरा, पित्तज्वर, मस्तिष्क ज्वर, फ्लू, न्यूमोनिया, हेपॅटायटीस आदि
अनेक टिके खोज होती गई की और मानवी जीवन अनेक बिमारियो से मुक्त होता
गया ।
किसी भी प्रकार का सुक्ष्म जंतू इन्सान के शरीर में घुसकर हमला करने लगता है
तो शरीर की प्रतिकार यंत्रणा उसके खिलाफ युद्ध शुरू कर देती है । इस युद्ध में
अनेक बार इन्सान की जीत होती है लेकिन कुछ बार इन्सान की हार होती है ।
इन्सान यह युध्द अपने प्रतिकार यंत्रणा द्वारा शरीर में निर्माण की हुई प्रतीपिंड
(अँटीबाँडीज) की मदद से जित जाता है । आधुनिक वैद्यकिय शास्त्रद्वारा सुक्ष्म
जंतूओं की रचना का गहराई से अभ्यास करके ऐसी खोज की है कि अपने शरीर के
सुक्ष्म जंतूओं की रचना के कुछ घटक (जंतूओं का प्रथिनयुक्त आच्छादन, जनुकीय
घटक आर.एन.ए.या डी.एन.ए.) जो स्वतंत्र रूप से इन्सान को बिमार नहीं बनाते या
विशिष्ट प्रक्रिया से निष्क्रिय किए हुए जंतूओं का उपयोग करके प्रतिपिंड
(अँटीबाँडीज) निर्माण कर सकते हैं इस ज्ञान से लस तैयार होने लगी । लेकीन यह
लस इन्सान के लिए उपयोगी और असरदार है या नही यह कैसे ज्ञात होगा?
इसलीए इसका प्रयोगशाला में पशुओं पर प्रयोग किया जाता है । इसके परिणामों
का अभ्यास किया जाता है । इसे ‘प्री क्लिनिकल’ या ‘अॅनिमल ट्रायल्स’ कहा
जाता है । इन प्रयोगो में सुरक्षितता की हमी होने पर मानवी टेस्ट, ‘ह्युमन

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क्लिनिकल ट्रायल्स’ शुरू की जाती है । ‘फेज वन’ में पुरी तरह से स्वस्थ जैसे १००
से कम स्वयंसेवक, ‘फेज टू’ में विविध उम्र के विविध बिमारी वाले १०० से अधिक
स्वयंसेवक, ‘फेज थ्री’ में हर स्थान के हजारों स्वयंसेवक, ऐसी हर प्रक्रिया
यशस्विता से पुरी करने पर टिके को उपयोग में लाने की वैद्यकीय अनुमती
मिलती है । सिरम इंडिया ने ये प्रक्रियाँ पुरी की है लेकिन भारत बायोटेक ने ‘फेज थ्री’
की प्रक्रिया पुरी नहीं की । टीका जनता के लिए टीका उपलब्ध किया गया गई और
‘फेज फोर’ में टीका दिए हुई लोगों में कुछ बुरे परिणाम दिखाई दिए तो इसपर
अभ्यास किया जाता है । सर्वसाधारणतः टीका तैयार किया जानेवाला कालावधी
दस वर्षो के होता । कोविड का टीका सभी कंपनीयों द्वारा सालभर में पुरी कीई ।
टीका संशोधन प्रक्रिया का खर्च १ से ३ हजार करोड रुपयों तक होता है । इतना
होते हुए भी भारत की कंपनियो द्वारा यह टीका बहुत ही कम दाम में उपलब्ध
करवा दी है । लेकिन हमारी आवश्यकता को ध्यान में में लेकर शायद बाहर के
राष्ट्रों से यह टिका लेनी पडेगा । खुद की बनाई हुई टिका का भारत एकमेव
विकसनशील देश है । अन्य अविकसनशील एवं अविकसित देशों में यह वैक्सीन
कैसे उपलब्ध होगी यह अहम सवाल है । इस महामारी पर नियंत्रण पाने के लिए
चंद देशों का टीकाकरण होना पर्याप्त नही है । विश्व को वैस्कीन उपलब्ध कराने
के लिए वैस्कीन का तापमान आदि तांत्रिक चुनौतीयाँ भी है । लेकिन इसकी मुख्य
मुसीबत यह रहेगी कि डब्लू.टी.ओ. वर्ल्ड ऑर्गनायझेशन (वैश्विक व्यापार संघटना)
के अंतर्गत अनेक राष्ट्रों द्वारा १९९५ में ट्रीप्स (ट्रेड रिलेटेड इनटेलेक्च्युअल प्राँपर्टी
राईटस) के तहत बौद्धिक संपदा के बारे में किए हुए अनुबंध । इस अनुबंध के
कारण विकसित देश इस अनुबंध के नाम से अन्य देशों की ओर से इस टिके के
लिए ज्यादा से ज्यादा रकम की मांग कर सकते है । कोरोना के वैक्सीन को
वैश्विक स्तर पर मानव के हित में इस अनुबंध से मुक्त करना चाहिए । पुरे विश्व
ने सामुहिक तौर पर यह मांग करनी चाहीए । पुरा विश्व संकट में होने पर भी

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पुंजीवाद अपना स्वार्थ अपनाना नहीं छोडता । लेकिन पैसे कमाने का सबसे बडा
असवर संकट होता है । लेकीन कोरोना के कारण विश्व की अर्थ व्यवस्था
मरनासन्न अवस्था में है । यह स्थिती कोरोना का संसर्ग जब रुकेगा और विश्व के
व्यवहार पूर्ववत जारी रहेंगे तब तक बदल नहीं सकती । विकसनशील राष्ट्रों द्वारा
अल्पकालीन मुनाफे का मोह त्यागकर कोरोना के संकट से बाहर पडने के लिए
सहायता करनी होगी । अगर ऐसा हुआ तो अनेकों अर्थव्यवस्था फिरसे कार्यान्वित
हो सकेगी । दीर्घकालीन फायदा पूँजीवादियों का ही होगा । विज्ञान को समझकर
मानवता हेतू राजनीति एवं अर्थकारण दूर रखने की आवश्यकता है ।

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