डॉ. विकास मानव
_सुपर सत्ता चैतन्यता का शिखर है और हम चेतन प्राणी. अपनी चेतना का विकास करते हुए जब तक हम चैतन्य अवस्था में नहीं पहुँच जाते तब तक दैहिक-भौतिक-दैविक तापों से और जन्म-मरण की अनवरतता से मुक्ति संभव नहीं है. इसके लिए सबसे प्राथमिक कदम है जन्म और मृत्यु क़ो समझना. अपने शरीर क़ो बचपन से कफ़न तक का सफ़रमात्र कराना जीवनयात्रा नहीं, मृत्युयात्रा है. जीवनयात्रा खुद क़ो जाने और जीए बिना संभव नहीं. ध्यान और समग्र प्रेम मार्ग बनता है. व्हाट्सप्प 9997741245 पर हमसे कनेक्ट होकर आप खुद को पाने-जीने-अनुभव करने की चाबी अर्जित कर सकते हैं -- बिना कुछ दिए. यहां जन्म और मृत्यु के बारे में जानिए._
*जीवितो यस्य कैवल्यम् विदेहो$पि स केवलः।*
समाधि निष्ठतामेत्य निर्विकल्पो भवानघ:।।
जिसको जीवन काल में ही ‘कैवल्य’ उपलब्ध् हो गया है, वह शरीर सहित होने पर भी ब्रह्मरूप रहेगा।इसलिये समाधिष्ठ होकर सभी प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाना चाहिए।
उपनिषद के इस श्लोक में कितना गूढ़ अर्थ छिपा हुआ है। वास्तव में मनुष्य का जीवन कितना मूल्यवान है ? लौकिक और पारलौकिक दृष्टि से जो कुछ मनुष्य को पाने योग्य वस्तु है, उसे जीवन के रहते ही पाया जा सकता है। लेकिन ऐसे बहुत से व्यक्ति भी हैं जो मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा करते हैं। उनका कहना है कि इस संसार में, इस शरीर में रहते हुए मुक्ति को, ब्रह्म को नहीं प्राप्त किया जा सकता। यह सब मृत्यु के बाद ही सम्भव है।
जो लोग ऐसा सोचते हैं, वास्तव में वे भारी भ्रम में हैं। सच बात तो यह है कि जो जीवन के रहते नहीं पाया जा सकता, वह मृत्यु के बाद भी नहीं पाया जा सकता।
मनुष्य का जीवन एक अवसर है–एक स्वर्णिम अवसर, शीघ्र फिर न प्राप्त होने वाला अवसर। यह हमारे ऊपर निर्भर है कि इस अवसर को चाहे जैसे गँवा दें। नौकरी-व्यापार करके, धन-दौलत इकठ्ठा करके, मान-प्रतिष्ठा अर्जित करके गँवा दें, चाहे चोरी-डकैती, व्यभिचार करके गँवा दें अथवा चाहें तो पूजा-पाठ, ध्यान-धारणा तथा सत्य की खोज में बिता दें। जीवन एक ‘तटस्थ’ अवसर है।
हमें क्या करना है, क्या पाना है, क्या बनना है ?–इन सबसे जीवन का कोई मतलब नहीं। हम कुछ भी करें, जीवन हमें रोकेगा नहीं। जो लोग यह सोचते हैं कि जीवन संसार के लिए है, भोग के लिए है तो वे अपने को धोखा देते हैं।
मृत्यु अवसर नहीं है। मृत्यु तो है अवसर की समाप्ति। मृत्यु का मतलब है कि अब कोई अवसर नहीं बचा। अवसर समाप्त हो गया। मृत्यु से कुछ पाया नहीं जा सकता। कुछ पाने के लिए अवसर चाहिए और वह अवसर है–एकमात्र ‘जीवन’।
प्रायः यह देखा जाता है कि जब कोई व्यक्ति मर रहा होता है तो लोग उसके कान में गायत्री मन्त्र पढ़ते हैं, गीता-रामायण सुनाते हैं, राम-नारायण का नाम फूंकते हैं। यह कितनी ना-समझी की बात है।
वे गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, राम नाम फूंकते हैं मगर उसे कुछ सुनाई ही नहीं पड़ता होता।
मृत्यु के समय सारी इन्द्रियां जवाब दे रही होती हैं, आँखें देखना बन्द कर् देती हैं, कान सुनना बन्द कर् देते है, मुंह बोलना बन्द कर् देता है, वाणी अवरुद्ध हो जाती है, प्राण धीरे-धीरे लीन होने लगते हैं अपने मूल बीज में।
उस स्थिति में मरने वाला व्यक्ति क्या गायत्री मंत्र सुन सकेगा ? राम-नाम का उच्चारण समझ जायेगा ? लेकिन लोग हैं कि सुनाए चले जाते हैं, गीता-पाठ किये चले जाते हैं।
एक धर्म ग्रन्थ में आया है कि एक अत्यंत पापी व्यक्ति मर रहा था। उसके लडके का नाम नारायण था। मरते समय वह जोर-जोर से अपने लडके को पुकारने लगा। वह चाहता था कि वह अपने बेटे को ठीक से समझा दे कि व्यापार कैसे किया जाता है, उसमें छल-प्रपंच कैसे करके व्यापार बढ़ाया जाता है ? लोगों को कैसे ठगा जाता है ? मगर बेटा तो नहीं आया। आ गए धोखे से बैकुंठ से नारायण और उस पापी को नर्क में भेजने के बजाय अपने साथ स्वर्ग ले गए।
उस पापी को स्वयम् आश्चर्य हुआ वह कैसे आ गया स्वर्ग में ? लेकिन धर्म ग्रंथ कहता है कि उसने जो नारायण का नाम लिया था, इसीलिये स्वर्ग मिल गया।
कितनी मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद बात है यह ! कितना धोखा भरा है इस कथा में ? धोखे से यदि नारायण आते हैं तो नारायण भी धोखे के ही होंगे और वह स्वर्ग भी नकली ही होगा। इसी तरह की मूर्खतापूर्ण कथाओं ने लोगों को भरमा रखा है। जीवन में इस तरह से अपने को धोखे में नहीं रखना चाहिए।
हमने जीवन में रहते हुए यदि अपने आपको जान-समझ लिया तो मृत्यु के बाद शरीर न रहते हुए भी हम ब्रह्मरूप रहेंगे। हमारी आत्मशरीर में स्थिति रहेगी।
मतलब यह कि योग-शास्त्र के अनुसार जिसको जीवितावस्था में ही ‘कैवल्य’ की प्राप्ति हो गयी, वह देहरहित होकर ब्रह्मरूप ही रहेगा। ब्रह्मरूप का मतलब है–‘कैवल्य’। और कैवल्य का मतलब है–‘केवल हम’।
जिस व्यक्ति ने केवल ‘मैं देह हूँ’–इतना ही जाना हो, देह को ही सब कुछ मान लिया हो, उसकी मृत्यु निश्चय ही बेहोशी की अवस्था में होगी। मृत्यु के समय वह मूर्छित हो जायेगा। उसकी सारी इन्द्रियां काम करना बन्द कर् देंगी। उनका ज्ञान भी लुप्त हो जायेगा। ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो मृत्यु के समय होश में हैं। बहुत कम लोग हैं जो जागते हुए मरते हैं।
यदि हम होश में, ज्ञान में, जागते हुए मरते हैं तो हमें निश्चय ही पिछले जन्म की मृत्यु का स्मरण रहता है। यही कारण है कि हम लोगों को उसका पता नहीं है कि हम सब कई बार मर चुके है और कई बार जन्म ले चुके हैं। हम जब भी मरे, तब बेहोश थे। और जो इस प्रकार बेहोशी में मरता है, वह बेहोशी में जन्म भी लेता है। जन्म और मृत्यु अलग-अलग बातें नहीं हैं एक ही सत्य की दो घटनाएं हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
हम मरते हैं, यह एक घटना है, एक छोर है। फिर हम गर्भ में प्रवेश करते हैं और जन्म ग्रहण करते हैं–यह दूसरी घटना है, दूसरा छोर है। जन्म होना एक बहुत बड़ी प्राकृतिक घटना है। लेकिन हमारी चेतना में उसकी कोई स्मृति नहीं है.आखिर इसका कारण क्या है ? कारण स्पष्ट है–हम मूर्छा की अवस्था में जन्म लेते हैं।_
जन्म-मृत्यु की स्मृति की बात तो दूर है, हम अपनी नींद को ही ले लें। सोने की घटना तो नित्य ही घटती है। मगर क्या हमें इस बात का पता है कि जब नींद आती है तो उसके पूर्व ही अपने होश गँवा देते हैं।
हमें नींद के समय की स्मृति नहीं रहती। जब नींद आती है तो क्या हम देख पाते हैं कि नींद आ रही है ? जब तक हम देखते हैं, तब तक समझना चाहिए कि हम जाग रहे हैं। नींद के आते ही हम अपने आपको गँवा बैठते हैं। हम बेहोश हो जाते हैं। जब व्यक्ति अपनी नींद में होश नहीं सम्भाल पाता तो अपनी मृत्यु का होश कैसे सम्भाल पायेगा।
मृत्यु तो एक प्रगाढ़ निद्रा है। उसकी स्थिति में होश संभाले रखना अति कठिन है। हम बेहोश मरेंगे, उस समय कौन गायत्री मंत्र जप रहा है, कौन राम-नामोच्चार कर रहा है ?–इसका हमें कुछ भी पता नहीं रहेगा।
जन्म और मृत्यु के समय की यह बेहोशी एक दृष्टि से आवश्यक भी है। केवल वे ही लोग मृत्यु के समय बेहोशी से मुक्त रहते हैं जो देहभाव से सर्वथा के लिए मुक्त हो गए हैं। देहभाव से मुक्ति ही हमें मृत्यु के समय चैतन्य, जाग्रत और तटस्थ रखती है।
इसलिये योग का पहला लक्ष्य है और पहली उपलब्धि है–‘देहभाव से मुक्ति।’
*मृत्यु के समय बेहोशी क्यों ?*
एक डॉक्टर हमारे किसी महत्वपूर्ण अंग का ऑपरेशन करता है, मगर इससे पहले वह हमें बेहोश कर देता है, इसलिए कि ऑपरेशन के समय हमें पीड़ा का अनुभव न हो। बाद में जब हमें होश आयेगा तो हमें पीड़ा अनुभव होगी। लेकिन वह पीड़ा सहनीय होगी।
_डॉक्टर के इस ऑपरेशन से कहीं बहुत बड़ा ऑपरेशन मृत्यु का है। इससे बड़ा और कोई ऑपरेशन नहीं है संसार में। डॉक्टर सिर्फ किसी अंग विशेष् का ही ऑपरेशन करता है, मगर मृत्यु तो हमारे पूरे शरीर का ऑपरेशन कर हमको शरीर से अलग कर देती है। मृत्यु इस संसार में सबसे बड़ी शल्य-चिकित्सा है।_
प्रकृति हमें बेहोश कर देती है और मृत्यु करती है शल्य-क्रिया और फिर आत्मा को हमेशा के लिए शरीर से अलग कर देती है।
आखिर मृत्यु तो एक दिन हर स्थूल शरीर की होनी है। मृत्यु से लोग भयभीत भी बहुत रहते हैं। रिश्तेदार, सम्बन्धी, परिवारी-- सभी दुःखी भी हो जाते हैं। लेकिन प्रकृति जहाँ निर्दयी है, वहीँ दयालु भी है। अगर वह मरणासन्न व्यक्ति को बेहोश न करे तो जो उसको पीड़ा होगी, उसे वह सहन नहीं कर सकेगा। इस दृष्टि से प्रकृति से बढ़कर संसार में कोई दयालु नहीं है।
_जो व्यक्ति देहभाव से मुक्त होकर मृत्यु को प्राप्त होता है, उसे मृत्यु की घटना का बराबर ज्ञान रहेगा। वह दूर खड़ा देखता रहेगा अपने स्थूल शरीर को एक साक्षी की तरह, एक द्रष्टा की तरह मृत्यु घटित होते हुए, मृत्यु की महा शल्य-क्रिया होते हुए।_
*कैवल्य/मोक्ष क्या है ?*
देहभाव की मुक्ति की प्रतीति गहन होनी चाहिए। हमको बराबर यही समझ कर चलना होगा कि हम 'शरीर' नहीं, 'आत्मा' हैं। प्रकृति तभी हमें अवसर देगी और तभी हम होश में, चेतना में रहकर मर सकेंगे।
_लेकिन यह घटना तो बाद में घटने वाली है। पहले तो हमें सजग और चैतन्य रहकर सोना सीखना होगा और सोना सीखने से पहले सजग होकर जागना सीखना होगा। होश में जागना, होश में सोना--ठीक से इन दोनों का अभ्यास हो जाने पर ही हम पूरे होश में मर सकेंगे। देहभाव से मुक्ति का परिणाम है--अपनी मृत्यु का साक्षी बनना।_
जो पूरी चेतना में मरता है, वह बड़े ही अदभुत अनुभव से गुजरता है। एक साधक ने मुझे बतलाया था कि शरीर से आत्मा को अलग होते समय उन्हें बड़े ही आनंद का अनुभव हुआ।
होश में मरने वाले व्यक्ति की मृत्यु शत्रु नहीं, मित्र प्रतीत होती है–एक ऐसा मित्र जो उसे विराट से मिलाता है। जो होश में मरता है, वह होश में जन्म भी लेता है। उसका जीवन कुछ दूसरा ही हो जाता है। वह वही सब कर्म नहीं दोहराता जो उसने पिछले जन्मों में बार-बार किये थे।
उसका जीवन फिर नया और निर्मल हो जाता है। एक तरह से वह नए आयाम में प्रवेश कर जाता है और उस नए आयाम के नए जीवन का भी वह साक्षी हो जाता है। मृत्यु के समय वह साक्षी था, जन्म के समय भी साक्षी था और अब पूरे जीवन का साक्षी है।
उसका जीवन फिर उसका नहीं रह जाता, उसका शरीर भी उसका नहीं रह जाता। उसका जीवन और उसका शरीर उस परम शक्ति का लीला-स्थली बन जाता है। वह एक प्रकार से जीवन्मुक्त हो जाता है। ऐसे में वह जो भी कर्म करता है, वह ईश्वर् की प्रेरणा से करता है। उसका प्रत्येक कर्म ‘अकर्म’ हो जाता है जिसका फल प्राप्त नहीं होता।
अतः देह की दुनियां से हमेशा के लिए तिरोहित होना ही कैवल्य है. कैवल्य पद नहीं, अवस्था विशेष् है। कैवल्य का अर्थ है–केवल ‘मैं’। मात्र ‘मैं’ सत्य हूँ और कुछ भी सत्य नहीं है।
जो देख रहा है–वही सत्य है। जो दिखलाई दे रहा है–वह असत्य है, मिथ्या है। एकमात्र आत्मा ही सत्य है, यह दृश्य (संसार) मिथ्या है–“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या।”
*'कैवल्य'/मोक्ष शब्द की गूढ़ता :*
हम बालक थे, फिर युवक हो गए, फिर वृद्ध हो गए। तीनों अवस्थाएं एक-के- बाद-एक आकर चली गईं। इस दृष्टि से यदि देखें तो हम परिवर्तन के सिवाय और कुछ भी नहीं हैं। सारी चीजें बदल जाती हैं। मगर हमारे भीतर कोई ऐसा 'तत्व' है जो कभी किसी अवस्था में नहीं बदलता।
_कभी हम दुःख का अनुभव करते हैं तो कभी सुख का। कभी शांति का अनुभव करते हैं तो कभी अशान्ति का। सुख-दुख का, शान्ति-अशान्ति का बराबर चक्र चलता रहता है हमारे भीतर। लेकिन कोई ऐसी भी वस्तु है हमारे भीतर जो कभी नहीं बदलती।_
यदि ऐसा कोई तत्व हमारे भीतर नहीं है तो हमारी उपस्थिति का अर्थ फिर क्या है ? कौन फिर हमारे भीतर एक सूत्र में पिरोयेगा हमारी बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था को ? कौन पिरोयेगा हमारे सुख-दुख और शान्ति-अशान्ति को ? जैसे माला होती है, माला के मनके होते हैं, सारे मनके एक सूत्र में पिरोये गए होते हैं, तभी वह माला है। सूत्र न हो तो सारे मनके बिखरे हुए होंगे। फिर उसे माला कौन कह सकेगा ?
_हमारा बचपन, हमारा यौवन, हमारा बुढ़ापा--सब कुछ मनकों की तरह हैं। सारी पीड़ाएँ, सारे दुःख-सुख मनके की तरह हैं। मगर वह सूत्र कहाँ है ? कौन-सा है जिसमें सभी प्रकार के मनके गुथे हुए हैं ? वह 'सातत्य' कहाँ है ?_
वह 'सातत्य' ही एकमात्र 'सत्य' है जो कभी नहीं रुकता, कभी नहीं मिटता और जो कभी नहीं बदलता। बाक़ी सब कुछ बदल जाता है और जो बदल जाता है, वह असत्य है, सपना है। भारतीय योग-दर्शन का कहना है कि जो बदलता है, वह सपना है। जो नहीं बदलता, वह सत्य है।
_बचपन, यौवन, बुढ़ापा, सुख-दुख, शान्ति-अशान्ति--सभी खो जाते हैं सपने की तरह। जैसे सपने मिट जाते हैं, उसी प्रकार जीवन की सारी बातें मिट जाती हैं। इसीलिए भारतीय योग कहता है और भारतीय संस्कृति कहती है कि यह संसार जो बाहर फैला हुआ है, एक स्वप्न है--एक विराट स्वप्न। इस संसार में बराबर परिवर्तन हो रहा है, सपने की तरह बराबर मिटता जा रहा है--'संसरति इति संसारः।'_
अर्थात--जो हर समय सरकता रहता है, हर क्षण बदलता रहता है, वही संसार है।अतः संसार सपना है और कुछ भी नहीं।
सपने दो प्रकार के होते हैं। पहला सपना अपना व्यक्तिगत होता है। इस सपने को हम नींद की अवस्था में देखते हैं। दूसरा सपना जागतिक है। इसे हम जागते हुए देखते हैं। एक सपना है निद्रित और दूसरा सपना है जाग्रत। इन दोनों सपनों में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों ही बदल जाते हैं, मिट जाते हैं।
_रात का सपना प्रातः उठने पर असत्य हो जाता है और जीवन का सपना मृत्यु के आगमन पर असत्य हो जाता है। एक पल ऐसा आता है जो हम जीवनभर देखे होते हैं, वह असत्य हो जाता है._
_बचपन, जवानी, बुढ़ापा--सब देखा। मगर सब बदल गया। हमारे भीतर जो उन्हें देखने वाला था, वह नहीं बदला। उसी ने बचपन देखा, उसी ने युवावस्था देखी, उसी ने बुढ़ापा भी देखा। उसी ने सुख-दुःख, सफलता-असफलता देखी। उसी ने जन्म देखा, उसी ने मृत्यु भी देखी। मगर सब बदल जाता है, केवल वही एक नहीं बदलता--जो सब कुछ देखता रहता है, सब कुछ अनुभव करता रहता है, सबका साक्षी बना रहता है।_
इसी सूत्र को जिसमें सारे मनके पिरोये होते हैं, योग-शास्त्र 'आत्मा' कहता है। केवल आत्मा 'सत्य' है।
जिस समय हम अपने को इन तमाम मनकों से हटा लेंगे, और आत्मा रूपी सूत्र से अपने को मुक्त कर लेंगे, जान लेंगे कि हम सूत्र हैं, हम आत्मा हैं, वही सतत साक्षीभाव हम ही हैं, वह 'चैतन्य' भी हम ही हैं--यह प्रतीति सघन अनुभव बन जाती है तब हम 'कैवल्य' को उपलब्ध् हो जाते हैं।
_मात्र केवल आत्मा ही जानने और पाने योग्य है। हम उस 'एक' को खोकर सब कुछ गँवा बैठते हैं। सपनों को पकड़ते हैं और पकड़ भी नहीं पाते। रात सपने में देखा कि करोड़पति हो गए, मगर सवेरा होते ही देखते हैं कि मुट्ठी ख़ाली-की-ख़ाली है। इसी प्रकार जीवन में देखा कि हम यह हो गए हैं, हम वह हो गए हैं, लखपति हो गए, एम् एल ए बन गए, मंत्री बन गए, मगर मृत्यु के समय पता चलता है कि मुठ्ठी ख़ाली-की- ख़ाली है।_
सब सपना-सपना-सा लगता है। योग की दृष्टि में सपने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि जहाँ-जहाँ परिवर्तन है, वहां-वहां 'सत्य' नहीं है।
वह 'सत्य' हमें फिर कहाँ मिलेगा ? कहाँ उसके दर्शन होंगे ?
_उस एकमात्र 'सत्य' को खोजना होगा अपने भीतर। तभी द्रशाभाव से मिलेगी वह 'सूत्रबद्धता'। वह 'सातत्य' जो एक है, उसे ही कहा है--'कैवल्य'। उसी को जान लेना है, उसी को समझ लेना है। जिसका फल होगा हम देह रहते हुए भी और देह के मृत हो जाने पर भी उस एक का अनुभव करेंगे।_
कैसे जान पाएंगे उस 'एक' को ? जानने की प्रक्रिया क्या है ?
जानने की प्रक्रिया है--सारे विकल्पों से शून्य हो जाना। विकल्प का अर्थ है--जिन-जिन वस्तुओं में विपरीतता है, वे सब विकल्प हैं, जैसे दुःख-सुख, शान्ति-अशान्ति, त्याग-आसक्ति, जैसे--घृणा-लगाव, सफलता- असफलता।
_विकल्प का मतलब है--द्वन्द्व। यह जगत् द्वंद्वमय है। जहाँ हर चीज के दो विकल्प हों, दो पहलू हों। जिसने एक को चाहा, वह दूसरे में उलझेगा। बचने का कोई रास्ता नहीं है। सुख चाहते हैं तो दुःख उसका विपरीत है, वह झेलना पड़ेगा।_
शान्ति चाहते हैं तो अशान्ति उसके विपरीत है, उसे प्राप्त करना होगा। त्याग चाहते हैं तो आसक्ति के सागर में डूबना पड़ेगा। प्यार चाहते हैं तो घृणा सहनी होगी।
हम बच नहीं सकते दूसरे से। अगर बचने का कोई रास्ता है तो यही कि हम दोनों को छोड़ दें। दोनों को छोड़ना ही विकल्प-शून्यता है जिसका अर्थ है--जहाँ-जहाँ द्वन्द्व है, वहां-वहां चुनाव न करें। बस, चुनाव करना ही छोड़ दें। सुख की, शान्ति की, सफलता की, प्यार की। बस, अलग रहें दोनों से।
_काफी कठिन यह समस्या दोनों से अलग रह पाने की। सब कुछ समझ में आ जाता है, मगर समस्या वहीं रहती है द्वन्द्व की। यदि हम मुक्ति चाहते हैं तो बन्धन में पड़ते रहेंगे। क्योंकि द्वन्द्व तो वहां भी है। विकल्प तो स्वयम् बन जाता है। जो शान्ति मांगता नहीं, अशान्ति भी मांगता नहीं, जो मुक्ति मांगता नहीं, बन्धन भी मांगता नहीं--वह व्यक्ति पूर्णरूप से शान्त हो जाता है।_
फिर उसी व्यक्ति के जीवन में 'उस एक' के पुष्प खिलते हैं और महकते हैं।
हमें संसार से कुछ नहीं माँगना है, न कुछ चाहना है और न कोई आशा-अपेक्षा ही रखना है। यही सही मायने में सन्यास है। सन्यास का मतलब गेरुआ वस्त्र पहन लेना नहीं है। सन्यास संसार के विपरीत नहीं है। जिन लोगों ने सन्यास को संसार के विपरीत समझा है, वे बराबर संसार में ही फंसे रहते हैं।
उन्होंने संसार को सन्यास के विपरीत समझा है। यही समझना द्वन्द्व में पड़ना है। संसार को त्यागने वाले सन्यासियों ने संसार को मन में बसा रखा है। संसार छोड़ कर भागे तो क्या ? संसार को तो मन में बसा रखा है। हम संसार में बने रहें, कोई बात नहीं। मगर संसार हमारे मन में नहीं रहना चाहिए।
_वास्तव में सन्यास का अर्थ है--निर्द्वन्द्व हो जाना, विकल्प-शून्य हो जाना, चुनाव-रहित हो जाना। जो सच्चा सन्यासी होता है, वह हर परिस्थिति से अप्रभावित रहते हुए गुजर जाता है। उसके जीवन में जो घट जाता है, उसे वह अलिप्त भाव से ईश्वरेच्छा समझ कर स्वीकार कर लेता है।_
जो नहीं घटता, उसकी वह मांग नही करता। इसी एकमात्र भाव का नाम है 'सन्यास'। यदि हमने इस भाव को जीवन में उतार लिया तो हम भी वही सन्यासी हैं। वस्त्र बदलने, सिर मुड़ाने, दण्ड-कमण्डल हाथ में लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। यही बात उपनिषद का यह सूत्र कहता है--
अज्ञान ह्रदय ग्रन्थि निःशेष विलयस्तदा।
समाधिना$विकल्पेन यदा अद्वेता$त्मदर्शनम्।।
जिसने समाधि या किसी और माध्यम से अज्ञान रूपी ग्रंथि का संपूर्ण रूप से प्रणाश कर् लिया है और सारे विकल्पों और द्वंद्वों को छोड़कर एक उस अद्वैत रूपी आत्मा का दर्शन कर लिया है, वही सच्चा सन्यासी है, साधक है।
जो व्यक्ति ध्यान करने का प्रयास करता है, उसका अभ्यास करता है, उसे यह भली-भाँति मालूम होना चाहिए कि इसका आगे का क्रम समाधि है। ध्यान से समाधि में प्रवेश। लेकिन जैसा कि पूर्व की पोस्टों में बतलाया जा चुका है कि वही व्यक्ति इस अभ्यास में सफल हो सकता है जिसने अपने- आपको मानसिक और व्यावहारिक रूप से बदलने का संकल्प किया हुआ है।
जिसने यह जान-समझ लिया है कि यह संसार उसके लिए व्यर्थ है और वह स्वयं इस संसार के लिए व्यर्थ है। जिसने हानि-लाभ, जीवन- मरण, यश-अपयश सबसे निरपेक्ष होकर विधि के हाथ छोड़ दिया है। ऐसा व्यक्ति ध्यान से समाधि में शीघ्र प्रवेश का सकता है।
जब साधक ध्यान से समाधि की अवस्था की ओर बढ़ता है तो सर्वप्रथम जो उसे उपलब्ध् होता है, वह है सहज समाधि। सहज समाधि जब धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगती है तो उसके आगे जो मिलता है, वह है–सविकल्प समाधि। सविकल्प समाधि का कोई अधिक महत्त्व नहीं रहता क्योंकि अभी तक साधक के जीवन में विकल्प-शून्यता उत्पन्न नहीं हो पाती है।
द्वन्द्व, विकल्प, द्वैत उसके जीवन का हिस्सा अभी भी रहते हैं। हाँ, इतना अवश्य है कि उसने शान्त होना स्वीकार कर लिया है। वह संसार से परेशान है, इसलिए उसने शांति को चुन लिया है। लेकिन उसने जो शान्ति प्राप्त की है, उसकी गहराई में अशान्ति छिपी है।
वहां विकल्प विद्यमान है। उसने अशांति के विपरीत शांति को चुना है। यही कारण है कि वह अशांति से मुक्त नहीं है।
ऐसी शान्ति से सदा यही भय बना रहता है कि कहीं अशान्ति लौटकर न आ जाये। जो व्यक्ति जंगल, पहाड़ की ओर भागता है, वह व्यक्ति वास्तव में संसार, समाज और परिवार से नहीं भागता है। उसे सदैव भय बना रहता है कि कहीं संसार, समाज और परिवार उसके भीतर छिपी अशान्ति को उकसा न दे।
_ब्रह्मचारी व्यक्ति इसलिए पहाड़, जंगल की ओर भागता है कि उसे ब्रह्मचर्य का पालन करना है। वह तो इसलिए भागता है कि कहीं उसके भीतर छिपी हुई काम-वासना को कोई उघार न दे।_
अपने को ब्रह्मचारी कहने और मानने वाला व्यक्ति स्त्री से दूर क्यों भागता है ? क्यों उससे दूर रहना चाहता है ? इसलिए कि उसके ब्रह्मचर्य का निर्माण सतही है, ऊपरी है। गहराई में काम-वासना छिपकर बैठी हुई है। ब्रह्मचर्य को उसने काम वासना का विकल्प समझा है, विपरीत समझा है। वास्तव में जिसने जिसका चुनाव किया, समझ लीजिए, वह विपरीत के बन्धन में जकड गया।
_हमारा जीवन दो भागों में विभक्त है। एक भाग् को तो हमने चुनकर स्वीकार कर लिया है और दूसरे भाग् को अस्वीकार कर दिया है। मगर दोनों भाग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए जिसको हमने स्वीकार नहीं किया, वह आखिर जायेगा कहाँ ? वह भाग् भी तो हमेशा साथ ही रहेगा।_
हम संसार, समाज, परिवार से भागकर हिमालय में सैकड़ों वर्ष रहें, तपस्या करें। मगर जिस दिन हम वापस लौटेंगे, तो पाएंगे कि हमारे सैकड़ों वर्ष का समय बेकार चला गया।
_हमारे भीतर जो छिपकर गहराई से बैठा है, उसे संसार, समाज, परिवार फिर से वापस ला देगा। हम फिर से जस-के-तस हो जायेंगे। बस, यही है सविकल्प समाधि का अर्थ।_
*निर्विकल्प समाधि की अर्थवत्ता :*
निर्विकप का अर्थ है कि हमने चुनाव करना ही बन्द कर् दिया है। वास्तविक समाधि निर्विकल्प समाधि ही है। सविकल्प समाधि एक प्रकार से धोखा है। विकल्पशून्य होने पर ही
निर्विकल्प अवस्था प्राप्त होती है। यह अवस्था जितनी साधना की देन है, उससे कहीं ज्यादा देन है मनोदशा, भावदशा और आचरण की।
संसार में रहते हुए संसार से जल-कमलवत् अलिप्त रहना, सुख-दुःख भोगते हुए भी सुख-दु:ख के भाव मन में न आने देना। और यह भी दमन से नहीं, स्वाभाविक रूप से। कोई भी संकट की घड़ी या विकट घडी का जीवन में सामना हो जाये, उससे बिलकुल ही अप्रभावित रहना–ये सारी चीजें मिलकर एक ‘तपश्चर्या’ का रूप ले लेती हैं। साधक के जीवन का एक-एक क्षण अनुकरणीय बन जाता है।
उसका जीवन धन्य हो जाता है, वह एक प्रकार से जीवन्मुक्त हो कर अपने को उस ‘परमतत्व’ की बाँहों में सौंप कर ‘परमानंद’ की अनुभूति में रमा रहता है। यह है निर्विकप समाधि।
निर्विकल्प समाधि द्वारा आत्मदर्शन होता है और उसी समय हृदय का अज्ञानरूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है।
जिस दिन हम आशा, अपेक्षा, अधिकार, मांग, दावा सब कुछ छोड़ देंगे, उस दिन हम निर्विकल्प अवस्था को उपलब्ध् हो जायेंगे और उसी दिन से फ़िर जगत में कोई बन्धन नहीं रह जायेगा। अगर सारा संसार जंज़ीर बनकर हमारे अँग-अँग जकड दे, तब भी हम किसी बन्धन का अनुभव नाहीं करेंगे।
इस विषय में एक कथा रामकृष्ण से सम्बंधित है– रामकृष्ण बचपन से ही माँ महामाया के उपासक थे। माँ के सामने पहुँचते ही नाचने लगते थे। रोने लगते थे विह्वल होकर। फिर उनका घर पहुंचना मुश्किल हो जाता था। मन्दिर की सीढ़ियों पर लेट जाते, वहीँ पड़े रहते, “माँ-माँ” पुकारते रहते। परिवार के लोगों ने समझ लिया था कि रामकृष्ण अब संसार में नहीं लौट कर आएंगे।
अपना परिवार और अपनी गृहस्थी नहीं बसायेंगे। कोई आशा न थी। मगर फिर भी माता-पिता का फ़र्ज़ था, इसलिए उन्होंने पूछा–राम, विवाह करोगे ? सोचा था राम इन्कार कर देंगे। मगर उल्टा ही हुआ। विवाह का नाम सुनकर रामकृष्ण प्रफुल्लित हो उठे। प्रसन्नता से नाचने लगे। पूछा–विवाह कैसा होता है ?–अवश्य करेंगे। परिवार के लोगों ने समझा था कि सन्यासी वृत्ति के हैं, विवाह नहीं करेंगे रामकृष्ण।
खैर, लड़की की खोज हुई। लड़की मिली। मगर काफी छोटी थी वह। दोनों की आयु में 8-10 वर्ष का अंतर था। रामकृष्ण लड़की को देखने गए। साथ में परिवार के लोग भी गए। राम की माँ ने उनकी जेब में तीन रुपये रख दिए थे कि शायद कोई आवश्यकता पड़े। रामकृष्ण सज-धज कर, बन-संवर कर पहुँच गए। लड़की काफी सुन्दर थी। रामकृष्ण ने तीनों रूपये जेब से निकाले और होने वाली पत्नी के चरणों में रख दिए और दोनों हाथों से उसके चरणों को छूकर, भाव-विभोर होकर नाचने लगे। लोग मुश्किल में पड़ गए।
लोगों ने कहा–अरे पागल ! यह तेरी होने वाली पत्नी है। तूने पैर क्यों छू लिए और तीन रुपये क्यों चढ़ा दिए ?
ज्ञात है रामकृष्ण ने क्या कहा ? उन्होंने कहा–यह मेरी माँ (माँ महामाया) जैसी प्यारी लगती है।
क्योंकि रामकृष्ण एक ही प्रेम जानते थे और वह था–माँ-जैसा प्रेम। “बहुत प्यारी लगती है–माँ-जैसी प्यारी। इसको मैं “माँ” ही कहूंगा। पत्नी है तो हर्ज क्या ?”
फिर विवाह हो गया। मगर जीवनभर रामकृष्ण शारदा को “माँ” कहकर ही पुकारते रहे। जीवनभर शारदा के पैर ही छूते रहे। जब काली-पूजा का समय आता तो वे काली की पूजा न कर् , शारदा को ही सिंहासन पर बिठा कर उनकी पूजा करते और कहते–जब माँ जीवित है तब फिर मूर्ति की क्या आवश्यकता ?
रामकृष्ण के लिए पत्नी बन्धन नहीं रहीं, मुक्ति का साधन बन गईं। उन्होंने बन्धन की ओर देखा नहीं, माता-पिता की इच्छा को टाला नहीं, उनकी इच्छा का असम्मान भी नहीं किया।
उनके सामने दैवीय कृपा से या संयोग से जो आता गया ,उसे सहज ही माँ की इच्छा मान कर अंगीकार करते गए। मतलब यह कि जीवन में कुछ भी घटित हो, उसका प्रभाव और परिणाम हमारी भाव-दशा पर निर्भर है।
दुःख ‘दुःख’ है। दुःख इसलिए है कि हमने उसे सुख के विपरीत समझ लिया है। दुःख के विपरीत हम सुख चाहते हैं। अशान्ति क्या है ? हम शान्ति को चाहते हैं, इसलिए अशान्ति है। सच बात तो यह है कि हमारे चुनाव में ही हमारा संसार है। रामकृष्ण को संसार ने बाँधा, पर बांध न सका उन्हें। संसार से भागे नहीं वे।
संसार में रहकर, सारे सुख-दुःख के बीच से अलिप्त रहकर गुजर गए।
जो चुनावरहित है, वही निर्विकल्प समाधि को उपलब्ध हो सकेगा। आत्मा के दर्शन उसी को सम्भव हैं.
एक सम्प्रदाय है अपने देश में जिसका नाम है–‘उदासीन’। दिल्ली में भी सेंटर है. उदासीन का मतलब उदास रहना नहीं है। उदासीन का मतलब है–चुनावरहित हो जाना, किसी वस्तु से, किसी बात से कोई मतलब नहीं।
मगर ‘उदासीन’ सम्प्रदाय के साधू जबरदस्ती अपने ऊपर उदासी थोपकर उदास बने रहते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि उदासी में ही सब कुछ है। उदास रहने में ही उदासीनता है। उदासीनता का कोई सम्बन्ध नहीं है उदासी से।
मात्र केवल शब्द भर का सम्बन्ध है। भाव से कोई मतलब नहीं है उदासीनता का मतलब है–जो कुछ हो रहा है, उसे होने दीजिए। जो हो गया, जो हो रहा है और जो होने वाला है– सब ठीक है।
घरों में तरह-तरह का सामान रखा रहता है, अनेक प्रकार की वस्तुएं रखी रहती हैं। हमें उन पर विशेष् ध्यान देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हम उनके बीच से होकर गुजरते रहते हैं। उसी प्रकार हमारे भीतर दुःख-सुख, पीड़ाएँ, चिंताएं, अहंकार, सुख की यादें, मित्रों की यादें–सब विद्यमान हैं। सब हमारे भीतर हैं।
मगर उनके बीच से हमको गुजर जाना है। सब ठीक है। जो सब ‘ठीक’ है, उस पर ध्यान नहीं देना है। न किसी के प्रति आकर्षित होना है और न किसी के प्रति विकर्षित होना है। यही अर्थ है–उदासीनता का है।
उदासीन व्यक्ति अति प्रफुल्ल और प्रसन्नचित्त रहता है, उदास नहीं। मगर यहाँ प्रफुल्लता का भी अर्थ हमें जान लेना चाहिए। प्रफुल्ल का मतलब है कि अब उस व्यक्ति को कोई भी चीज़ परेशान नहीं करती। इसलिए अब उसके भीतर का फूल खिलना शुरू हो गया है। मगर यदि हमने जबरदस्ती अपने ऊपर उदासी थोप ली तो फिर हम कभी प्रफुल्लित नहीं हो पाएंगे।
इसका प्रयोग करके देख सकते हैं हम। हम किसी रास्ते से होकर गुजरें। तब कौन-सा मकान सुन्दर है, कौन-सा ख़राब है ? कौन व्यक्ति पास से निकल गया ? वह अमीर था या गरीब था ? नेता था, अभिनेता था, व्यापारी था या कि चोर था ?–सब बराबर लगेगा। वह कोई भी था–कोई प्रयोजन नहीं।
तब कोई सुन्दर स्त्री पास से गुजरी, कोई सुन्दर पुरुष पास से गुजरा–कोई मतलब नहीं। हम अप्रभावित रहेंगे। हम ऐसे गुजर जायेंगे, जैसे रास्ता ख़ाली हो। इसका प्रयास कर के देखें हम। तटस्थ रहें।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का नाम हमने-आपने सुना होगा। वे रोज़ टहलने जाया करते थे। उनके साथ एक मीर साहब भी टहलने जाते थे। एक दिन की बात है कि मीर साहब का नौकर भागा-भागा आया और बोला–मीर साहब, मीर साहब ! आपके घर में आग लग गयी है, जल्दी वापस चलें।
मीर साहब ने कहा–चलता हूँ। लेकिन वे वैसी ही चाल चलते रहे। चाल में कोई अन्तर नहीं पड़ा। वह नौकर घबराया, फिर बोला–आपने सुना नहीं, घर में आग लग गयी है। मीर साहब ने जवाब दिया–सुन लिया। फिर वैसी ही चाल चलते रहे। विद्यासागर से रहा न गया, आगे बढ़कर बोले–आप क्या कर रहे हैं ? नौकर ने क्या कहा–आप समझे ? घर में आग लग गयी है।
मीर साहब ने कहा–वह तो ठीक है, मगर मैं अब कर ही क्या सकता हूँ ? घर में आग लग गयी है तो मैं अपनी चाल ख़राब क्यों करूँ ? और एक मौका मिला है मुझे। घर में आग लगने पर भी अगर मैं वैसे ही चल सकता हूँ, जैसा कि तब चलता था जब घर में आग नहीं लगी थी। ‘उदासीनता’ का एक मज़ा मिल जाये।
लगी है घर में आग, ठीक है। मैं वैसे ही चल रहा हूँ, जैसे तब चल रहा था, जब घर में आग नहीं लगी थी। इस चाल में जरा-सा भी फर्क करूँ तो वह फर्क मेरी चेतना में फर्क कर देता है। और मीर साहब वैसे ही चलते रहे।
लोग यही समझेंगे कि पागल थे मीर साहब। भला ऐसा भी होता कहीं कि जिसके घर में आग लग गयी हो और वह पागलपन की बात करे !
लेकिन अगर देखा जाये तो मीर साहब वास्तव में उदासीनता के एक लाजवाब उदाहरण थे।
विद्यासागर ने इस विषय में लिखा है–उस दिन जो देखा मैंने रूप मीर साहब का, मैं समझ गया कि वे रात में शान्ति से सोये होंगे। जिस आदमी की चाल में फर्क नहीं पड़ा, उसकी नींद में क्या फर्क पड़ने वाला है। उदासीनता का मतलब है–तटस्थ वृत्ति।
जो हो रहा है, वह ठीक है, स्वीकार है। इसमें कहीं कोई चुनाव नहीं। चुनाव की गुंजाइश ही नहीं। घर में आग लग गयी है–उससे बेचैनी नहीं होती है। घर में आग नहीं लगनी चाहिए थी–यह हमारी जो अपेक्षा है, उससे हमें बेचैनी है। घर जल गया। भीतर से अपेक्षा टूट गयी। उससे चाल डगमगा जाती है। भीतर छिपी चेतना डगमगा जाती है।
लेकिन जिसकी कोई अपेक्षा नहीं, कुछ भी हो जाये–उसके विरुद्ध कोई भाव नहीं, उसकी चेतना नहीं डगमगाती। यह चेतना का अकम्प होना ही–उदासीनता है।
ईश्वर्, परमेश्वर से लेकर, ब्रह्मा से लेकर पत्थर तक–सारी उपाधियां झूठी हैं। इसीलिये उपनिषद् कहता है कि एक ही स्वरुप में रहने वाली आत्मा का ही सर्वत्र दर्शन करना चाहिए।
सारे पद, सारी उपाधियां, सारी प्रतिष्ठाएं झूठी हैं। चाहे सड़क के किनारे पड़ा हुआ पत्थर हो, चाहे वैकुण्ठ में बैठा हुआ परमेश्वर हो, सब व्यर्थ है, सब असत्य है। मगर इस बात के साथ इसका ध्यान रखना चाहिए कि जो झूठा नहीं है, वह है--'साक्षीभाव'। उसी साक्षीभाव में लीन रहना।
_साक्षीभाव में लीन रहने का मतलब है--चैतन्य की अनुभूति करना। जो उस साक्षी को जान लेता है, उसके लिए फिर दूसरा मिट जाता है। वह दूसरा नहीं है, मैं ही हूँ। मेरा ही फैलाव है। जिस दिन मैं अपनी चेतना को जान जाता हूं, उसी दिन यह भी जान लेता हूँ कि आपकी चेतना और हमारी चेतना भिन्न नहीं है।_
जब तक हम अपने शरीर को जानते हैं, तब तक आप हमसे भिन्न हैं। क्योंकि हमारा और आपका शरीर भिन्न-भिन्न है। जब तक हम शरीर को देखते हैं, तब तक हम सब एक दूसरे से भिन्न हैं और जब हम भीतर 'साक्षीभाव आत्मा' को देख लेते हैं जो हमारी शाश्वत ज्योति है, तब हम एक दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं।
_ऐसी स्थिति में पशु, पक्षी, अमीर, गरीब, राजा, भिखारी से किसी भी प्रकार की भिन्नता नहीं रह जाती। सम्पूर्ण जड़-चेतन में उसी परम ज्योति का अनुभव हो जाता है। तब सारे रूप, सारी आकृतियां, सारी उपाधियां व्यर्थ सिद्ध हो जाती हैं।_
मूर्ख से मूर्ख और ज्ञानी से ज्ञानी के भीतर वही एक 'ज्योति' जल रही है जो 'बुद्ध' के भीतर जलती है, जो 'कृष्ण' के भीतर जलती है और जो 'राम' के भीतर जलती है। फर्क बस इतना ही है कि बुद्ध, कृष्ण, राम को उस ज्योति का ज्ञान है और अज्ञानी को नहीं है।
_मैं ही हूँ सर्वत्र फैला हुआ, मैं ही सर्वत्र व्याप्त हूँ और इस 'मैं' का नाम ही आत्मा है, परमात्मा है-- इसी प्रतीति का नाम 'अध्यात्म' है।_
(लेखक मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

