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गाजा से आखिरी खत

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विपिन कुमार त्रिपाठी

अम्मी अब्बा भाई बहन दोस्त दब चुके हैं मलबे में मैं जिंदा हूं। अन्न पानी खत्म हो गया है बिजली कटे अरसा हो गया है खत लिख रही हूं अंधेरे में उनके नाम जो मेरी तरह बदहाल हैं पर जिंदा है धरती के कोने कोने में हिंदुस्तान, चीन, पाकिस्तान, अफ्रीका यूरप, अमरीका में।

तुमने पैदा किये बुद्ध, सुकरात, ईशा, मुहम्मद गांधी, कबीर, नानक, किंग, अराफात तुमने जिंदा रखी इंसानियत की लाज अपनी सच्चाई, दर्दमंदी और मेहनत की कमाई से. निहत्थे भिड़कर साम्राज्यवादी निजाम से जलियांवाला बाग, वियतनाम मिसाल हैं तुम्हारी हिम्मत के।

मैं भी जुड़ना चाहती थी तुमसे मिलकर सुख दुख बांटना चाहती थी नस्ले आदम एक है कहना चाहती थी हुक्मरानों से तमंचों को विध्वंसकारी कहकर बम गिराने वालों से। मगर मेरे रास्ते काट दिये गये

वतन से बेवतन, बे-सरकार, बे-हिफाजत कर दिये गये मेरे वतन के लोग

वतन का नाम भी बदल दिया जहाँ हम गये, यहीं की कर दी घेराबंदी गिराये बम, चलाये टैंक और बुल्डोजर हमने अहिंसक इन्तेफादा की टैंकों के खिलाफ झुकना पड़ा दमनकारी को पांव रखने को जगह देनी पड़ी गाजा पट्टी व पश्चिमी तट पर। लेकिन वहां भी फिर वादा खिलाफी

बनाने को गोदाम और अड्डे लगा दीं बंदिशें चलने फिरने पर काम धंधों पर कुचला, बंदी बनाया कुछ लडकों ने हिंसा की खुद मर कर

एक के बदले सौ की मौत झेली अफसोस दोनों तरफ निर्दोष मारे गये फर्क क्या है हममें और यहूदी अवाम में दोनों एक है

काबिल हैं दुनिया को आगे बढ़ाने के नोबल के स्तर की शोध करने के पर तबाही और बर्बादी हमारे सिर पे आई उनकी सत्ता और सेना की तरफ से चाहती हूँ उनकी तकलीफों पे मैं बोलू, मेरी बर्बादी पे वो बोलें रूह को जिंदा करें और सल्तनत के हाथ रोकें चंद सांसें ही बची है अलविदा कहती हूँ

दोस्तों, जिंदा रखना आत्मा को ‘ना’ कहना जुल्म ओ दास्ता को।

विपिन त्रिपाठी, सद्भाव मिशन, बी-16, सर्वोदय एन्क्लेव, नई दिल्ली-110017

फोन: 09717309263, tripathivipin@yahoo.co.in

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