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*ना कहना सीखो — हर कोई सुपात्र नहीं होता*

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(ओशो के एक प्रवचन का परिष्कृत संस्करण) 

–      तेजपाल सिंह ‘तेज’

          मैं कहता हूँ—हर किसी के लिए हर समय उपलब्ध रहना बंद करो। क्योंकि तुमने अपने जीवन में दूसरों की अपेक्षाओं का सबसे भारी बोझ उठा रखा है। और सबसे गहरी गुलामी वही है, जहाँ तुम अपने समय से अधिक दूसरों के समय के लिए जीने लगते हो। लोग इसे सेवा, प्रेम और करुणा समझते हैं।  लेकिन मैं कहता हूँ—एक सीमा के बाद यह करुणा नहीं, आत्मविश्वास की क्षति बन जाती है। तुम अपनी जड़ों को कमजोर कर लेते हो। जो पेड़ हर दिशा में झुकता है, वह कभी आकाश को नहीं छू पाता। मैंने भीड़भाड़ वाले शहरों में, रिश्तों की लंबी सूचियों के बीच ऐसे लोगों को देखा है, जिनके भीतर गहरा अकेलापन है। यह अकेलापन इसलिए नहीं कि लोग उनके आसपास नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि वे स्वयं अपने साथ नहीं हैं। वे सबके लिए उपलब्ध हैं, लेकिन खुद के लिए नहीं। जिसने स्वयं को कभी समय नहीं दिया, वह संसार को क्या देगा?

          एक छोटी सी कहानी है। एक संत था—दयालु, प्रेममय। जो भी उसके पास आता, वह उसकी सारी पीड़ा सुन लेता। वह दूसरों का बोझ अपने ऊपर उठा लेता। धीरे-धीरे लोग उसे भगवान मानने लगे, लेकिन भीतर से वह थक चुका था। एक दिन उसने कहा—मुझे एकांत चाहिए। लोगों ने कहा—तुम स्वार्थी हो गए हो। वह हँस पड़ा और बोला—यदि मेरी करुणा तुम्हें स्वार्थ लगती है, तो जान लो कि तुमने मेरी करुणा को बोझ बना दिया है। तुमने दूसरों की सुविधा को अपना धर्म बना लिया है। तुम ‘ना’ कहना भूल गए हो। और जो व्यक्ति ‘ना’ नहीं कह सकता, वह कभी सच में ‘हाँ’ भी नहीं कह सकता। क्योंकि ‘हाँ’ की सुंदरता तभी है, जब ‘ना’ कहने की स्वतंत्रता हो।

          हर किसी के लिए उपलब्ध रहना बंद करो। तुम्हारे भीतर एक मंदिर है, जिसका द्वार हर किसी के लिए नहीं खुलता। जो व्यक्ति हर आवाज़ पर द्वार खोल देता है, वह घर का मालिक नहीं, केवल चौकीदार बन जाता है। तुम अपनी आत्मा के रखवाले बन गए हो—हर पुकार पर दौड़ पड़ते हो, हर आवश्यकता पर स्वयं को भूल जाते हो। मैं तुम्हें सिखा रहा हूँ—रुको। धीरे चलो। अपने भीतर लौटो। तुमने दूसरों को इतना महत्वपूर्ण मान लिया कि अपने भीतर के दैवीय स्वरूप को भूल गए। जीवन का महान रहस्य यही है—जो अपने भीतर लौट आता है, वही संसार को सच्चा उपहार दे सकता है। जो परिपूर्ण होता है, वही बाँट सकता है। जो खाली होता है, उसकी केवल अपेक्षाएँ होती हैं। दूसरों के लिए उपलब्ध रहने के चक्कर में तुम अपना खजाना लुटा देते हो—समय, ऊर्जा, प्रेम, शांति, मौन। और आश्चर्य यह है कि जिनके लिए तुम सब कुछ देते हो, वे कभी संतुष्ट नहीं होते, कृतज्ञ भी नहीं। क्योंकि जो लोग तुम्हारा उपयोग करने के आदी हो जाते हैं, वे तुम्हें मनुष्य नहीं, सुविधा समझते हैं। और सुविधा को सम्मान नहीं मिलता।

          इसीलिए मैं कहता हूँ—चुनाव करो। सचेत रहो। तय करो कि किसके लिए अपने द्वार खोलने हैं। यह आत्मरक्षा है, अहंकार नहीं। यह स्वतंत्रता है, कठोरता नहीं। यह प्रेम है, दूरी नहीं। हवाई जहाज़ का उदाहरण याद रखो। ऑक्सीजन मास्क पहले स्वयं लगाओ, फिर बच्चे को। क्योंकि यदि तुम बेहोश हो गए, तो किसी की रक्षा नहीं कर पाओगे। जीवन भी ऐसा ही है। यदि तुम अपनी शांति, ध्यान और प्रेम खो दोगे, तो किसी की सहायता नहीं कर पाओगे। उपलब्धता मजबूरी नहीं होनी चाहिए; वह परिपूर्णता से प्रवाहित होनी चाहिए।

          आज तुम नदी की तरह सबके लिए बह रहे हो, लेकिन भीतर स्रोत सूख रहा है। मैं कहता हूँ—पहले स्रोत तक जाओ। भर जाओ। तब तुम्हारी उपलब्धता आशीर्वाद बनेगी, बोझ नहीं। हर समय उपलब्ध रहने की आदत धीरे-धीरे तुम्हें तुम्हारे जीवन से वंचित कर देती है। एक दिन तुम पाओगे—जीवन बीत गया, लोग आते रहे, बोझ डालते रहे, और तुम स्वयं कहीं नहीं रहे। मैं नहीं चाहता कि तुम अभाव का जीवन जियो। जीवन तुम्हें पुकार रहा है—तुम्हारी चुप्पी, तुम्हारी आत्मा तुम्हें बुला रही है। और तुम उन लोगों में उलझे हो जिनका तुम्हारी आत्मा से कोई लेना-देना नहीं।

          जब तुम सबके लिए उपलब्ध रहना बंद करते हो, तभी वास्तविक उपलब्धता का जन्म होता है। तब अस्तित्व खिल उठता है। कभी-कभी तुम्हारी अनुपलब्धता ही तुम्हारा सबसे बड़ा उपहार बन जाती है। धीरे-धीरे तुम देखोगे—कौन तुम्हें समझता है और कौन केवल उपयोग करता है। यह पहचान तुम्हें मुक्त कर देती है।

जो तुम्हारी चुप्पी को स्वीकार नहीं कर सकता, वह तुम्हारे शब्दों के योग्य भी नहीं। और जो तुम्हारी अनुपस्थिति से असहज है, वह तुम्हारी उपस्थिति का सम्मान कभी नहीं करेगा।

          याद रखो—तुम्हारी सीमाएँ ही तुम्हारी सुरक्षा हैं। तुम्हारा ‘ना’ ही तुम्हारी औषधि है। दूरी विरोध नहीं है; यह आत्म-देखभाल है। पहले स्वयं के लिए उपलब्ध हो जाओ। तब ही तुम अस्तित्व के लिए खुल सकोगे। संसार से थोड़ी दूरी, आत्मा से निकटता—यही जीवन का रहस्य है। जब बाहरी शोर शांत होता है, भीतर का दीप जल उठता है। और तब तुम्हारी उपलब्धता सुगंध बन जाती है—दबाव नहीं। ( https://www.youtube.com/watch?v=flsc7d6XZG8

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