डॉ. विकास मानव
1000 फीमेल्स को महज़ जूना अखाड़े द्वारा नागा-दीक्षा देकर ले जाने का उपक्रम. बाकी बाबाओं के कौसलों का एवरेज पता नहीं. अंदाजा लगा सकते हैं आप. ये गर्ल्स- फीमेल्स किस क्रांति के लिए सन्यास ले रही हैं? आपके पास मस्तिष्क है. मैं क्या बताऊंगा.
प्रयाग के संगम स्थल पर दो ही नदियां आदि काल से बहती आ रही है। इस बात का जिक्र व्हेनसांग के अलावा वाल्मीकि और कालीदास ने भी किया है।
कुम्भ के वर्णन में अखाड़ों के स्नान की महानता भी शामिल होता है। ये अखाड़े शंकराचार्य के समय के बनाए हुए हैं जो आठवीं शताब्दी में हुआ था। उन्होंने ही चार पीठ और भिन्न अखाड़े बनवाए थे।
भारतीय इतिहास में किसी ने कुम्भ मेले के विषय में कुछ भी कहीं भी नहीं लिखा है। घूम फिर के उसी पुराणों की और लौट के आ जाते हैं जहां बातें समुद्र मंथन से जुड़ जाती हैं।
सातवीं शताब्दी में व्हेनसांग ने जब कुम्भ मेले के विषय में लिखा तो प्रयाग की बात लिखी। अन्य स्थानों में कुम्भ मेला का कोई जिक्र नहीं किया। साफ है कि ये चार स्थान बाद में शंकराचार्य सब ने चुना था। व्हेनसांग ने साधुओं के शाही स्नान के विषय में भी कुछ नहीं लिखा है।
इतिहास में कुम्भ का जिक्र सबसे पहले व्हेनसांग के यात्रा वृत्तांत में मिलता है। उस समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन का राज्य था। व्हेनसांग ने बहुत विस्तार से हर्षवर्धन और प्रयाग में उसके दान कार्य के विषय में लिखा है।
व्हेनसांग ने इसको प्रयाग या कुम्भ मेला नहीं बल्कि महादान भूमि लिखा है। इसका प्रारम्भ गौतम बुद्ध की प्रतिमा के पूजन अर्चन से होता था। उसने यह भी लिखा है यह आयोजन स्थान दो नदियों के किनारे था। तीसरी किसी नदी का जिक्र नहीं है।
भाषा वैज्ञानिक किशोरी दास वाजपेई लिखते हैं कि सरस्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र में उत्तर प्रदेश पड़ता ही नहीं था। प्रयाग में सरस्वती की बात केवल कपोल कल्पित है। त्रिवेणी का अर्थ उन्होंने तीन धारा के रूप में किया है – गंगा की धारा, यमुना की धारा और गंगा एवम् यमुना के जल की सम्मिलित धारा।
यह कुम्भ मेला नहीं महादान पर्व कहलाता था जो हर छठे वर्ष में लगता था। राष्ट्रवादी इतिहासकार व्हेनसांग के विवरण पर मुंह में दही जमा के बैठे हैं क्योंकि उस मेला का आयोजन बौद्ध परम्परा के अनुसार होता था। बौद्ध परम्परा का मतलब सनातन परम्परा होता था।
आधुनिक धर्माचार्यों के पाखण्ड और षडयंत्र को समझने के लिए व्हेनसांग की पुस्तक सब को पढ़नी चाहिए। उससे साफ हो जाता है कि बौद्ध धर्म सनातन धर्म ही था। विवेकानंद ने भी अपने लेखों में बुद्ध को सनातन मार्ग का सन्यासी ही बताया है। यह बात आधुनिक धर्माचार्यों को बहुत चुभती है, लेकिन यही सच है।
व्हेनसांग ने जो कुछ भी लिखा है वैसा कुछ भी आज तथाकथित कुम्भ के मेले और स्नान में नहीं मिलता है और न होता है। इन पीठाधीशों को व्हेनसांग को पढ़ के कुम्भ अर्थात् महादान पर्व के विषय में जानकारी हासिल करनी चाहिए।
व्हेनसांग लिखता है कि वैश्य हर्षवर्धन बनिया (वैश्य) समाज से नहीं बल्कि वैसवार क्षत्रि कुल से था। प्रयाग में उस समय वहां विद्वानों का सम्मान किया जाता था, ब्राह्मण (बमन) और शमन लोगों को दान दिया जाता था, भिक्षुओं और निर्धनों को दान दिया जाता था, राज्य में सबों के चिकित्सा प्रबंध की जानकारी जुटाई जाती थी; धर्म के नाम पर अधर्म अर्थात् पाखण्ड फैलाने वालों को चिन्हित करके न्याय सम्मत कारवाई की जाती थी।
मतलब कि उस महादान पर्व में भी राजधर्म का पूरी तरह से निर्वहन किया जाता था। हर्षवर्धन को आदित्यादित्य भी बोला गया है इतिहास में।
आज का कुंभ मेला सिवाय साधुओं के शक्ति प्रदर्शन के और कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार छब्बीस जनवरी का समारोह एक तरह से राष्ट्र के सैन्य शक्ति का प्रदर्शन से जुड़ा है उसी प्रकार कुम्भ मेले का शाही स्नान साधू समाज के शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक है। यह धर्म के नाम पर इस समाज के उच्छृंखिलता को भी प्रदर्शित करता है। अब वहां कुछ भी ऐसा नहीं है जिसको धर्म और अध्यात्म की झलक मिले। केवल अखाड़ों को महत्व दिया जाता है।
*बिना काम सिद्धि के मोक्ष नहीं :*
ध्यानतंत्र शास्त्र कामशास्त्र पर आधारित है, इसलिए कि तीनों पुरुषार्थो में तीसरा पुरुषार्थ ‘काम’ है। ‘काम’ सिद्ध होने पर चौथा पुरषार्थ ‘मोक्ष’ उपलब्ध हो सकता है।
काम की मूलशक्ति स्त्री है और वह स्त्री-पुरुष में (स्त्री=कुण्डलिनी) शक्ति के रूप में विद्यमान है। वह प्राकृतिक है, स्वयंभू है इसीलिए तांत्रिक साधना में स्त्री का महत्व है। स्त्री के दो रूप हैं- भोग्यारूप और पूज्यारूप।
भोग्या रूप इस अर्थ में है कि स्त्री में जो नैसर्गिक शक्ति है जिसे हम ‘काम की मूल शक्ति’ भी कह सकते हैं, वह साधना भूमि में साधक के लिए आन्तरिक रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। उसी के आश्रय से साधना में सफलता प्राप्त करता है और अन्त में उच्च अवस्था को साधक प्राप्त करता है।
स्त्री में उसकी नैसर्गिक शक्ति को जागृत करना और उसे ‘नियोजित’ करना अत्यन्त कठिन कार्य है। यह गुह्य कार्य है और इसके सम्पन्न होने पर विशेष तांत्रिक क्रियाओं का आश्रय लेकर स्त्री को भैरवी दीक्षा प्रदान की जाती है जिसके फलस्वरूप भैरवी में मातृत्व का भाव उदय होता है।
तंत्रधारा में मातृत्व भाव बहुत ही महत्वपूर्ण है। तंत्र-साधना के जितने गुह्य और गंभीर अनुभव हैं, उनमें एक यह भी अनुभव है कि विशेष तांत्रिक प्रक्रियाओं द्वारा पूज्यभाव से साधक अपने सामने पूर्ण नग्न स्त्री को यदि देख लेता है तो वह सदैव- सदैव के लिए स्त्री और स्त्री के आकर्षण से मुक्त हो जाता है। क्योंकि उसके मूल में कामवासना होती है जिसके संस्कार बीज जन्म-जन्मान्तर से आत्मा के साथ जुड़े हुए हैं।
स्त्री के आकर्षण से मुक्त होने के बाद स्त्री, साधक के लिए माँ के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहती। इसी तांत्रिक प्रक्रिया द्वारा यदि स्त्री पुरुष को पूर्ण नग्न देख ले तो वह भी सदैव के लिए पुरुष और उसके आकर्षण से मुक्त हो जाती है। यह कार्य तभी संभव है जब स्त्री-पुरुष एक दूसरे को सम्पूर्ण रूप से नग्न देखते समय एक विशेष तांत्रिक प्रक्रिया के अनुष्ठान से गुजरते हैं, साधारण रूप से नग्न देखते समय नहीं, क्योंकि उस समय तो कामवासना और भी ज्यादा बढ़ जाती है।
यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है। जैसे तंत्र-शास्त्र काम-शास्त्र पर आधारित है उसी प्रकार काम-शास्त्र भी मनोविज्ञान के आश्रित है।
इस सूत्र के आधार पर अनेक तंत्र शास्त्रों की रचना हुई है जहाँ अनेक सिद्धियों आदि की प्रक्रियाएं, तरीके आदि बताये गए हैं। यही सूत्र योनी पूजा और यौन पूजा का भी आधार है। सम्भोग से पूर्व ही साधक की उत्तेजना पर उसका मूलाधार तीव्र तरंगें उत्पादित करने लगता है और सम्भोग की अवस्था में आने पर भैरवी की मूलाधार की तरंगों से जुड़ जाता है।
दोनों की तीव्र तरंगों की उत्पादन और सक्रियता की प्रक्रिया इन तरंगों को वातावरण में बहुत तीव्रता से प्रक्षेपित करने लगती है। अकेले जितनी तीव्रता से प्रक्षेपित होती है किसी की तरंगे वह दो के जुड़ने से उसकी दुगनी या कह सकते हैं ग्यारह गुना तंत्र की दृष्टि से अधिक शक्ति से प्रक्षेपित होने लगती है, जिसमें मंत्र और नाद का जुड़ जाना अतिरिक्त शक्ति के साथ इन्हें एक लक्ष्य की ओर ऐसी तरंगों की ओर ले जाने लगता है जो उस मंत्र से सम्बन्धित होती हैं।
इसे आप कह सकते हैं की तिगुनी शक्ति से किसी एक लक्ष्य की ओर जाना। शक्ति की तरंगों तक व्यक्ति की तरंगें भी शीघ्र पहुंचती हैं और शक्ति की तरंगे भी अधिक आकर्षण से उनकी ओर आकर्षित होती हैं चूंकि व्यक्ति की तरंगों में ऋणात्मक गुण वाली तरंगे भी जुडी होती हैं अतः शक्ति से सम्बन्ध शीघ्र बन जाता है।
इस प्रकार आपसी ऊर्जा जुड़ाव होने लगता है और व्यक्ति की ओर शक्ति की तरंगे आकर्षित हो उनमे संघनित अर्थात इकठ्ठा होने लगती हैं। भावना और एकाग्रता से यह शक्ति व्यक्ति के शरीर में और आसपास एकत्र हो सिद्धि में सहायक हो जाती है, अतः एक निश्चित स्थिति के बाद व्यक्ति के मानसिक निर्देशों के अनुसार क्रिया करने लगती हैं, हम इसी को सिद्धि कहते हैं।
बेहद उच्च अवस्था में जबकि एकाग्रता बहुत उच्च हो जाय यह शक्ति प्रत्यक्ष भी हो सकती है। इससे मूलाधार का पूर्ण जागरण भी हो सकता है और अन्य चक्रों का भी जागरण हो सकता है। जिस चक्र से वह शक्ति जुडी होगी उसका जागरण तो होगा ही होगा किन्तु इस प्रक्रिया में साधिका और साधक दोनों को बराबर लाभ होता है। चूंकि दोनों की मूलाधार की तरंगों का आपसी जुड़ाव हो चूका होता है।
इस प्रक्रिया में ऋणात्मक प्रकृति की शक्तियाँ जैसे महाविद्या आदि साधिका में पहले अवतरित होती हैं जिनसे वह साधक को प्राप्त होती हैं जबकि धनात्मक शक्तियाँ जैसे भैरव ,गणेश आदि साधक में शीघ्रता से अवतरित होते हैं। यहाँ साधक साधिका दोनों को पूर्ण प्रक्रिया और तरीकों का ज्ञान होना आवश्यक है तभी वह लाभान्वित हो पाते हैं।
यह सूत्र और प्रक्रिया ही पंचमकार साधना और तंत्र सिद्धि का मूल है जिससे तांत्रिक शक्ति प्राप्त करते हैं अपनी भैरवी या सहयोगिनी द्वारा। एक और बात आप ध्यान दे सकते हैं की ऐसा सम्भोग जिसमे किसी ईष्ट का ध्यान किया जा रहा हो, मंत्र का जप किया जा रहा हो वह अब भोग कहाँ रहेगा वह तो योग मात्र योनी -लिंग का रह जाएगा। योग भी ऐसा जो बाहर से दो लोगों का योग है अन्दर से वह भी नहीं, अव्यय है।
यदि आप क्रिया विधि पर ध्यान दें तो आप पायेंगे की स्त्री पुरुष की शक्ति बनकर उसे शिव बनने में सहायक सिद्ध होती है और शिव या पुरुष स्त्री की शक्ति बन जाता है। इसलिए तंत्र में शिव से पूर्व शक्ति का महत्त्व है और शक्ति के बिना शिवत्व सपना है।
क्योंकि स्त्री द्वारा ही पुरुष को शक्ति प्राप्त होती है और पुरुष द्वारा ही स्त्री की चक्र जागृत होती है। यह सूत्र कुंडलिनी तंत्र का अद्भुत सूत्र है।

