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*कुंडलिनी-जागरण या सम्भोग-सिद्धि से मोक्ष*

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      ~डॉ. विकास मानव

सुषुम्ना नाड़ी के भीतर भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित हैं। इन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्म नाड़ी कहते हैं। 

    ब्रह्म नाड़ी सब नाड़ियों का मर्मस्थल केन्द्र एवं शक्ति स्रोत है। ब्रह्म नाड़ी ही मस्तिष्क के केन्द्र में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है। 

     इसी कारण उस स्थान को सहस्र दल कमल कहते हैं। सहस्र दल सूक्ष्म लोकों- विश्व व्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है। जिसके द्वारा परमात्मा की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक से पकड़ा जाता , मेरुदण्ड के नीचे अन्तिम भाग में सुषुम्ना के भीतर रहने वाली ब्रह्म नाड़ी एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बंध जाती है। 

      षट्कोण परमाणु को यौगिक ग्रन्थों में अलंकारिक भाषा में कूर्म कहा गया है। उसकी आकृति कछुए जैसी होती है। पृथ्वी कूर्म भगवान पर टिकी है। शेषनाग के फन पर अवलम्बित है। इस उक्ति का आधार ब्रह्मनाड़ी की वह आकृति है जिसमें वह इस कूर्म में लिपटकर बैठी हुई है ।

       जीवन को धारण किए हुए है। यदि वह अपना आधार त्याग दे तो जीवन भूमि के चूर-चूर हो जाने में थोड़ी भी देरी न लगे। कूर्म से ब्रह्म नाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलाकार होने के कारण ही उसका नाम कुण्डलिनी पड़ा। 

कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति एवं उपयोगिता इतनी अधिक है जितनी कि बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिए परमाणु एक चमत्कार बना हुआ है। उसके तोड़ने की विधि प्राप्त हो जाने पर प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया है। 

      अभी तो उसकी ऊर्जा के एक अंश का विध्वंसात्मक स्वरूप देखा गया है। रचनात्मक एवं शक्ति का एक बड़ा पक्ष अछूता है।यह तो जड़ जगत के एक नगण्य से परमाणु की शक्ति की बात हुई जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता तो चैतन्य जगत का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की तुलना में अनन्त गुना शक्तिशाली है।

      विज्ञान की शक्ति एवं उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। योग की उपलब्धियाँ हैं ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ। जिस प्रकार परमाणु की शोध में अनेकों वैज्ञानिक जुटे हैं। उसी प्रकार पूर्वकाल के आध्यात्मिक विज्ञान वेत्ताओं, तत्वदर्शी ऋषियों ने मानव शरीर के अंतर्गत एक बीज परमाणु की अत्यधिक शोध की थी ओर उसकी असीम शक्ति से लाभ उठाया।

     दो परमाणुओं को तोड़ने, मिलाने या स्थानान्तरित करने का सर्वोत्तम स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में होता है क्योंकि अन्य सभी स्थानों के चैतन्य परमाणु गोल और चिकने होते हैं पर कुण्डलिनी में यह मिथुन के रूप में लिपटा हुआ है। 

     जिस प्रकार युरेनियम एवं प्लूटोनियम धातु के परमाणुओं का गुन्थन ऐसे टेढ़े-तिरछे ढंग से हुआ है कि उनका तोड़ा जाना अन्य पदार्थों के परमाणुओं की अपेक्षा अधिक सरल है । उसी प्रकार कुण्डलिनी स्फुल्लिंग परमाणुओं की गतिविधि का इच्छानुकूल संचालन अधिक सुगम है। 

       अत एव पूर्वकाल के ऋषियों ने बड़ी तत्परता से कुण्डलिनी जागरण पर शोध की। शोध के परीक्षण एवं प्रयोग के उपरांत उन्होंने इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर ली जिसे चमत्कार समझा जाता है।कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों का भण्डार-तिजोरी कहा गया है। 

    बहुमूल्य रत्नों को तिजोरी में रखकर किसी गुप्त स्थान में रख दिया जाता है। उसमें मजबूत ताले लगा दिये जाते हैं जिससे कोई अनाधिकारी बाहरी व्यक्ति न प्राप्त कर सके।परमात्मा ने भी मनुष्य की अनन्त शक्तियों के भण्डार दिए हैं पर उन पर छह ताले लगा दिए हैं।

     इन्हें ही षट्चक्र कहते ,चक्रों के रूप में यह ताले इसलिए लगाये गये हैं कि कोई उन्हें कुपात्र न प्राप्त करले। कुण्डलिनी शक्ति पर लगे छह तालों- छह चक्रों को बेधना- खोलना पड़ता है। सामान्यतया कुण्डलिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में मूलाधार में नीचे की ओर मुँह किए बैठी रहती है।

      उसे जगाने के लिए सविता की प्राण शक्ति का आश्रय लेना होता है। तंत्रयोग की उच्चस्तरीय साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है। तंत्रयोग में प्राण साधना और भैरवी साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है। 

    कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है।

  *विपरीत क्रम श्वास विधि कुंडलिनी जागरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा*

      विपरीत क्रम श्वास विधि को* सीखने के लिए सबसे पहले पेट से साँस लेना सीखा जाता है। इसे डायाफ्रेगमेटिक डीप ब्रीथिंग भी कहते हैं। इसमें साँस अंदर भरने पर पेट बाहर की तरफ फूलता है। सांस बाहर छोड़ने पर पेट अंदर की ओर सिकुड़ता है। यदि इससे विपरीत क्रम में पेट की गति हो, तो वह साँस छाती से मानी जाती है। छाती से ली गई साँस से मन चंचल रहता है, और शरीर को भरपूर ऑक्सीजन भी नहीं मिलती।

     विपरीत क्रम श्वास विधि में साँस शरीर से बाहर नहीं छोड़ी जाती। भौतिक रूप से यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि साँस तो बाहर निकलेगी ही। परंतु आध्यात्मिक रूप से यह सत्य है। बाहर जाने वाली साँस की सूक्ष्म ध्यानमयी शक्ति को पेट से नीचे की ओर धकेला जाता है। उससे नाभि के नीचे व स्वाधिष्ठान चक्र के आसपास एक संवेदना जैसी पैदा होती है। वह संवेदना वीर्य-निर्माण की प्रक्रिया को उत्तेजित करती है।

     अंदर भरी जाने वाली साँस वास्तव में रीढ़ की हड्डी में ऊपर की ओर चढ़ाई जाती है। बाहर जाने वाली साँस से स्वाधिष्ठान चक्र पर वीर्य-संवेदना का बिंदु बनता है। वह संवेदना बाहर छोड़ी गई साँस से पीठ वाले स्वाधिष्ठान चक्र से होती हुई रीढ़ की हड्डी में ऊपर की तरफ चढ़ती है। वह सभी चक्रों से होते हुए सहस्रार तक पहुंच जाती है। उस संवेदना के साथ वीर्य की सूक्ष्म  शक्ति व कुंडलिनी भी होती है। इस तरह से हम देख सकते हैं कि वास्तव में शरीर के अंदर नीचे की तरफ जाने वाली हवा ऊपर की तरफ जाती है, और ऊपर की तरफ जाने वाली हवा नीचे की तरफ जाती है। इसीलिए इसे विपरीत क्रम प्रवाह विधि (बैकवार्ड फ्लो मैथड) कहते हैं।

     कुंडलिनी में शेषनाग, मूलाधार व स्वाधिष्ठान के ऊपर अपनी कुंडली लगाई हुई है। वह रीढ़ की हड्डी से होकर ऊपर उठा हुआ है, और मस्तिष्क में उसके एक हजार फन हैं। जब हम पेट से साँस भरते हैं, तो वह पीछे की ओर तन कर सीधा व कड़ा हो जाता है, तथा फन उठा लेता है। इसका अर्थ है कि उसके शरीर में साँस ऊपर की ओर चढ़ कर उसके फन तक पहुंची। इससे पूर्वोक्त संवेदना की शक्ति ऊपर की तरफ चली जाती है। जब हम साँस छोड़ते हैं, तब वह आगे की ओर ढीला हो जाता है, और अपना फन नीचे झुका लेता है। 

      ऐसा लगता है कि उसने फुफकार के साथ साँस नीचे की तरफ छोड़ी।

साथ में पेट भी अंदर की ओर सिकुड़ कर नीचे की ओर दबाव डालता है। इन सबसे पूर्वोक्त स्वाधिष्ठान बिंदु पर संवेदना बनती है।

*सम्भोग साधना से मोक्ष सिद्धि :*

      रमन्ते यस्मिन सुधियो 

नितान्तं देवर्षिगन्धर्वनरोगाद्याः।

रमन्ते यस्मिन सुधियो 

नितान्तं देवर्षिगन्धर्वनरोगाद्याः।

तद्ब्रम्ह कत्कर्तृ तदेव 

कर्म तदेव वेद्यं कवयो वदन्ति।।

यस्तिंतिनीस्पर्शतुपेत्य वेत्ति न 

संसृते कामपि हन्त चेष्टाम। 

बुद्धिम तदा चेद्द्रवतीं विधाय स 

जातु मातुर्जठरं न याति।।   

       जिस सम्भोग सुख में श्रेष्ठ बुद्धि वाले मनुष्य, देवर्षि, गंधर्व, नर, सर्प आदि सभी जीव नितांत रमण करते हैं, वह संभोग सुख ही ईश्वर है, वही कर्ता  है, वही कर्म है और वह ही पाने- जानने-जीने योग्य है। 

     जब पुरुष स्त्री के भग में स्थित आंतरिक प्राण तक क़ो योनिसेवा करते हुए अपने लिंग का स्पर्श करा देता है, तब वह कामांध होकर पुरुष को बाँहों में कसकर उसे अपना प्रणयी बनाती हुई प्राणनाथ से संबोधित करती हुई जो अनिर्वचनीय सुख प्रदान करती है, उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। 

     उस समय उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही इससे स्त्री द्रवित भी हो जाती है, तो समझो कि पुरुष अमर हो गया। 

     स्त्री उसे आँखों में बसाकर रखेगी। ऐसा प्यार देगी कि जिसका वर्णन नही किया जा सकता। 

     तब पूरे परिवार में सुख शांति भी रहेगी और सदैव कल्याण होता रहेगा। जहाँ पति से पत्नी और पत्नी से पति परम संतुष्ट रहते हैं वहाँ उस परिवार में निश्चित ही कल्याण होता है :

   संतुष्टो भार्यया भर्ता, भर्ता भार्या तथैव च।

    यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्रवै ध्रुवम।।

    यहाँ पहले पत्नी को संतुष्ट करने की बात कही गई है। 

अतः पहले पत्नी को संतुष्ट करना पति का धर्म है।  यह तभी संभव है जब पति पतित नहीं, पुरुषार्थी होगा, लिंग से मथकर योनि क़ो संतुष्ट करने की काम-कला को अच्छी तरह जानेगा। पुरुष तो संतुष्ट हो ही जाएगा। पर यदि पुरुष पहले ही संतुष्ट हो गया तो वह बेचारा हो गया, पौरुषहीन, उभयलिंगी यामी हिज़ड़। 

     अतः स्त्री को पहले द्रवित करने की शक्ति होनी चाहिए। नहीं तो वह बेचारी आहें भरती रहेगी। हर बार यदि ऐसा हुआ तो विवश होकर स्त्री पर पुरुषापेक्षिणी हो ही जाएगी। तब घर, घर नहीं श्मशान बन जाएगा, मरघट। 

      इसलिए जो पुरुष भग के अंदर तिन्तिनी प्राण तक अपने लिंग को पँहुचा देगा, पर्याप्त समय तक घर्षण देगा उसकी सारी इच्छा समाप्त हो जाएंगी और वह पुनः जन्म नही लेगा उसकी मुक्ति हो जाएगी। 

    अर्थात, जब स्त्री पूर्ण प्रसन्न हो जाएगी तो पुरुष को भरपूर सुख देगी ही, पूरी तरह खुश होकर परिवार चलाएगी। तब पुरुष की सारी इच्छाएँ कामनाएँ पूर्ण हो जाएंगी। जब इसी जन्म में वह कामना मुक्त हो जाएगा। कोई इच्छा वासना कामना शेष अतृप्त नहीं रह जाएगी तब उसे दूसरा जन्म उन अधूरी इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए क्यों लेना पड़ेगा. 

      पुनर्जन्म का यही कारण तो शास्त्र यही बताते हैं : यदि स्त्री पुरुष परमानन्द की अनुभूति संभोग सुख में करते हैं तो स्वतः वे मोक्ष को उपलब्ध हो गए। अन्यथा अतृप्ति उन्हें बार पैदा करती रहेगी. ध्यान-तंत्र में कुंडलिनी जागरण का मुख्य आधार यही है।

     संभोग की कला को यदि आपने साध लिया तो समझ लो सब सध गया। आप मुक्त हो गए। 

       ध्यान दें :

पहले धर्म (मानवता)

फिर अर्थ (पेटपूजा का साधन)

फिर काम (सम्भोग साधना)

और फिर कुछ नहीं,सीधे मोक्ष.

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