गोरी शंकर अग्रवाल
जो देश कभी पूरब का स्विट्जरलैंड कहलाता था, जिसकी राजधानी बेरूत पूरब का पैरिस मानी जाती थी. जिसकी मुद्रा लेबनीज पोंड अमेरिका के डालर को टक्कर देती थी. वह देश आज कंगाली के दहलीज पर खड़ा है.
जो लेबनान आधुनिक दुबई की प्रेरणा था आज एक असफल राष्ट्र है.
सवाल यह है ऐसा कैसे हुआ इसके इतना पीछे होने का क्या कारण है?
अगर हम इसके इतिहास में पीछे मुड़कर देखते हैं तो 1950 से 1970 तक अमेरिका के बड़े व्यापारियों का बैंकिंग तथा वित्तीय गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था. बहुमंजिला माल्स, सुसज्जित बंगलों, अत्याधुनिक फैशन स्टोर से सजा बेरूत धरती का स्वर्ग जैसा नजर आता था. तेल उगलते कुओं से अथाह कमाई करने वाले अरब शैखों का सारा धन बेरूत के बैंकों में जमा रहता था. पश्चिम के नव धनिको का आरामगाह था लेबनान.
समय ने करवट ली और लेबनान के नागरिक अप्रतिम सौंदर्य की वादियों से निकलकर कीचड़ सने नालों में कैसे गिर गया?
1923 में ओटोमन साम्राज्य विभक्त हुआ तो आज का लेबनान सीरिया से अलग हुआ था जिसमें मैरोनाइट ईसाई, सुन्नी मुसलमान, शिया मुसलमान, ग्रीक आर्थोडॉक्स एवम् ग्रीक कैथोलिक ईसाई और ज्यूज सामुहिक रूप से सहिष्णुता से रहते थे. जब लेबनान विश्व पटल पर चमकता सितारा था. इसमें ईसाई व्यापारियों का बहुत बड़ा योगदान था.
1975 से 1990 के दौर में कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों ने ईसाईयों पर हमले चालू कर दिए.
फिर तो एक सिलसिला चालू हो गया शिया सुन्नी से, मैरोनाइट मुसलमान से, मैरोनाइट कैथोलिक से, ज्यूज सभी से फिर हर कोई हर दूसरे धर्म फिरके से हिंसा करने लगे. सारा देश आपसी हिंसा से बरबाद होता गया.
इस देश की बरबादी का एकमात्र कारण है धर्म के नाम पर राजनीति और हिंसा.
अभी देश की यह हालत है देश में न बिजली है न पानी न पुल न सड़कें.
यहां के नागरिक देश छोड़कर भाग रहे हैं. कम से कम 10 लाख धनी लोग अपना धन समेट कर पलायन कर चुके हैं.
आज हालत यह है तीन साल पहले जो सामान 30 लेबनानी मुद्रा में आता था उसको खरीदने के लिए 900 लेबनानी मुद्रा चाहिए.
लिखने का तात्पर्य यह गिरकर संभलना बहादुरी है पर दूसरों को गिरता देखकर संभलना बुद्धिमानी है.
नफरत छोड़ो – भारत जोडो.
Gori Shankar Agarwal

