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खेल को खेल ही रहने दो?

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शशिकांत गुप्ते

खेल, नैतिक दृष्टि से खिलाड़ी में आत्मनियंत्रण,ईमानदारी,सच्चाई, निष्पक्षता,सहयोग,और सहनशीलता आदि गुण पैदा करता है।खेल से खिलाड़ी हार जाने पर हतोत्साहित नहीं होता है ना ही खिलाड़ी में द्वेष भाव पैदा होता है।खेल खिलाड़ी में कल्पनाशक्ति को विकसित करता है।खेल खिलाड़ी के शारीरिक और क्रियात्मक कौशल का विकास भी करता है।खेल व्यायाम भी है।खेल खिलाड़ी में आत्मबल के साथ योग्य निर्णय लेने की क्षमता को भी विकसित करता है।
उपर्युक्त मुद्दे तकरीबन सभी तरह के खेलों के लिए लागू होतें है।
नीतिविहीन,सिंद्धान्तविहीन,
विचारविहीन,पूंजीकेंद्रित,
सत्ताकेंद्रित व्यक्तिकेन्द्रित,राजनीति के प्रभाव से खेल ग्रसित हो गया है।इसीकारण खेल में विकृतियां आगई है।
चुनाव के दौरान राजनैतिक दलों के रीति,नीति और सिंद्धातों से ज्यादा चर्चा,Speculation अर्थात सट्टे की होती है।
इसीतरह खेल पर भी बेतहाशा सट्टा खेला जाता है।ऐसा आरोप है।
राजनैतिक चुनाव और खेल में उम्मीदवार और खिलाड़ी की योग्यता क्षमता को दरकिनार कर सट्टा खेलने वाले और सट्टा का व्यापार करने वालों का ध्यान सट्टे के भाव पर केंद्रित होता है।
दुर्भाग्य से खेल को साम्प्रदायिक रंग में रंगने से खेल में खेल की भावना का लोप हो रहा है।
दो देशों के बीच जब खेल खेला जाता है तब खेल की तकनीक,खेल के नियम तो एकतरफ रह जातें हैं।बहुत से समाचार माध्यमों द्वारा ऐसा प्रचार किया जाता मानों दो देशों के बीच खेल नहीं युध्य हो रहा है।
सामाचारों की हेडलाइन भी दर्शकों में उत्साह पैदा करने के बजाय साम्प्रदायिक उत्तेजना पैदा करती है।
उपर्युक्त मुद्दों पर गम्भीरता से व्यापक बहस होनी चाहिए, अन्यथा विश्वभर की भावीपीढ़ी में द्वेष,वैमन्यस्यता जैसी ग्रणित भावना विकसित होगी।जो मानवीय संवेदनाओं को समाप्त कर सकती है।
एक ओर हम वसुधैवकुटुम्बकम की धारणा को मूर्त रूप देने के लिए प्रयास कर रहें हैं।दूसरी ओर सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रचतें हुए मानसिक विकृतियां पैदा की जा रही है।
वर्तमान में खासकर युवाओं में नशे की लत बढ़ रही है,युवाओं को हर तरह भृष्ट करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाना भी भविष्य की खतरनाक तस्वीर को इंगित कर रहा है।
सन 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म जिस देश में गंगा बहती है में
गीतकार शैलेन्द्र जी द्वारा लिखे गीत की पंक्तियों में संदेश है।वह मौजूद स्थिति के लिए प्रासंगिक है।
कट्टरपंथी कहतें हैं।
है आग हमारे सीने में
हम आग से खेलते आते है
टकराते है जो इस ताकत से
वो मिटटी में मिल जते है
उदार मानव कहता है।
तुम से तो पतंगा अच्छा है
जो हस्ते हुए जल जाता है
वो प्यार में मिट तो जाता है
पर नाम अमर कर जाता है
कट्टरपंथी और उदारवादी
दोनों है आमने सामने
देखलो क्या असर कर
दिया प्यार के नाम ने
कट्टरपंथी :-
हम मौज में जब भी लगराए
सारा जग दर से थर्राया
उदारवादी
हम छोटी सी वो बून्द सही है
सीप ने जिसको अपनाया
खारा पानी कोई पी न सका
एक प्यार का मोती काम आया
इस जद्दोजहद में उदारवादी यही कहता है और हमेशा कहता रहेगा।
ये दिल का कँवल सब से सुन्दर
मेहनत का फल सबसे मीठा
इस प्यार की बाज़ी में हँसकर
जो दिल हारा वो सब जीता
खेल को खेल की भावना से खेलना चाहिए।देखना चाहिए और समझना चाहिए।
हरक्षेत्र का व्यापारीकरण ही सभी क्षेत्रों ने विकृतियां पैदा होने का मुख्य कारण है।दुर्भाग्य से धार्मिक क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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