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*गाँव से शहर तक : ज़िंदगी हर दिन नया पाठ पढ़ाती है*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

सिंह साहेब आप कौन सी लेंगे ?

हरदा म.प्र.)  शाखा का आडित करने के बाद, हम सतना जिला के पास की दूसरी शाखा(नाम याद नहीं है)  का आडिट करने पहँच चुके थे।  शाखा कारोबार के हिसाब से काफी छोटी थी फिर एक सप्ताह का समय तो उस शाखा का आडिट करने में लग ही गया। यहाँ भी पी. डी. शर्मा जी के साथ ही था। दरअसल हुआ यूं था कि जब मुझे पी. डी. शर्मा जी के साथ अटैच किया गया तो शर्मा जी अपने पहले वाले असिस्टेंट के काम से संतुष्ट नहीं थे, सो शर्मा जी ने जब एक-दो शाखाओं में मेरा काम देखा तो उन्होंने पहले वाले असिसटेंट को लखनऊ आफिस इस निवेदन के साथ  वापस कर दिया कि जब तक मैं आडिट विभाग में हूँ, तब तक टी.पी. सिंह को मेरे साथ ही रखा जाय। हुआ भी ऐसा ही कि जब तक शर्मा जी अपनी मात्र शाखा/आफिस को वापस नहीं गए, मैं उनके साथ ही अटैच रहा।

यहां शाखा प्रबंधक नें हम दोनों के रहने का इंतजाम अपने घर पर ही कर दिया था क्योंकि वह छोटी जगह थी कि किसी होटल अथवा धर्मशाला की व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। खाने के व्यवस्था भी शाखा प्रबंधक ने अपने घर पर करा दिया था। लगभग एक सप्ताह के ठहराव के चलते अपनेपन का जनम्ना व्यावहारिक है किंतु काम के वक्त यह अपनापन जैसे दूर चला जाता है। एक दिन शाखा प्रबंधक ने रविवार के दिन मुझसे कहा कि आज आप हमारे साथ खाना खाने हमारे साथ ‘सतना’ चलना। सो शाखा प्रबंधक, मैं और उनका एक और साथी सतना के अच्छे से रेस्ट्रा में पहुँच गए। खाने की टेबिल पर विराजमान हो गए। अब उन्होंने मुझसे पूछा कि सिंह साहेब आप कौन सी लोगे। मैं सकपकाकर उनके मुंह की ओर प्रश्नसूचक आँखों से उनकी ओर देखने लगा। मैंने कहा कि सर! मैं समझा नहीं। अरे! वाइन लोगे या बीयर, शाखा प्रबंधक ने कहा। मेरे मना करने पर उन्होंने दूसरे साथी की ओर देखकर कहा, ‘यार यहाँ आना तो बेकार ही हो गया।“ मैंने कहा कि सर! आप लीजिए न…मैं आपका साथ देने के लिए लिमका ले लूंगा। वो मेरे मुंह की ओर ऐसे देखने लगे कि जैसे अब उनके लिए अजनबी थी। दरअसल वो बनिया वर्ग से थे और घोषित तौर पर शाकाहारी थे, शायद उनके मन में ये डर रहा होगा कि कहीं मैं वापस होने पर उअंकी पत्नी को इस बारे मे कुछ न बतादूँ। आखिर उन्होंने मुझ से कह ही दिया कि सिंह साहब वापस लौटने यहाँ की सच्चाई अपनी भाभी को मत बता देना। मैं हां मॆं गर्दन हिला दी और इस तरह पहले पीने का सिलसिला शुरू हो गया। अब खाने की बारी थी सो मैंने पहले ही कह दिया कि सर! मेरे लिए तो दाल-रोटी मंगा देना, जो आपका मन करे वो आप बेझिझक खाइए। उन्होंने चिकिन –रोटी खाई और मैंने दाल-रोटी। वापस शाखा में लौट आए। शाखा के ऊपर ही उनका निवास था। मैं तो सामान्य अवस्था में था किंतु उनके  चेहरे पर अभी भी वही डर साफ झलक रहा था कि कहीं मैं उनकी पत्नी को कुछ न बता दूं। खैर! थोडी देर में सब कुछ सामान्य हो गया।

      अब आप सोच रहे होंगे कि ये कहानी भी कोई बताने लायक है। लेकिन है… वह इसलिए कि आमतौर पर निचले और गरीब वर्ग पर मांसाहारी होने का आरोप लगाया जाता रहा है जबकि यह बात कतई भी सच नहीं है। सच है ये कि तथाकथिक शाकाहारी घर में शाकाहारी और घर  से बाहर मांसाहारी होते हैं। और जितने भी ओछे और निम्न श्रेणी के काम/व्यवहार होते हैं वो गरीबों और निचले स्तर के लोगों के पथ्थे मढ़ दिये जाते हैं।

जब ‘पन्ना’ स्थित शर्मा जी के घर पर पहुँचे तो

एक अवसर आया कि जब हम ‘पन्ना’ स्थिति शर्मा के घर  चले गए तो पता चला कि उस समय घर पर केवल उनकी माता जी ही थीं। बिल्कुल मेरी मां जैसी, छोटा कद गोरा बदन और मृदु भाषी। उल्लेखनीय है कि पन्ना हीरों की खानों के लिए तो जाना ही जाता है, साथ ही साथ यहाँ के बड़े-बड़े मंदिर पुरातन कसीदाकारी के लिए भी जाने जाते हैं। पन्ना में हमे तीन-चार दिन ही रुकना था। इसलिए शर्मा जी ने मुझे पन्ना के आस-पास के दर्शनीय स्थानों/मंदिरों को दिखाने का मन बना लिया था। पहला ही दिन था कि शर्मा जी ने सुबह-सवेरे स्नान व नास्ता करने के बाद मुझे  पन्ना के मंदिरों को देखने के लिए चलने के लिए कहा तो मैंने उनसे सादर मंदिर न जाने को मना कर दिया। अब क्यूंकि शर्मा जी धर्म-कर्म के बारे में मेरी मानसिकता से परिचित थे ही, अत: उन्होंने तुरंत ही कहा, अच्छा चल तो सही…मंदिर में किसी प्रकार की पूजा-वूजा मत करना किंतु मंदिरों के निर्माण और उनमें हुई नक्काशी को तो देख ही सकता है। खैर! हम दोनों मंदिरों को देखने के लिए चले गए। सच जानिए वहां के मंदिरों के निर्माण की तकनीकी और उनमें हुई रंग-बिरंगी नक्काशी बाकमाल थी।

पन्ना में घूमने-फिरने के बाद दोपहर बाद वापस घर आ गए। खाना-पीना हुआ और आपस में बातचीत करते-करते सो गए। सुबह हुई, नहाना-धोना हुआ, खाना खाया। थोड़ी देर बाद शर्मा जी ने कहा कि चल आज तुझे खजुराहो के मंदिर दिखा कर लाता हूँ। मैंने इस हेतु तुरंत ही हाँ करदी। तो अम्मा ने मुझपर एक करारा व्यंग्य कसते हुए कहा,” देखा! कल मंदिर जाने को तो मना कर रहा था और आज खजुराहो के मंदिर देखने को तुरंत हाँ करदी।“ शर्मा जी ने अम्मा से कहा,’ अम्मा! कोई बात नहीं, इसकी सोच सीधे-सीधे आम आदमी के दुख-दर्द से जुड़ी हुई है। और परंपराओं का पूरी तरह हामीदार नहीं है। ये कुछ ऐसे अजीब काम करता रहता है कि मुझे स्टाफ के लोगों से खुद कहना पड़ता है कि ये जो कुछ भी कर रहा है, इसे करने दो। खैर! हम खजुराहो के मंदिर देखने चले गए। उन मंदिरों की नक्काशी कुछ इस .प्रकार की है कि कोई भी  व्यक्ति किसी दूसर आदमी को बोल कर बताने में सकपकाएगा जरूर।  उन मंदिरों की कलाकृतियों  की कामुकता को देखते हुए अश्लील कहें या फिर समाज के लिए अप्रत्यक्ष सीख। मैंने वहाँ से कुछ किताबें भी खरीदीं। उनमें एक थी “ खजुराहो  की अतिरूपा” जो खजुराहो के मंदिरों के निर्माण की आधार वस्तु और इनके निर्मण के पीछे के कारणों को एक उपन्यासिक कहानी के जरिए बड़े ही सलीके सहज और सरल तरीके से पाठकों के सामने रखा गया है।  

दरअसल मैं मंदिरों का बचपन से ही समर्थक नहीं रहा। और सच तो यह है कि मुझे किसी ने मंदिरों के खिलाफ न तो उकसाया था और न ही मेरे घर वाले कभी मंदिर नहीं जाते थे। हाँ! होली-दीवाली जैसे त्योहारों को गाँव के सभी लोग मिलजुलकर जरूर मनाते थे। इस प्रकार की धर्म विरोधी मानसिकता प्राकृतिक ही थी। हाँ! आज इन मंदिरों की असिलियत को जान कुछ-कुछ जान पाया हूँ। ओशो कहते हैं – जिसे आप मंदिर कहते हैं, वह आपकी दुकान के आस-पास की एक बड़ी दुकान है। वहाँ भी व्यापार के वही नियम काम कर रहे हैं। धर्म गुरु जनता के बिना नहीं हो सकता।  अगर जनता नहीं तो धर्म गुरु कैसे हो सकते हैं? धर्म गुरु होने के लिए आपके जैसा होना ज़रूरी है। आपका गणित, आपका हिसाब-किताब, आपके दिमाग का कारोबार, आपका मंदिर आपके जैसा है। ध्यान रहे, आपका मंदिर आपका है, भगवान का नहीं। तुमने ही बनाया है। और जो मूर्ति तुमने स्थापित की है, वह तुम्हारी द्वारा ही बनाई गई मूर्ति होगी। तुम उस भगवान की मूर्ति कैसे बना सकते हो जिसे आपने देखा ही नहीं। जिस मूर्ति के आगे तुम झुकते हो,  वो आदमी की कल्पना है। परमात्मा की कोई मूर्ति बनाने की जरूरत नहीं है। तुम्हारे भीतर भगवान की एक काल्पनिक मूर्ति बन गई है जो तुम्हें बाहर का कुछ देखने ही नहीं देती और आप ही ऐसा करने की जरूरत समझते हैं क्योंकि जन्म से दूध की बूंदों के साथ तुम्हें धर्म और जाति की घुट्टी जो पिला दी जाती है। तुम्हारे भीतर झुकने की कला कामयम हो गई है। जिस दिन तुम अपने भीतर झुकोगे और खुद को पहचानोगे, उसी दिन तुम मंदिर के सामने खड़े हो सकोगे। जिस दिन तुम्हारा मन भीतर से टूटेगा, तुम्हारा अहंकार भी गिरेगा। तब तुम पाओगे कि मंदिर तो सदा से तुम्हारे भीतर था। खैर! अब हमें यहाँ से हमें मध्य प्रदेश की ही अगली शाखा सांवेर  में जाना था। मैं यहाँ से पहले अपने पैत्रिक गाँव बच्चों मिलने गया और वहाँ से सीधे सांवेर के लिए रवाना हो गया।

जब सांवेर (म.प्र.)  शाखा में गए तो…

सांवेर भारत इंदौर के पास एक तहसील स्तर का नगर है। जिस दिन से हमें सांवेर शाखा का निरीक्षण करना था, मैं उससे पहले ही दोपहर बाद सांवेर पहुँच गया था। कारण कि मैं सीधे अपने पैत्रिक गाँव से सीधे सांवेर आ गया किंतु शर्मा जी अभी तक नहीं आए थे। अब मेरे सामने रात को रुकने की समस्या थी। आडिट कार्य की बाध्यता के चलते मैं शाखा में जा नहीं सकता था क्योंकि अगले दिन शाखा के खुलने  पर हमें खजाने की चाबियां अपने कब्जे में करनी होती थी। 1981 में सांवेर कोई होटल आदि की व्यवस्था न  थी। पूछने पर पता चला कि  वहाँ एक सरकारी गेस्ट हाउस है। मैं गेस्ट हाउस पहुँचा तो गेट कीपर ने कोई कमरा खाली न होने की बात कही तो मैं सीधे वहाँ के इंचार्ज के पास चला गया। अपने को छुपाते हुए अपने बारे में जो सूचना मैं उनको दे सकता था, दे दी गईं। इंचार्ज नें गेट कीपर को बुलाया और मेरा सामान अमुक कमरे में रखने के लिए कहा तो गेट कीपर नें फिर कमरा पहले से ही बुक होने की बात कही। इंचार्ज ने पूछा, वो अभी तक आए तो नहीं है न? यदि नहीं तो इनका सामान उसमे रखवा दो\ इस तरह रात के रुकने का जुगाड़ तो हो गया।

एक दिन था कि मैं और शाखा के फील्ड आफीसर किसी गाँव में निरीक्षण हेतु जीप में गए थे तो बीच रास्ते में मुख्य सड़क के एक किनारे एक पंजाबी ढाबा देखा। मैंने मन ही मन सोचा कि लौटते हुए इसी ढाबे पर लंच करेंगे। मैंने लौटते समय साथी अधिकारी से उस ढाबे पर जीप रुकवाने के लिए कहा। जीपे रुक गई और हम उस पंजाबी ढाबे पर पहुँच गए। देखा कि उस ढाबे के मालिक एक सरदार जी थे। उन्होंने हमें पंजाबी भाषा में संबोधित करते हुए हमसे पूछा – दस्सो बास्साओ कि सेवा करा? कित्थों आए हो तुसी? मैंने भी उत्तफाकन पंजाबी भाषा में ही जवाब दिया- दिल्ले तौं। वैसे मैं पंजाबी समझने में तो  ठीक-ठाक था किंतु बोलने में हाथ तंग था। कोई बात नहीं। मेरा जवाब सुनकर सरदार जी बहुत ही खुश हुए। सर्दियों के दिन थे सो मैंने मक्के की रोटी और सरसों का साग खाने की गुजारिश की। सरदार जी ने साग तो जरूर काउंटर पर रखे एक बड़े से भगोने से लिया किंतु तड़का अपने पत्नी से घर के चूल्हें पर लगवाया। इतना ही नहीं, रोटियाँ भी अपने पत्नी से ही बनवाईं। सरदार जी ने बड़े ही प्यार से खाना खिलाया। हमारे चलने का समय आया। सो मैंने सरदार जी से खाने के पैसे पूछे। सरदार जी बड़े ही प्यार और उत्तेजित होकर बोले, ‘ कि बात करते हो बास्सा… अपनों से पैसे कैसे… इत्थे अपने पिण्ड तौं आता ही कौन है… बहुत दिनों बाद आप लोग आएं हैं फिर खाने के पैसे कैसे? नहीं बास्साओ, नहीं कोई पैसे नहीं….फिर मौका लगे तो जरूर आना तुसी। आखिरकार सरदार जी नें हमसे खाने के पैसे लिए ही नहीं। हम सरदार जी को धन्यवाद देते हुए ढाबे से सांवेर के लिए रवाना हो गए। जीप में बैठा-बैठा मन ही मन सोचने लगा कि क्या कमाल हमारी मिली जुली संस्कृति में घर से दूर देश निकलिए तो घर-गाँव वालों से ही नहीं, अपने प्रदेश के लोगों से बिना किसी भेदभाव के अटूट प्रेम और अपनापन जाग उठता है।

यदि किसी को घर से दूर लम्बे अरसे तक रहना हो तो उसे यदि कोई अपने घर पर खाने के लिए निमंत्रित करता है तो बहुत ही अच्छा लगता है वो ही हालत हमारी थी। मैं तो बैंक स्टाफ के साथ ही लंच किया करता था किंतु शर्मा जी कोई न कोई वृत रखने के बहाने शाखा प्रबंधक से वृत खोलने के लिए रोज अलग-अलग खाना मंगा ही लेते थे। इस क्रम में एक दिन फील्ड आफीसर ने शाम के भोजन पर अपने निवास पर बुलाया। खाना खा कर शर्मा जी कब लौटे पता नहीं, मैं सो चुका था। अगले दिन शाखा खुली और हम काम पर लग गए। दिन के करीब बारह ही बजे होंगे कि फील्ड आफीसर मेरे पास आकर बैठते ही रोने लगे। पूछ्ने पर उन्होंने मुझे बताया कि शर्मा जी ( इंस्पेक्टर) ने उन्हें किसी बात पर ऐसी डाँट लगाई जिसकी फील्ड आफीसर को कतई अपेक्षा न थी। दरअसल फील्ड आफीसर शर्मा जी से ज्यादा ही पेर्सोनल हो गए थे जो आफिस प्रोटोकाल के विरुद्ध था। रोते-रोते फील्ड आफीसर ने मुझसे कहा कि शर्मा जी से मुझे ऐसी व्यवहार कि अपेक्षा नहीं थी, आखिर कल हमने मेरे घर पर साथ-साथ खाना खाया था। इनकी बात सुनकर मुझे भी अक्छा नहीं लगा। फील्ड आफीसर का इस प्रकार का तर्क निहायत ही घटिया स्तर का था। मैंने उनसे सवाल किया – क्या आपको घर और आफिस में कोई अंतर दिखाई नहीं देता? इतना सुनकर वह चुप रह गए। फिर मैंने उन्हें बताया कि मैंऔर शर्मा जी चौबीस घंटे साथ-साथ रहते हैं किंतु हम आफिस और घर में अंतर करके चलते है। आफीस में हम यथायोग्य प्रोटोकाल का पालन करते हैं और घर पर हम बाप-बेटे की तरह रहते हैं। आप एक ही दिन खाना खिलाकर आफीसियल प्रोटोकाल को भूल गए? क्या ये सही है? वे इस पर चुप होकर रह गए। मैंने फिर उनसे कहा कि शर्मा जी दूसरे इंस्पेक्टर्स की तरह नहीं हैं। वे  बहुत ही नर्म दिल के हैं। उठो! और उनके पास जाकर खुले मन से ‘सौरी’ कहदो, वे सबकुछ भूल जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही।

सांवेर शाखा में लगभग एक महीने का समय लगना था। मैं और शर्मा जी रात को अलग-अलग कमरे में रहते थे। इसलिए मेरे पास कुछ समय एकांत में गुजारना होता था। तो मैंने इस समय का सदुपयोग करते हुए कुछ बाल कविताएं लिख मारीं और उनमें दो कविताएं डाक के जरिए इंदौर से प्रकाशित ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशनार्थ भेज दीं। लगभग एक सप्ताह बाद अखबार ने मेरी कविताओं को तथास्थान प्रकाशित करदीं। शाखा में यह अखबार आता था। शर्मा जी को काम शुरू करने से पहले अखबार पढ़ने में बिताते थे। अनायास ही उनकी नजर उन कविताओं पर पड़ी और मेरा नाम पढ़कर उन्होंने तुरंत मुझे बुलाया और मुझसे पूछा कि क्या ये कविताएं तुम्हारी है। मैंने ‘हाँ’ जवाब दिया तो उन्होंने कहा, अच्छा! तुम कविताए भी लिखते हो?’ तदुपरांत उन्होंने वो कविताएं शाखा प्रबंधक को भी पढवाईं । फिर क्या था ये खबर पूरी शाखा में फैल गई। हुआ यूं कि इसके बाद शाखा-स्टाफ के लिए मैं महज निरीक्षक सहायक ही नहीं रह गया था अपितु लेखक भी हो गया था। इसका परिणाम यह भी हुआ कि शाखा के स्टाफ का नजरिया मेरे प्रति और भी प्रगाढ़ हो गया।

जैसा कि मैंने ऊपर बताया था कि कृषि ऋणों का निरीक्षण तो मैंने किया था। किंतु लघु उद्योंग ऋणों संबंधित यूनिट्स का निरिक्षण स्वयं शर्मा जी को करना था। एक दिन यूं हुआ कि उन्होंने एक खादी कपड़ों की बुनाई करने वाली एक यूनिट का निरिक्षण किया तो फैक्ट्री मालिक नें उन्हें उत्तम खादी की चार चादरें भेंट स्वरूप प्रदान की। दो शर्मा जी के लिए और दो मेरे लिए। शर्मा जी लौटकर आए तो वो चादरें मुझे देने लगे। मैंने उस चादरों के बारे में कई सवाल किए तो शर्मा जी बोले, ले! चुपचाप रखले…उन्होंने खुद अपनी मर्जी से दी हैं, मैंने मांगी थोड़ी थी। खैर! साहब से ज्यादा बहस करने का तो सवाल ही नहीं था, मैंने वो चादरें अपने पास रखली और रात को तकिये के नीचे रखकर सो गया। सुबह को जब सोकर उठा और बिस्तर को ठिकाने लगाने लगा तो देखा कि दोनों चादरें चूहों ने काट दी थीं। उन्हें देखकर मैं मन ही मन बहुत दुखी हुआ कि आखिर मैंने चादरें ली ही क्यों? शर्मा जी शाखा में आए तो मैंने वे चादरें मैंने उन्हें दिखाईं तो वो अफसोस मनाने के अलावा कर ही क्या सकते थे। शर्मा जी से मुखातिब होते हुए मैंने उनसे कहा, ‘सर! मैंने पहले ही कहा था कि मुझे फोकट का कोई भी सामान नही फलता।‘ इतना सुनकर वो चुपचाप अपनी सीट पर चले गए और आइंदा इस प्रकार का कोई सामान मेरे लिए न लेने का निर्णय कर लिया। इस घटना ने मुझे शर्मा जी के हृदय में और भी गहरे तक पहूंचा दिया था।   

आमतौर पर माना जाता है कि आडिट स्टाफ को जितना मान-सम्मान मिलता है, वैसा अन्य किसी को नहीं मिलता। इस बात से सहमती भी जताई जा सकती है किंतु आडिट स्टाफ के सामने कई प्रकार के खतरे भी होते हैं, यह बात भी हकीकत परे नहीं है। इस सत्य प्रमाण हमें इस शाखा में देखने को मिला। अब शाखा का काम पूरा होने को था। आज शाखा प्रबंधक को शाखा की आडिट रिपोर्ट सौंपने का दिन था। अब जब शाखा की आडिट रिपोर्ट को रेटिंग देने का बात उठी तो शर्मा जी ने मुझे एक राज की बात बताई कि इस शाखा में जो-जो खामियां मिली हैं, उनके आधार पर को अच्छी रेटिंग देना तो बनता ही नहीं है किंतु शाखा के एक कर्मचारी ने मुझे संकेत दिया है कि शाखा प्रबंधक को मैंने किसी से बात करते  हुए सुना है कि यदि इन्होंने शाखा को अच्छी रेटिंग नहीं दी तो ये जाएंगे तो पड़ोस के रेलवे स्टेशन से ही। यह एक तरह की धमकी ही थी सो शर्मा जी ने मन बनाया कि इस शाखा की रिपोर्ट व्यक्तिगत रूप से न थमाकर, डाक के जरिए भेज देंगे। इतना सुनकर मैंने शर्मा जी से कहा, ‘नहीं सर!… अब तो रिपोर्ट शाखा प्रबंधक को ही सौंपेंगे। कुछ आनाकानी के साथ शर्मा जी ने मेरी बात को मान ही लिया और बोले तो कल सुबह यहाँ  से जाते हुए ही देंगे रिपोर्ट। मैंने उसी शाम को ही रिपोर्ट टाइप करके तैयार करदी थी। खाना खाकर थोड़ा चहल-कदमी की और सो गए। अगला दिन आया । शाखा में पहुँच गए, नाश्ता-पानी किया और शाखा प्रबंधक को रिपोर्ट सौंपते हुए मैंने शाखा प्रबंधक से कहा, ‘ Sir congratulations, your branch has been  rated as “satisfactorily Run”, please try to upgrade it.’ शाखा प्रबंधक महोदय ने मूछों-मूछों में मुस्कराने का दिखावा किया और  सांस खींचकर रह गए।

      हमने शाखा कर्मियों से विदा ली और स्टेशन की ओर रवाना हुए तो शर्मा जी नें मुझसे कुछ नाराजगी जताई कि तुमने ब्रांच मैनेजर को रेटिंग के बारे में बताकर ठीक नहीं किया। वो ठीक आदमी नहीं है। कहीं कुछ उल्टा-सीधा न कर बैठे। मैंने शर्मा जी से कहा कि आप कोई चिंता न करें। अब हमें वो विदा करने भी नहीं आएंगे। हुआ भी ऐसा ही। हमने स्टेशन जाकर ट्रेन पकड़ी और अगली शाखा के लिए रवाना हो गए। ट्रेन में बैठने के कुछ देर बाद शर्मा जी ने मेरी कमर पर धीरे सें धौल जमाई और बोले, ‘ बुहत खूब – मान गया तेरी बेखौफ हरकत को।‘   0000

(लेखक : वरिष्ठ कवि/लेखक/आलोचक तेजपाल सिंह तेज एक बैंकर रहे हैं। वे  साहित्यिक क्षेत्र में एक प्रमुख लेखक, कवि और ग़ज़लकार के रूप ख्यातिलब्ध हैं। उनके जीवन में ऐसी अनेक कहानियां हैं जिन्होंने उनको जीना सिखाया। उनके जीवन में अनेक यादगार पल थे, जिनको शब्द देने का उनका ये एक अनूठा प्रयास है। उन्होंने एक दलित के रूप में समाज में व्याप्त गैर-बराबरी  और भेदभाव को भी महसूस किया और उसे अपने साहित्य में भी उकेरा है। वह अपनी प्रोफेशनल मान्यताओं और सामाजिक दायित्व के प्रति हमेशा सजग रहे हैं। इस लेख में उन्होंने अपने जीवन के कुछ उन दिनों को याद किया है, जब वो दिल्ली में नौकरी के लिए संघर्षरत थे। अब तक उनकी दो दर्जन से भी ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार (1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं। अगस्त 2009 में  भारतीय स्टेट बैंक से उपप्रबंधक पद से सेवा निवृत्त होकर आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं।)

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