– मामा बालेश्वर दयाल
किसी राष्ट्र में सत्ता या व्यक्तित्व को केन्द्रित करने और केन्द्र के हाथ मजबूत करने की गतियां जब गति करने लगे तब निश्चय समझें कि वह देश पूंजीवाद की चरम सीमा पाने की चेष्टा में है। यह चेष्टा ज्यों ज्यों विकास करती है पूंजीवाद के कीटाणु भी उतनी ही तेजी से गति करते हैं। सत्ता प्रेरक कृत्रिम प्रचार प्रयोग के बावजूद जनता का असहयोग बढ़ता है ऐसे नाजुक वक्त पर सरकार को सहयोग या समर्थन करने का अर्थ जाने या अनजाने भ्रष्टाचार को ही सहयोग या समर्थन होता है।
फलतः सामाजिक मर्यादाएं चौतरफा छिन्न भिन्न होती हैं। अन्याय उत्तरोत्तर रूपांतर करता आतंक और अराजकता में परिणत हो जाता है। इतिहास की यह स्थिति रक्त रंजित रंग-रेलियों को अनिवार्य बना देती है तब इतने मंहगे भोग के बाद संघर्ष (सिवील नाफर्मानी) असहयोग आंदोलन की सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की साधना प्रेम पुजारियों के समझ में आती है। पूंजीवादी समाज में संघर्ष का यह स्वरूप सनातन सत्य है। दूर न जाइये, इसी देश के बगल में हिमालय की ओट में चीन जैसा विशाल देश है।
राष्ट्रीयता और एकता के भंवर जाल में वहां संघर्ष की गति क्रूर साधनों द्वारा कुंठित की गई। तब एक दशक से अधिक ग्रह युद्ध धुँधकारता रहा पर ऊपरी स्वरूप इतना भ्रामक रहा कि, प्रधान मंत्री च्यांगकाई शेक की सभाओं में १६४८ तक ४-५ लाख लोगों की भीड़ रहती थी तब अपने प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने भी रोबीले स्वर में कहा था कि “चाइना इज़ सेफ अन्डर च्यांगकाई शेक।” च्यांगकाई शेक के नेतृत्व में चीन सर्वथा सुरक्षित है, पर उसी वर्ष के सवेरे १६४६ में च्यांग साहब रात लेकर भागे । लाखों लोगों का खून कराके फार्मूसा में जा छिपे । डालर सेठ की पंचवर्षीय योजनाएं और सुसज्जित सेनाएं आसमान के तारे गिनती रह गई।
विवेक मेहता, अहमदाबाद के संकल्पन से***

