शशिकांत गुप्ते
सियासत मे नई संस्कृति का प्रचलन हुआ है। बुलडोजर संस्कृति,और रेवड़ी बांटो अभियान। बुलडोजर विशालकाय यंत्र है जो जमीन को समतल बनाने के लिए होता है। यह यंत्र किसानों के लिए उपयोगी होता है। दुर्भाग्य से बुलडोजर के साथ संस्कृति विशेषण जोड़ कर उसे लोगों के आशियानों को नेस्तनाबूत करने के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। यह कृत्य अमानवीयता का द्योतक है।
वैध है या अवैध की आशियानों की तस्दीक किए बगैर उन्हे नेस्तनाबूत करना अलोकतांत्रिक भी है। इसी अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को संस्कृति कहना ना सिर्फ हास्यास्पद है,बल्कि तानाशाही प्रवृत्ति की पुष्टि करता है?
रेवड़ी बांटों अभियान भी,अप्रत्यक्ष रूप से देश की आर्थिक नीति को खोखला करता है। इस तरह के थोथे अभियान के लिए यह कहावत प्रचलित है। अंधा बांटता रेवाड़ी,फिर-फिर अपनो को दे।
इस तरह रेवड़ियां बांटने का नतीजा होता है जो शायर अहमद फ़राज़ अपने शेर में फरमाते हैं
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
इनदिनों सियासत में रेवड़ी बांटों अभियान में प्रतिस्पर्धा चल रही है। देश की आर्थिक स्थिति को कौन कितना खोखला करता है?
सियासत में रेवड़ियां बांटने वाले आखों से अंधे नाम नयन सुख हैं।
कोई कहता है हम किसी से कम नहीं कोई कहता है,हमारे हाथों झाड़ू है इसलिए हम हैं कमाल के दल दल में खिलने वाले फूल पर साक्षात लक्ष्मीजी भारी भरकम स्वर्ण गहनों का धारण कर खड़ी है। इसी फूल के सहारे आमजन को इंग्लिश का fool बनाने वालों के लिए इतना कहना पर्याप्त है।
एक से बढ़कर एक हैं।
आमजन की बेसब्री की इंतहा हो गई है।
इस संदर्भ में शायर फ़ना निज़ामी कानपुरी
तेरे वा’दों पे कहाँ तक मेंरा दिल फ़रेब खाए
कोई ऐसा कर बहाना मिरी आस टूट जाए
इतना सब कहने के बाद यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब सब्र का बांध टूट जाता है,तब आवाम क्या कहती है।
शायर साहिर लुधियानवी का ये शेर मौजू है।
हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
आवाम की इम्तिहान का यही नतीजा होता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

