मोनिका ठाकुर (नरसिंहपुर )
_जब भी हम परमात्मा के सम्बन्ध में विचार करते हैं, तब ऐसा लगता है कि परमात्मा अस्तित्व से हटकर कुछ और ही है। वास्तव में ऐसा सोचना हमारी भूल है। यह हमारे विचार के स्वभाव के कारण होता है। जब भी किसी चीज़ पर विचार किया जाता है तो चीजें टूट जाती हैं। जब भी हम परमात्मा के बारे में सोचते है तो परमात्मा अलग हो जाता है और जगत अलग हो जाता है।_
जब भी हम कहते हैं--'सृष्टि' तो सृष्टा उससे अलग हो जाता है। वास्तव में देखा जाय तो सृष्टि और सृष्टा अलग-अलग नहीं, एक ही है। सृष्टि मकड़ी के जाले की तरह है। सृष्टि का जो विस्तार है, वह परमात्मा से वैसे ही फैलता है जैसे मकड़ी का जाला मकड़ी के भीतर से निकलता है और फैलता है।
_सृष्टि का सारा विस्तार उसी का विस्तार है। यह सृष्टि परमात्मा से अलग नहीं है। एक पल के लिए भी अलग होकर उसका अस्तित्व नहीं रह सकता। वह इसमें समाया हुआ है। इसका मतलब यह है कि परमात्मा अस्तित्व का पर्यायवाची है। अस्तित्व ही परमात्मा है। परमात्मा ही अस्तित्व है।_
इस बात से विज्ञान भी राजी हो जायेगा, नास्तिक भी राजी हो जायेगा। लेकिन दोनों यही कहेंगे कि फिर 'परमात्मा' शब्द के प्रयोग की क्या आवश्यकता है ? प्रकृति ही काफी है कहना। जगत ही काफी है, अस्तित्व ही काफी है। मगर 'अस्तित्व' से हमारे ह्रदय में किसी प्रकार का आंदोलन नहीं होता, हमारे हृदय की वीणा झंकृत नहीं होती।
_अस्तित्व और हमारे बीच कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं होता। लेकिन हाँ, परमात्मा कहने पर हमारे हृदय में गति शुरू हो जाती है। प्राणों में एक लहर-सी दौड़ जाती है। परमात्मा है इतना कहना ही काफी नहीं है, मनुष्य उस तक पहुंचे--यह आवश्यक है। हमारे ऋषियों, मुनियों, मनीषियों ने यों ही परमात्मा शब्द का उपयोग नहीं किया है।_
उन्होंने परमात्मा के रहस्य को समझा है। भारत में जीवन जीने की छोटी-छोटी बात को भी धर्म के साथ इसीलिए जोड़ा गया है कि मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन और उसके क्रिया-कलाप वास्तव में धर्ममय अस्तित्व से जुड़ जाएँ।
_धर्म मात्र तथ्यों की घोषणा नहीं है, बल्कि लक्ष्यों की घोषणा है।--यही विज्ञान और धर्म में अन्तर है। धर्म का सम्बन्ध 'क्या'--केवल इतने से ही नहीं है। 'क्या होना चाहिए' और 'क्या हो सकता है ?'--इससे भी धर्म का सम्बन्ध है।_
बीज हमारे सामने पड़ा हो तो विज्ञान कहेगा--'यह बीज है', लेकिन धर्म कहेगा--' यह बीज भी है, वृक्ष भी, फूल भी है और फल भी है'। धर्म उसकी भी घोषणा करेगा--जो हो सकता है और उसकी भी घोषणा करेगा --जो होना चाहिए।
_विज्ञान इतना कहकर मौन साध लेता है कि अस्तित्व है। लेकिन धर्म कहता है--परमात्मा और अस्तित्व पर्यायवाची है। फिर भी हम अस्तित्व नहीं कहते, परमात्मा कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं--ऐसा चराचर जगत में कुछ भी नहीं है, कोई भी नहीं है जो मेरे से रहित हो।_
🍃चेतना विकास मिशन :

