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राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव ?

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शशिकांत गुप्ते

विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में,स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजनैतिक दलो में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त सा हो रहा है
लोकतंत्र में राजनैतिक संगठन का वर्चस्व सरकार पर होना चाहिए और सरकार का वर्चस्व प्रशासन पर होना चाहिए?
वर्तमान में उल्टी गंगा बह रही है।प्रशासन सरकार पर हावी है।
इसीलिए एक अधिकारी आंदोलनकारियों के सिर को फोड़ने की बात सरेआम करने का साहस करता है।
सन 1980 में सत्ता परिवर्तन के बाद प्रख्यात लेखक, विश्लेषक स्व.खुशवंत सिंहजी ने अपने एक लेख में लिखा था। देश के सभी राजनैतिक दलों का कांग्रेसीकरण हो गया है,डिब्बे में माल एक सा है, सिर्फ ऊपर लेबल अलग अलग हैं।
देश के दो प्रमुख दलों की स्थिति में कोई अंतर नहीं है।एक दल का संगठन विशाल है दूसरे दल के संगठन की स्थिति पूर्णरूप से व्यक्ति केंद्रित होकर सीमित दायरे में सिमट गई है।
एक दल अपने आप को विश्व भर के सबसे बडा दल होने दावा करता है,लेकिन इसी दल को दूसरें दल के लोगों प्रलोभन देकर आपने दल में शरीक करना पड़ता है,और स्वयं के दल के कर्मठ कार्यकर्ताओं को बंधुआ मजदूरों की तरह नजरअंदाज कर बाहरी लोगों मंत्री तक बनाया जाता है।राज्यसभा की सदस्यता तो मानो दलबदलुओं के लिए पारितोषिक के रूप में उपलब्ध होती है।यह प्रक्रिया सर्वोच्य सदन की गरिमा को कमजोर ही कर रही है।
दो प्रमुख दलों को छोड़ कर बहुत से क्षेत्रीय दलों की स्थिति निजी कम्पनियों की तरह हो गई है।इन कम्पनियों में एक ही परिवार के लोग डायरेक्टर बनते हैं,अर्थात संगठन के प्रमुख पदों पर विराजित होतें हैं।
वर्तमान में बहुत से प्रदेशों के मुखियाओं को बदला जा रहा है।
सामंती युग में राजा का उत्तराधिकारी वही बनता जिसे राजा पसंद करता था।फिर वह चाहे पुत्र ,भाई,भतीजा,दत्तकपुत्र हो,शारीरक रूप से कमजोर हो,मानसिक रूप से भलेही परिपक्व न हो राजा की पसंद से उसे ही राजगद्दी नसीब होती थी।जिसकी किस्मत चमकती थी उसमें प्रशासनिक प्रबंधन की योग्यता हो अथवा न हो कोई फर्क नहीं पड़ता है।
वर्तमान में उक्त स्थिति,स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।दोनों दलों द्वारा सूबे मुखियाओं को बदला जा रहा है।
राजनैतिक दलों की स्थिति समाज के स्वरूप जैसी ही होते जा रही है।जिस तरह समाज के व्यापकता को विभिन्न जातियों में बांटा गया है।जातियों के भी उपजाति में उन्हें उन्नीसा बीसा की परिधि में सीमित किया जा रहा है।
इसी तरह राजनैतिक दलों में गुट बाजी के पनपने से एक दल के अंदर विभिन्न क्षत्रपों का वर्चस्व बढ़ गया है।इन क्षत्रपों के इर्दगिर्द इनकी अनुकंपा में रहने वाले इन क्षत्रपों के पठ्ठे कहलाते हैं।
इन पठ्ठो की स्थिति तब दयनीय हो जाती है जब इनके क्षत्रपों का राजनीति वर्चस्व कमजोर हो जाता है।
सभी दलों की उक्त स्थिति से स्पष्ट हो जाता है कि राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव है।
यह एक बहुत ही गम्भीर प्रश्न है।
इसीलिए सत्तारूढ़ दल आमजन की मूलभूत समस्याओं हल करने में सक्षम नहीं होता है।राजनैतिक दल आंतरिक लोकतंत्र के अभाव में आंतरिक कहल में उलझें रहेंगे तो जन समस्याओं को हल करने की पहल भी गम्भीरता से कैसे कर पाएंगे?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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