सुसंस्कृति परिहार
केन्द्रीय सरकार की मंशानुरूप लड़की की विवाह की आयु 18से बढ़ाकर 21किए जाने पर इन दिनों समाज में कई तरह की चर्चाएं हैं। हालांकि पढ़ने और आगे कुछ करने की तमन्ना रखने वाली लड़कियां बहुत खुश हैं तथा वे लड़कियां मानसिक तौर पर बहुत परेशान हैं जो अपने ब्याह का इंतजार करते हुए जैसे तैसे 18पूरे करने वाली थीं। इनमें दो युवतियां ऐसी भी मुझे मिली हैं जिन्हें मां बाप सोलह की उम्र में ब्याह करना चाह रहे थे लेकिन महिला बाल विकास अधिकारी की कार्रवाई के तहत उनके विवाह को 18 पूरे होने तक रोका गया अब 2 दो साल बाद विवाह की तिथि आने से पहले ये नया क़ानून उन्हें रुला रहा है उनके सपने फिर तीन साल के लिए फिर ठंडे बस्ते में चले जाएंगे।एक इसी तरह का मामला प्रेम का भी है जिसमें उन्हें रोका गया है वे कितना और कैसे अपने को रोक पाएंगे?समझ से परे है। इसलिए कहा जाता है कि यह मानवीय इच्छा का दमन है।इसे कानून नहीं समझ सकता।
दूसरी सबसे अहम बात यह है कि भारत एक उष्ण कटिबंधीय प्रदेश है जहां नौ माह के लगभग मौसम गर्म रहता है जिससे युवतियों में परिपक्वता 14वर्ष की उम्र में यानि जल्द आती है ।दूसरे शब्दों में कहें उनमें कामेच्छा जल्द आती है ।जबकि ठंडे देशों में यह उम्र 18 से 20 है। बहुत गर्म प्रदेशों में यह 11 से 12वर्ष है। हमारे यहां पहले लड़की की सोलह साल की उम्र को सबसे नाज़ुक दौर माना जाता था और उसका विवाह ज़रूरी था।यह सामाजिक फैसला था। जिसे लंबे अर्से तक निर्वहन किया गया।1929 शारदा एक्ट में तब विवाह की आयु 15 वर्ष थी। लेकिन लोग रजस्वला होने से पूर्व कन्यादान कर देते थे।
लेकिन इस उम्र में शादी और उसके बाद संतान उत्पत्ति के बाद की मौतों और शिशु मृत्यु दर में बढ़ोतरी की वजह से ये उम्र सन् 1978 शारदा एक्ट में संशोधन कर 18 वर्ष कर दी गई।जिसे उचित माना गया लेकिन यह भी सच है हमारे समाज में चोरी छिपे लगभग तीस फीसदी विवाह अठारह से कम उम्र की लड़कियों के होते रहे हैं। इनमें 25%बालविवाह गांवों में हुए हैं।ऐसा इस वजह से हुआ गांव की लड़की की दुनिया अपने पति के घर में होती है यह उसे बचपन से घूटी में पिलाया जाता है इसलिए उसकी अपनी रुझान भी ब्याह में होती है साथ ही साथ मां बाप भी उस बच्ची से जल्द से जल्द मुक्त होना चाहते हैं। सिर्फ वे ही बच्चियां विवाह से दूरी बनाके चलती हैं जो शहरों के करीब गांवों की होती हैं जो नई रोशनी शहरों में देखती है।पढ़ना और कुछ करना चाहती हैं। इनमें से भी मुश्किल से दो प्रतिशत लड़कियां ही अपने मकसद में सफल होती हैं।बाकी निराशा में विवाह में ही अपना सपना देखने लगती हैं।विवशता में विवाह को तैयार हो जाती हैं।
इसलिए 21की विवाह की उम्र तब सही कही जा सकती जब हर उस पढ़ने वाली लड़की की सुरक्षा ,पढ़ाई की व्यवस्था और उससे रोजगार की गारंटी उसे मिले।आज के हालात में लड़कियों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल है। पिछले दो साल से लाखों लड़कियों की पढ़ाई छूटी हुई है उसकी भरपाई कैसे होगी?एक इक्कीस साल की परिपक्व लड़की की तमाम जिम्मेदारी आज मंहगाई के दौर में सहजता से उठाना बहुत मुश्किल है इसलिए यह आने वाला कानून उचित प्रतीत नहीं होता है गर्म देश की वह सोलह साल की कमसिन लड़की कैसे अपने को संभाल पायेगी पांच साल और।ज़माना खराब है साहिब।आपके पास उसे देने ना शिक्षा है ना रोज़गार।उसे काम चाहिए। इसलिए मां बाप उसे बोझ मानते हुए उसे उसके ‘घर ‘भेजने की जल्दी में रहते हैं। क़ानून बनने से चंद युवतियों को ही फायदा मिलेगा। वैसे भी जिन्हें आगे बढ़ना है वे अब निरंतर आगे आ रही हैं भले ही वे वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर चुकी हों।
बहरहाल, लड़कियों को जागरूक बनाएं वे अपने फैसले ख़ुद ले सकें और आगे बढ़ सकें। विवाह की आयु बढ़ने के बाद निश्चित तौर पर सामाजिक वातावरण दूषित होगा।चोरी छिपे यौनाचार बढ़ेगा।अभी जब 18 से कम लड़कियों और 21से कम लड़कों के विवाह बड़ी संख्या में हो रहे हैं तो पहले उन पर ब्रेक लगाने की ज़रूरत है।जब तक वे नहीं रुकते तब तक 21वर्ष लड़कियों के विवाह की अवधि करने के कोई मायने नहीं।
कतिपय लोगों का ख़्याल कि सरकार लाड़ली लक्ष्मी के नाम से जमा पैसा जो 18साल उम्र के बाद एक लाख से अधिक होता है वह इस आदेश से तीन साल तक रोकना चाहती है जो राशि अरबों में होती है इसलिए ये कानून बना रही है ताकि उस पैसे का उपयोग आगत चुनावों में कर लिया जाए।उनका ख्याल सही हो सकता है क्योंकि इस बार चुनाव उनके लिए आसान नहीं है इसलिए लाड़ली लक्ष्मी का रुपया भी जनता के बीच लुटाने का प्लान भी हो सकता है। मरता क्या नहीं करता ?
लाड़ली का पैसा भी कहीं हजम तो नहीं होने वाला!

