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क्रांति (?) : विश्वगुरू भारत में अब विदेशी विश्वविद्यालय

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 पुष्पा गुप्ता

     भारत सरकार ने आखिरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति की शुरुआत कर दी है। अब इस देश के छात्र यहीं बैठे ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज और येल जैसे विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर सकेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में अपने परिसर शुरू करने की इजाज़त देने जा रहा है।

      अगले कुछ वर्षों में विश्वगुरु भारत की धरती पर आकर कई विदेशी विश्वविद्यालय ज्ञान बांटेंगे। वे अपनी फीस, अपना पाठ्यक्रम, अपने यहां दाख़िले की कसौटियां- सबकुछ खुद तय कर सकेंगे। इनकी फीस चाहे जो भी हो, विदेश जाकर पढ़ने के मुक़ाबले फिर भी सस्ती पड़ेगी, क्योंकि यहां दाखिला लेने वालों के लिए बाहर आने-जाने और चार साल रहने का ख़र्च बच जाएगा।

     हालांकि कहना मुश्किल है कि बहुत सारे महत्वाकांक्षी छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों की यह स्थानिकता रास आएगी या नहीं, क्योंकि बाहर जाकर पढ़ने का जो सुख है, उसमें वहां नौकरी खोजने और फिर बस जाने की संभावना भी शामिल है।

 भारत में बैठे-बैठे छात्रों को जो डिग्री मिलेगी, हो सकता है, उसका फायदा उन्हें बहुत न लगे, क्योंकि इसके बाद भी बाहर जाने, रहने और नौकरी खोजने की चुनौती बनी रहेगी। फिर भी बहुत सारे छात्रों के लिए यह एक बड़ा अवसर होगा। 

    इत्तिफ़ाक़ से यह फ़ैसला ऐसे समय में लिया जा रहा है जब दिल्ली विश्वविद्यालय में बरसों से तदर्थ पर या अतिथि के रूप में पढ़ा रहे शिक्षक वहां चल रही नियुक्तियों की मौजूदा राजनीति में अपने-आप को असुरक्षित पा रहे हैं, जब जेएनयू जैसे शानदार विश्वविद्यालय पर उसके कुछ अतिरेकी छात्रों द्वारा लगाए गए अतिवादी पोस्टरों की वजह से कीचड़ उछाली जा रही है, जब जामिया, अलीगढ़, इलाहाबाद और जाधवपुर जैसे देश के नायाब माने जाने वाले सरकारी विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी और सरकारी दख़ल की अराजकता की अधिकता की वजह से हांफ रहे हैं, जब कई विश्वविद्यालयों में कुलपति या तो नहीं हैं या फिर कुलपतियों के नाम पर अयोग्य लोगों की नियुक्तियों का सिलसिला जारी है और जब देश में उच्च शिक्षा की हालत दयनीय हो चुकी है।

       खुद को विश्वगुरु बताने वाले भारत का एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के 200 विश्वविद्यालयों में शामिल नहीं है। दो आइआइटी और एक आइआइएससी इस सूची में आते हैं लेकिन 175वें नंबर के बाद।  

वैसे यही वह समय है जब देश में बहुत चमचमाते विश्वविद्यालय परिसरों की बाढ़ आ गई है। ये निजी विश्वविद्यालयों के परिसर हैं जिनकी इमारतें शानो-शौकत का नमूना लगती हैं। लेकिन ज़्यादातर विश्वविद्यालय छात्रों से भारी फीस लेने के लिए जाने जाते हैं, शिक्षकों को कम पैसे देने के लिए जाने जाते हैं और पढ़ाई से ज़्यादा दिखावे पर ज़ोर देने के लिए जाने जाते है।  

      उच्च शिक्षा के निजीकरण के बाद उसके भूमंडलीकरण की इस कोशिश के कुछ निहितार्थ तो स्पष्ट हैं। उच्च शिक्षा अब ग़रीबों की हैसियत से बाहर होने जा रही है। क्योंकि वे जिन सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करते हैं, वे धीरे-धीरे आर्थिक और बौद्धिक रूप से विपन्न बनाए जा रहे हैं।

यह सच है कि भारत के विश्वविद्यालय कभी भी बहुत साधन-संपन्न नहीं रहे। बिहार और कई राज्यों में एक समय ऐसी स्थिति थी कि शिक्षकों को महीनों वेतन नहीं मिलता था। प्राइवेट कॉलेजों और तदर्थ नियुक्तियों का ऐसा जाल था जिसने उच्च शिक्षा का मज़ाक बनाया। इसके बावजूद तमाम कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ऐसे कुछ शिक्षक होते थे जिनको अपने विषय की समझ भी होती थी और जिनके भीतर अपने छात्रों को पढ़ाने का उत्साह भी होता था।

       छात्र भी अपने इन गुरुओं से काफ़ी कुछ सीखते रहे। कभी इन विश्वविद्यालयों के लिए कहते थे कि वहां संभावित अपराधी दाख़िल होते हैं और आम नागरिक बन कर निकलते हैं। ग़रीबी और अराजकता के मारे भारतीय मध्यवर्ग के बहुत सारे बच्चों को इन विश्वविद्यालयों ने बेरोज़गार ही सही, लेकिन नागरिक बना दिया। इन विश्वविद्यालयों से हमारे लेखक निकले, हमारे नेता निकले, यहीं हमारा लोकतंत्र सींचा गया।

       1974 की संपूर्ण क्रांति विश्वविद्यालयों के परिसरों से निकली थी। आज का भारत उन्हीं विश्वविद्यालयों की कोख से निकला है। 

    लेकिन आज उन विश्वविद्यालयों की हालत कहीं ज़्यादा बुरी है। वे अराजकता और दादागीरी के हताशा भरे अड्डों में बदलते जा रहे हैं। उनकी जगह जो नए निजी विश्वविद्यालय ले रहे हैं, उनकी फ़ीस कम से कम मध्यवर्गीय भारत नहीं उठा सकता।

 मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई अब लाखों की नहीं रही, करोड़ों तक पहुंचती नज़र आ रही है। जिन्हें आम विषय कहते हैं, उनकी पढ़ाई भी खासी महंगी है। इस पढ़ाई के लिए छात्र या तो बैंकों से लोन लें और फिर आने वाले दिनों में भारी कमाई के अवसर खोजते हुए इसे चुकाएं या फिर वे ऐसे बड़े घरों से आएं जहां लाख-करोड़ का खर्च आम बात हो। विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन इस प्रक्रिया को कुछ और बढ़ाएगा।  

      लेकिन उच्च शिक्षा की हम इतनी चिंता क्यों करें? भारतीय समाज ने धीरे-धीरे पढ़ाई का मतलब बदल दिया है। वह अच्छा नागरिक या बेहतर मनुष्य बनने का उपक्रम नहीं है वह अच्छी नौकरी पाने का ज़रिया है। और अच्छी नौकरी का मतलब अच्छा काम नहीं, अच्छे पैसे देने वाला काम है। आज के बच्चे स्कूल से बारहवीं करके किसी तकनीकी संस्थान में दाखिल हो जाते हैं।

      वहां से चार साल की पढाई के बाद किसी कैंपस इंटरव्यू में चुने जाकर फिर किसी कंपनी का पुर्जा बन जाते हैं। इतिहास, साहित्य, संस्कृति, समाज, मनुष्य सबकी समझ उनकी कमज़ोर पड़ती जाती है। वे धीरे-धीरे एकाकी होते जाते हैं क्योंकि जिस जीवन शैली के लिए वे प्रशिक्षित किए जाते हैं, उसमें कंपनी की नौकरी, पैसा और शाम की सैर इकलौता मूल्य है।

 परिवार छूटते जाते हैं, एक अपराध-बोध में दबे बच्चे धीरे-धीरे हताश युवाओं और फिर अधेड़ों में बदलते जाते हैं।  

    लेकिन ऐसे लोग उस राजनीति के बहुत काम आते हैं जिसको जुनून फैलाना है, जिसे झूठी ख़बरें देनी हैं, और नक़ली महानता के मिथक गढ़ने हैं। भारत में इन दिनों अगर सबसे कामयाब कोई यूनिवर्सिटी है तो वह वाट्सऐप यूनिवर्सिटी है। वहां से इतिहास-भूगोल को लेकर चला ज्ञान हाथों-हाथ नहीं, अंगूठों-अंगूठा बांटा और अंगीकार किया जाता है। उसके आधार पर देवता भी बनते हैं और भक्त भी।

     फिर यही लोग फ़र्जी तथ्यों के आधार पर शिकायत करते हैं कि इस देश का इतिहास ठीक से नहीं लिखा गया।  

      एक बात यह भी है कि जब ये विदेशी विश्वविद्यालय बनेंगे तो वे निजी विश्वविद्यालयों की तरह ही अपने छात्रों को राजनीति से दूर रखेंगे। तब सरकार को किसी आंदोलन का, छात्रों की ओर से किसी प्रतिरोध का डर नहीं होगा। इसका लोकतंत्र पर जो भी असर पड़े, सरकार की सेहत पर नहीं पड़ेगा।  

      अब भी बहुत सारे लोग होंगे जो विदेशी विश्वविद्यालयों का दरवाज़ा खोलने के सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ लिखी जा रही इस टिप्पणी को लेखक की हताशा का परिणाम बता देंगे। आख़िर वे नए भारत के बाशिंदे हैं जिनके पास साधन भी हैं और भविष्य में बाहर पढ़ने-बसने का सपना भी।

 वैसे भी भूमंडलीकरण के इस दौर में जब सबकुछ सारी दुनिया में आ-जा रहा है तो ज्ञान की परंपरा अपने-अपने परिसरों तक सीमित क्यों रहे। निस्संदेह विकास का यह स्वाभाविक तर्क है जिसे स्वीकार किया जा सकता था, अगर शिक्षा को लेकर वास्तविक तौर पर यह सरकार गंभीर होती।   

       लेकिन आप अपने देश के संसाधनों से बनी मूल्यवान संस्थाओं को बरबाद करते चले जाएं, विश्वविद्यालय परिसरों को अपनी संकीर्ण राजनीति का अड्डा बनाते जाएं, इतिहास की किताबों को बदलने की तजबीज पेश करते रहें और फिर विदेशी विश्वविद्यालयों को न्योता दें तो इसकी नीयत पर भी शक होता है और नियति पर भी।

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