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चलो, अब चार दिन टीकोत्सव मनाएं !

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सुसंस्कृति परिहार 

साहिब जी ने आव्हान किया है कि 11अप्रेल से 14अप्रेल तक पूरे चार दिन टीका दिवस मनाएं । उनके इस ख़्याल का स्वागत होना चाहिए अब तक यही होता भी रहा है समाज उद्धारकों के कद को जितना बौना किया जा सके वह भविष्य में हितकारी होगा यह कार्य संघ की मंशानुरूप भाजपा कर रही है ।राष्ट्रपिता गांधी जी जैसी महान शख्सियत को सफाई और ख़ासकर शौचालय तक केंद्रित कर दिया गया। गोडसे वादियों से और क्या अपेक्षाएं की जा सकती हैं?

इसी चतुराई से कम से कम ज्योतिबा फुले और भीमराव अम्बेडकर जी को वे इस बहाने याद भी कर लेंगे ताकि उनके अनुयायी नाराज़ ना हो जाएं और अपना काम भी सध जाए। जय भीम का नारा उन्हें कितना पसंद है हम सब भली-भांति जानते हैं ।उनकी नज़र में ज्योतिबा फुले की शिक्षा की पहल अब पुरानी पड़ गई आज तो शिक्षा लोगों को अराजक और आतंकी बना रही है इसीलिए बच्चों को परीक्षा एक उत्सव की तरह मनाने की नेक सलाह दी जाती है और कठिन प्रश्नों से पहले जूझने का विचार देकर उनका जीवन चौपट करने मन की बात होती है ।यानि शिक्षा और संविधान बीते कल की बात हो गई ।अब तो भई कोरोना काल है तो इन सब बातों को भुलाकर सिर्फ और सिर्फ टीके की ही बात हो । जिसमें टीकाकरण पर जोर हो।टीके के प्रचार हेतु नाच गान भी हो सकता है व्याख्यान भी  हो । चूंकि ये चार दिन टीकाकरण को समर्पित होंगे । इसलिए जम कर टीके लगाए जाएं ।इस  कार्यक्रम में किसी प्रकार की नकारात्मक टीका-टिप्पणी करने वाले को आमंत्रित करने की भूल बर्दाश्त नहीं होगी ।तो आइए इसे मनाने संकल्पित हों।विश्वगुरु माननीय मोदी जी ने कहा था कि..”कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है..!”सही बात है लेकिन भारत की हालत से हम सब वाकिफ हैं और संकट की इस घड़ी में आसमान की ओर..देख रहे हैं हमारे प्रदेश की माननीया मंत्री उषा ठाकुर जी हवाई अड्डे पर ही अहिल्या देवी का पूजा पाठ करने बैठ गईं । बेशक हल तो अब आसमानी ताकतें ही लायेंगी ।       

  तो आईए चलें आज से उत्सवोन्मुखी हो जाया जाए ।जी हां ,टीकोत्सव भी ताली ,थाली,शंख या हूटर बजाने जैसा ही पावन उत्सव है। चाहें तो आतिशबाजी भी कर सकते हैं , दीपमालाएं नहीं मोमबत्ती जला सकते हैं । सदियों से हमारे देश में अलाएं बलाएं भगाने के लिए ये प्रयोग होता रहा है । उत्तराखंड में तो भूत का आव्हान कर कोरोना को उड़न छू किया जा रहा है।उत्सव और उस दौरान होने वाले शोर में सब कुछ दब जाता है।देश में जब सतीप्रथा थी तब बाजे गाजे और सती माता के जयकारों में उसका आर्तनाद छुप जाता था और स्त्री का महिमा मंडन होता था उसके पति प्रेम के किस्से सदियों चलते थे ।बाजा गाजा शोर शराबे में कई कई  कराहें और चीखें दफ़न हो जाती हैं।           

 आज से शुरू होने वाले टीकोत्सव में भी ऐसी ही तकलीफ़े दफन होने वाली हैं आइए सरकार को पूर्व की तरह सहयोग करें । जिनमें रिमडेसीवर इंजेक्शनऔर वेंटिलेटर के अभाव में मरे , घरवालों की चीखती आवाज़े दफ़न हो जाएं । भारत की अच्छी तस्वीर ही बाहर पहुंचे।जो ख़ामियां हों वो उजागर ना होने पावें। आखिरकार विश्वगुरु भारत की ओर तमाम विश्व टकटकी लगाए खड़ा है । इस उत्सव में छुप जाऐगी वैक्सीन की कमी । इसमें उनका शोर भी शामिल है जो एक टीका लेने के बाद दूसरे टीके के लिए चक्कर काट रहे हैं ।दूसरे देशों को वैक्सीन देने वाला भारत आज अपने लोगों को उत्सव में झोंक कर झूठी तसल्ली दे रहा है । वस्तुस्थिति दूसरी ही है निजीकरण के परिणामस्वरूप ही देश में यह स्थिति बनी है काश कोई सरकारी कंपनी कोरोना वैक्सीन बनाती । बहरहाल,अपने टीके पर मुनाफ़े के बावजूद ‘भारी दबाव में आ चुका’  सीरम इंस्टीट्यूट  सरकार से 3,000 करोड़ का अनुदान मांग रहा है ताकि उत्पादन बढ़ा सके । सरकार का दायित्व है कि वह जनता से जोड़े और विश्व सहायता से प्राप्त राशि को खर्च कर टीके का उत्पादन बढ़वाए । 20 लाख करोड़ के कोरोना राहत पैकेज से इस महामारी की रोकथाम के लिये सहयोग जरूरी है।           

  ‌‌‌‌‌‌‌बहरहाल ,देश की प्रतिष्ठा का सवाल है इसलिए कृपया 11अप्रेल ज्योतिबाफुले और 14अप्रेल भीम राव अम्बेडकर को याद ना करते हुए टीकोत्सव मनाएं ताकि दुनिया में यह संदेश जाए सरकार कोरोना से डरती नहीं बल्कि उत्सव मनाते हुए जनता का टीके लगाने आव्हान कर रही है । आईए इसे सफल बनाएं और आपदा में अवसर का लाभ उठाने वाली कंपनियों का भी सहयोग कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में अमूल्य योगदान दें।आमीन ।

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