राकेश अचल
पिछले अनेक दशकों में राजनीति के केंद्र में रहा अयोध्या का विवादास्पद राम मंदिर राघवेंद्र सरकार या किसी रामानंदी सम्प्रदाय का नहीं अपितु भारत सरकार की उपलब्धि है। ये मानने से अब हमारी सरकार का संकोच दूर हो गया है और ये एक अच्छी बात है । गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू के राष्ट्र के नाम सम्बोधन में अयोध्या में राम मंदिर बनने और वहां रामलला के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा का उल्लेख इसका प्रमाण है।
माननीय राष्ट्रपति महोदया ने अपने सम्बोधन में स्पष्ट कहा कि- इस सप्ताह के आरंभ में हम सबने अयोध्या में प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान पर निर्मित भव्य मंदिर में स्थापित मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक समारोह देखा। भविष्य में जब इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा, तब इतिहासकार, भारत द्वारा अपनी सभ्यतागत विरासत की निरंतर खोज में युगांतरकारी आयोजन के रूप में इसका विवेचन करेंगे।
उचित न्यायिक प्रक्रिया और देश के उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। अब यह एक भव्य संरचना के रूप में शोभायमान है। यह मंदिर न केवल जन-जन की आस्था को व्यक्त करता है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में हमारे देशवासियों की अगाध आस्था का प्रमाण भी है।
राघवेंद्र सरकार यानि राजाराम यानि रामलला सब एक ही माया हैं। उनका मंदिर टूटना मुगलकालीन राजनीति का एक हिस्सा था और उनके मंदिर के स्थान पर बनी बाबरी मस्जिद को तोड़ना आजाद भारत की एक राजनीतिक घटना किन्तु पुन: राम मंदिर का निर्माण होना फिर एक राजनीतिक घटना है। इसे इतिहास में दर्ज किया जाएगा। इतिहास तो इतिहास होता है। उसे बनाया और बिगड़ा जाता है। आज से नहीं सदियों से ये काम हो रहा है। राम मंदिर हमारी केंद्र सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है । इसे बनाने के लिए सत्तारूढ़ भाजपा को न जाने कितनी मेहनत करना पड़ी। लेकिन विरोध किसी का नहीं सहना पड़ा । देश के मुसलमानों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुपचाप स्वीकार कर लिया।
भाजपा की मंदिर बनाने की और मस्जिद तोड़ने की जिद पूरी हो गयी है ,लेकिन भाजपा को याद रखना चाहिए कि मंदिर बनाने मात्र से न देश में राम राज आता है और न देश की श्रीवृद्धि होती है । यदि ऐसा होता तो एक छोटे से देश कम्बोडिया में विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर बना हुआ है किन्तु वहां की जनता आज भी भुखमरी का शिकार है। क्योंकि वहां भी कबीलाई गृहयुद्धों ने सब कुछ बर्बाद कर दिय। धर्म कम्बोडिया की संस्कृति तो दूर आबादी की भी रक्षा नहीं कर सका। कम्बोडिया में आज साठ साल से ऊपर का कोई आदमी खोजने पर भी नहीं मिलता क्योंकि अधिकांश लोग धार्मिक उन्माद में कत्ल कर दिए गए।
भारत में गणतंत्र की स्थापना का ये अमृत वर्ष है इसलिए अब देश की राजनीति को धर्म की राजनीति से मुक्ति देकर एक बार फिर से जनतांत्रिक मूल्यों के आधार पर राजनीति शुरू की जाना चाहिए। इस राजनीति की शुरूवात आज के सत्तारूढ़ दल से तो होने से रही ,इसलिए मुमकिन है कि देश को इसके लिए लंबा इन्तजार करना पड़े। एक बार देश की राजनीति बेपटरी हो जाये तो उसे पटरी पर लाने में आखिर वक्त तो लगता है। इस वक्त भारत का विपक्ष एक तरह से कबीलों में बंटा है । कांग्रेस को छोड़ कोई राष्ट्रीय दल नहीं है जिसका अपना कोई अतीत,कोई विरासत या कोई स्पष्ट विचारधारा हो। संयोग से कांग्रेस एक दशक से सत्ता से दूर है और पता नहीं उसे दोबारा सत्तारूढ़ होने में कितना वक्तलगे।
मुमकिन है कि भारतीय जनता का एक बड़ा हिस्सा धर्म की राजनीति के साथ खड़ा हो या भविष्य में खड़ा हो जाये ,लेकिन ये भी सच है कि धर्म की राजनीति से देश का कल्याण सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। हालाँकि धर्म की राजनीति के पक्ष में भाजपा के लिए पूर्णकालिक या दिहाड़ी पर काम करने वाले विद्वान ये साबित कर सकते हैं कि राजनीति के लिए धर्म एक आवश्यक घटक है। भविष्य की राजनीति के बारे में अभी से कोई घोषणा नहीं की जा सकती क्योंकि लोकतंत्र की जड़ों में इतना मठा डाला जा चुका है कि लोकतंत्र के बरगद को गिरने से बचने के लिए बहुत जतन करना पड़ेंगे।
धर्म को लेकर अनेक धारणाएं हो सकती हैं किन्तु मेरी अपनी धारणा ये है कि धर्म और राजनीति दो अलग अनुभव है। भारतीय इतिहास और संस्कृति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां धर्मराज कहे जाने वाले लोग भी जुआरी पाए गए हैं। उन्हें एक ही स्त्री को पांच लोगों में सामान की तरह तकसीम करते हुए बताया जाता है। अर्थात धर्म समय के साथ बदलता रहता है ,उसकी मान्यताएं ,अस्थायें बदलती रहतीं हैं लेकिन लोकतंत्र के साथ ऐसा नहीं है । दुनिया में जो लोकतान्त्रिक मूल्य हैं वे स्पष्ट और अक्षुण्य है। आती-जाती सत्ताएं उन्हें बदलने की कोशिश तो करती हैं लेकिन बदल नहीं पातीं , हां नुक्सान जरूर पहुंचाती है।
बहरहाल अच्छा हुआ कि सरकार ने मान लिया की अयोध्या में बना राम मंदिर एक सरकारी उपलब्धि है। चूंकि मंदिर है और उसके प्रति आस्था का सैलाब यानि की हिस्टीरिया पैदा करने के लिए सरकार और सरकारी पार्टी ने अनथक प्रयास किया है इसलिए उसे उसका प्रतिसाद भी मिलेगा ,बल्कि मिलना शुरू हो गया है। चूंकि हम एक धर्मभीरु समाज से आते हैं जहां किसी अनगढ़ पत्थर पर भी यदि सिन्दूर पोतकर उसकी पूजा शुरू कर दी जाये तो वहां मेले लगने लगते हैं ऐसे में अयोध्या में तो करोड़ों रूपये खर्च कर हजारों की शहादत केबाद मंदिर बना है इसलिए उसकी प्रतिष्ठा तो बढ़ना ही है। बढ़ना भी चाहिए क्योंकि एक ठगी की व्यवस्था से निराश जनता आखिर जाएगी कहाँ ? उसे मंदिर चाहिए।
अब कांग्रेस माने या न माने लेकिन अयोध्या का राम मंदिर एक हकीकत है । आने वाले दिनों में इसे देश की धरोहर माना जाएगा ,ये बात अलग है कि इसका संचालन संतों-महंतों की कोई पारम्परिक पीठ न कर ,नागपुर में प्रशिक्षत लोग करें । लेकिन इससे कुछ फर्क पड़ने वाला नहीं है। यहाँ विराजे रामलला सब देख लेंगे। वे सब देख रहे है। यदि देश में उनके दोबारा आने के बाद रामराज न आया तो वे झूठे लोगों की खबर भी ले सकते हैं।

