शशिकांत गुप्ते
एक सूक्ति पढ़ी है,सच कड़वा होता है यहां कड़वा शब्द से तात्पर्य है, कड़वा पदार्थ आसानी से हलक में उतरता नहीं हैं।
सच का कड़वा होना अर्थात सच वो दवाई है,जो अंतर्मन में निहित झूठ के कीटाणुओं को नष्ट करती है।
झूठ के कीटाणु स्वयंभू होते हैं।
उक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि, सच जरूर कड़वा होता है,लेकिन झूठ कभी भी मीठा हो ही नहीं सकता है।
आज से लगभग छः सौ वर्ष पूर्व संत कबीर साहब ने अपनी रचना में कहा,संतो देखत जग बौराना।( बौराना=पागल)
साँच कहौं तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना
अर्थात सच बोलने तो लोग मारने दौड़ेंगे। झूठ पर विश्वास करेंगे।
इसी बात को शायर वसीम बरेलवी अपने शेर में यूं बयां करते हैं।
झूट वाले कहीं से कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता रह गया
आज के संदर्भ में उक्त शेर एकदम सटीक है।
आज तो सच बोलना भी गुनाह हो रहा है।
सच कितना कड़वा हो सकता है।
यह शायर हफ़ीज़ मेरठी अपने शेर में इस तरह फरमाते हैं।
रात को रात कह दिया मैं ने
सुनते ही बौखला गई दुनिया
फिल्मों में प्रेमी प्रमिकाओं के लिए ऐसे कल्पनातीत गीत लिखे जातें हैं।
जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे
तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे
फिल्मों में सब कल्पनातीत होता है।
यथार्थ में तो सच बोलने वालों को शायर अंजुम रूमानी सलाह देते हुए आगाह करतें हैं।
सच के सौदे में न पड़ना कि ख़सारा होगा
जो हुआ हाल हमारा सो तुम्हारा होगा
( ख़सारा = नुकसान)
यह भी उतना ही सच है कि,
जो सत्य की राह पर चलते हैं,वे हमेशा सर पर कफ़न बांधें रहते हैं।
ऐसे व्यक्तियों के लिए शायर आबिद अदीब का यह शेर एकदम मौंजू है।
जिन्हें ये फ़िक्र नहीं सर रहे न रहे
वो सच ही कहते हैं जब बोलने पे आते हैं
गांधीजी ने कहा है, कि सत्य ही ईश्वर है।
सत्य ही आत्मविश्वास है।
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले,तानाशाही प्रवृत्ति का विरोध करने वाले,और सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक,सांस्कृतिक हर क्षेत्र में परिवर्तन के लिए संघर्ष करने वाले निम्न नारा बुलंद करते हैं।
सच कहना अगर बगावत है?
तो समझों हम भी बागी है
अंत में यही कहा जाएगा की
सत्य मेव जयते।
सत्य परेशान हो सकता है,लेकिन सत्य कभी भी पराजित नहीं होता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

